लहरों के नीचे छिपा राज, जानिए क्यों नहीं हिलते गहरे पानी में बने पुलों के पिलर?

नदी या समुद्र के बीच पुल के पिलर बनाना काफी मुश्किल होता है, क्योंकि पानी का तेज बहाव और गहराई काम में बड़ी चुनौती होती है। ऐसे में इंजीनियर एक खास टेक्निक की मदद से पानी के अंदर सेफ जगह बनाते हैं। इसके बाद गहराई में जाकर मजबूत नींव तैयार की जाती है और कंक्रीट-स्टील से पिलर खड़ा किया जाता है। यही मजबूत नींव पूरे पुल को पानी के तेज बहाव में भी टिकाए रखने में मदद करती है।

अपडेटेड Aug 27, 2026 पर 10:02 AM
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नदी या समुद्र के बीच पुल के पिलर बनाना देखने में जितना मुश्किल लगता है, असल में इसके पीछे उतनी ही शानदार इंजीनियरिंग काम करती है। तेज बहाव और ज्यादा गहराई के बावजूद इंजीनियर खास टेक्निक की मदद से पानी के अंदर पुल की मजबूत नींव तैयार करते हैं। कॉफरडैम और कैसन इसी काम में सबसे ज्यादा मददगार होते हैं।

इन टेक्निक की मदद से पानी के बीच निर्माण के लिए एक सेफ जगह बनाई जाती है, ताकि इंजीनियर और मजदूर वहां नींव का काम कर सकें। लेकिन आखिर पानी को रोककर यह जगह कैसे बनाई जाती है और इतनी गहराई में पुल के पिलर कैसे खड़े किए जाते हैं।

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पानी रोकने वाली दीवारमान लीजिए कि किसी नदी के बीच में पुल का एक पिलर खड़ा करना है. इसमें सबसे बड़ी परेशानी यह होती है कि जिस जगह पर नींव की खुदाई होनी है, वहां हर वक्त पानी मौजूद रहता है. इस परेशानी से निपटने के लिए इंजीनियर उस खास जगह के चारों तरफ स्टील या कंक्रीट का एक वाटर-टाइट घेरा बनाते हैं. इसी अस्थायी घेरे को कॉफरडैम कहा जाता है. कॉफरडैम बनने के बाद उसके भीतर जमा पूरे पानी को पंप के जरिए बाहर निकाल दिया जाता है. पानी हटते ही नदी के बीचों-बीच एक सूखी और सेफ जगह मिल जाती है, जहां मजदूर और भारी मशीनें आसानी से खुदाई और पिलर कंस्ट्रक्शन का काम शुरू कर सकते हैं.

कॉफरडैम बनाने का तरीका

कॉफरडैम को तैयार करने के लिए काम की जगह के हिसाब से स्टील शीट पाइल, भारी कंक्रीट, लकड़ी या मिट्टी का उपयोग किया जाता है. कंस्ट्रक्शन प्रोसेस में सबसे पहले पानी के नीचे की ढीली मिट्टी को साफ किया जाता है. इसके बाद सपोर्ट देने वाले पाइल्स लगाए जाते हैं और फिर स्टील की भारी शीटों को जमीन के अंदर तक धंसा दिया जाता है ताकि पानी अंदर न आ सके. जब अंदर का पानी पूरी तरह बाहर निकाल लिया जाता है, तो नींव का काम शुरू होता है. कॉफरडैम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह केवल एक टेम्पररी स्ट्रक्चर होती है. जैसे ही पिलर का कंस्ट्रक्शन पूरा हो जाता है, इस पूरे ढांचे को वहां से हटा लिया जाता है. इसलिए इसका इस्तेमाल 12 से 18 मीटर तक के कम गहरे पानी वाले एरिया में ही किया जाता है.

कैसन टेक्नोलॉजी

पानी बहुत गहरा हो या फिर समुद्र जैसी कंडीशन हो, जहां पानी का प्रेशर बहुत ज्यादा होता है और पुल को भारी वजन संभालना पड़ता है, तो वहां कॉफरडैम काम नहीं आता है. ऐसे बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए कैसन टेक्निक का इस्तेमाल किया जाता है. कैसन असल में एक बहुत बड़ा, खोखला और मजबूत ढांचा होता है, जो पूरी तरह से वाटरप्रूफ होता है. इसे पहले से बाहर तैयार किया जाता है और फिर क्रेन या जहाजों की मदद से तय की गई जगह पर पानी के नीचे उतारा जाता है. कैसन को धीरे-धीरे पानी के तल तक पहुंचाया जाता है और मिट्टी खोदकर इसे गहराई में धंसाया जाता है.

परमानेंट फाउंडेशन

कैसन और कॉफरडैम में सबसे बड़ा फर्क यही है कि कैसन को काम पूरा होने के बाद बाहर नहीं निकाला जाता है. जब कैसन अपनी सही गहराई पर पहुंच जाता है, तो इसके अंदर कंक्रीट और सरिया भरकर इसे पूरी तरह से ठोस बना दिया जाता है. इस तरह यह ढांचा हमेशा के लिए पुल का परमानेंट पार्ट बन जाता है. बंदरगाहों, गहरे समुद्र और नरम मिट्टी वाले इलाकों में जहां भारी कंस्ट्रक्शन बनानी होती हैं, वहां कैसन ही सबसे सेफ ऑप्शन माना जाता है.

कैसन के प्रकार

इंजीनियरिंग में जरूरतों के हिसाब से अलग-अलग तरह के कैसन इस्तेमाल किए जाते हैं. इनमें ओपन कैसन, बॉक्स कैसन और न्यूमैटिक कैसन सबसे मेन हैं. इन्हें बनाने में कंक्रीट, स्टील, मजबूत लकड़ी और चिनाई का इस्तेमाल होता है. सीधे शब्दों में कहें तो कॉफरडैम पानी को रोककर काम करने के लिए बनाई गई एक टेम्पररी प्रोटेक्टिव बैरियर है, जिसे काम खत्म होते ही हटा दिया जाता है. वहीं दूसरी ओर, कैसन एक परमानेंट स्ट्रक्चर है जो कंक्रीट से भरकर खुद पुल का मेन फाउंडेशन बन जाता है.

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