Samudra Manthan scheme: देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और कच्चे तेल व प्राकृतिक गैस के आयात पर भारत की बढ़ती निर्भरता को घटाने के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पिछले हफ्ते ₹84,084 करोड़ की समुद्र मंथन राष्ट्रीय अपतटीय अन्वेषण योजना (Samudra Manthan National Offshore Exploration Scheme) को मंजूरी दी है। इस योजना के तहत सरकार उच्च जोखिम वाले गहरे और अत्यधिक गहरे समुद्री तेल व गैस की खोज का खर्च सीधे बजट से उठाएगी।
इस योजना की सबसे खास बात यह है कि सरकार समुद्र में एक गहरे या अत्यधिक गहरे पानी के एक्सप्लोरेशन वेल (कुएं) की ड्रिलिंग लागत का 50 प्रतिशत या अधिकतम ₹650 करोड़ (जो भी कम हो) का खर्च उठाएगी। अधिकारियों के मुताबिक अगले पांच वर्षों में ऐसे 60 कुओं की ड्रिलिंग के लिए सरकारी सहायता बढ़ाई जाएगी।
सरकार क्यों उठा रही है जोखिम? दुनिया का पहला अनोखा कदम
सरकारी अधिकारियों ने इस पहल को एक अभूतपूर्व कदम बताया है जिसमें सरकार सीधे तौर पर बजटीय सहायता के माध्यम से एक्सप्लोरेशन रिस्क को अपने ऊपर ले रही है। पीटीआई से बातचीत में एक अधिकारी ने बताया कि शायद दुनिया में यह पहली बार है जब कोई सरकार सीधे अपने बजट से जोखिम वाले एक्सप्लोरेशन का खर्च उठा रही है। अगले पांच वर्षों में कुल 60 गहरे पानी और अत्यधिक गहरे पानी के एक्सप्लोरेशन कुओं को बजट से वित्तीय सहायता दी जाएगी।
अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट किया कि निजी कंपनियां ऐसे जोखिम भरे एक्सप्लोरेशन से बचती रही हैं। इसका मुख्य कारण यह था कि अगर ड्रिलिंग के दौरान कॉमर्शियली रियलिस्टिक तेल या गैस के भंडार नहीं मिलते हैं, तो पूरा निवेश डूब जाता है। एक दूसरे अधिकारी ने बताया कि कंपनियां सिर्फ डेवलपमेंट ड्रिलिंग यानी पहले से खोजे गए भंडारों से उत्पादन बढ़ाने पर ही पैसा खर्च कर रही थीं। नए संसाधनों की खोज के लिए सबसे महत्वपूर्ण रिस्क एक्सप्लोरेशन में न के बराबर पैसा लगाया जा रहा था। इस लिहाज से समुद्र मंथन एक गेम-चेंजिंग योजना है।
₹84084 करोड़ का पूरा बजट ब्रेकअप
इस महत्वाकांक्षी योजना के लिए आवंटित कुल ₹84,084 करोड़ के बजट को अलग-अलग चरणों के हिसाब से बांटा गया है। डीपवाटर और अल्ट्रा-डीपवाटर ड्रिलिंग के लिए अगले पांच वर्षों में गहरे समुद्र में ड्रिलिंग के लिए ₹43200 करोड़ निर्धारित किए गए हैं। समुद्री भूकंपीय डेटा के लिए ₹28534 करोड़ आवंटित किए गए हैं। Subsea पाइपलाइनों और तटवर्ती तेल व गैस प्रसंस्करण सुविधाओं के विकास के लिए ₹10000 करोड़ दिए जाएंगे। तेल व गैस विनिर्माण और सेवा क्षेत्र के विकास के लिए ₹2000 करोड़ रखे गए हैं।
कैसे काम करेगा कॉमन हब इंफ्रास्ट्रक्चर (CHI) मॉडल?
सिर्फ ड्रिलिंग में ही नहीं बल्कि सरकार सबसी पाइपलाइनोंऔर तटीय तेल व गैस प्राप्त करने Qj प्रसंस्करण करने वाली सुविधाओं जैसे कॉमन इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए भी आंशिक फंडिंग देगी। इसके लिए कॉमन हब इंफ्रास्ट्रक्चर मॉडल तैयार किया गया है। इसके तहत एक से अधिक ऑपरेटर्स साझा संपत्तियों का उपयोग करके अपने खोजे गए भंडारों का व्यावसायिक उपयोग कर सकेंगे। इससे विकास लागत घटेगी, परियोजनाओं की व्यावहारिकता में सुधार होगा और छोटी खोजों से भी तेजी से व्यावसायिक उत्पादन शुरू किया जा सकेगा।
कौन सी कंपनियां होंगी पात्र और क्या होगा फायदा?
ओपन एकरेज लाइसेंसिंग प्रोग्राम (OALP) के पिछले दौरों में ब्लॉक हासिल करने वाली कंपनियों के साथ-साथ चल रहे बोली दौर में ब्लॉक हासिल करने वाली फर्में भी इस योजना के तहत पात्र होंगी। वे प्रत्येक गहरे या अत्यधिक गहरे पानी के कुएं की ड्रिलिंग के लिए सरकार से ₹650 करोड़ तक की सहायता प्राप्त कर सकेंगी। इस योजना से भारत के अपतटीय एक्सप्लोरेशन सेक्टर में वैश्विक ऊर्जा कंपनियों के आकर्षित होने की भी उम्मीद है।
इंडस्ट्री इसके असर के बारे में टिप्पणी करते हुए इक्रा लिमिटेड (ICRA Ltd) के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट प्रशांत वशिष्ठ ने पीटीआई को बताया कि यह कार्यक्रम ऑफशोर एक्सप्लोरेशन की सबसे बड़ी बाधाओं में से एक को दूर करता है। इसके अलावा यह योजना गहरे और अत्यधिक गहरे पानी के कुओं की ड्रिलिंग के लिए सहायता प्रदान करती है, जहां घरेलू अपस्ट्रीम क्षेत्र के पास सीमित अनुभव व तकनीकी विशेषज्ञता है और इनका दोहन अत्यधिक पूंजी-गहन और जोखिम भरा है। इस योजना का लक्ष्य 10-15 मिलियन टन तेल समकक्ष का अतिरिक्त वार्षिक उत्पादन जोड़ना है जो तेल और गैस के आयात पर निर्भरता को 3 से 5 प्रतिशत तक कम कर देगा।
कच्चे तेल पर 88% तक पहुंची भारत की निर्भरता
यह योजना ऐसे समय में आई है जब पिछले एक दशक में भारत की आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता 77 प्रतिशत से बढ़कर 88 प्रतिशत हो गई है। इसके साथ ही देश अपनी कुल प्राकृतिक गैस आवश्यकता का लगभग आधा हिस्सा अब भी आयात करता है। अधिकारियों का मानना है कि भारतीय समुद्री क्षेत्र के भीतर अनछुए हाइड्रोकार्बन भंडारों का पता लगाकर घरेलू अपतटीय एक्सप्लोरेशन का विस्तार करने से देश की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी। हालांकि अधिकारियों ने स्वीकार किया कि गहरे समुद्र में एक्सप्लोरेशन एक दीर्घकालिक निवेश है और जरूरी नहीं कि हर कुएं से व्यावसायिक रूप से व्यावहारिक खोज ही निकले। इसके बावजूद सरकार द्वारा एक्सप्लोरेशन के जोखिम को सीधे फंड करने का फैसला भारत की तेल और गैस एक्सप्लोरेशन स्ट्रैटिजी में एक बड़ा और महत्वपूर्ण बदलाव है।