सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने की 30 अक्टूबर की सीमा हटाई, चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल
Delhi SIR Row: सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली के ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से हटाए गए 43 लाख से अधिक मतदाताओं को बड़ी राहत देते हुए 30 अक्टूबर की डेडलाइन का प्रतिबंध हटा दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वह 30 अक्टूबर की समय सीमा के नाम पर वोटर लिस्ट में नए नाम जोड़ने की प्रक्रिया को बंद न करे
Delhi SIR: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली की मतदाता सूची में नाम जोड़ने के लिए 30 अक्टूबर की समय-सीमा हटा दी है
Delhi SIR Row: राजधानी दिल्ली की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से 'स्थायी रूप से बाहर चले जाने' के कारण हटाए गए 43 लाख से अधिक मतदाताओं को बड़ी राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (28 अक्टूबर) को चुनाव आयोग से कहा कि वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने की प्रक्रिया 30 अक्टूबर की समयसीमा के बाद भी जारी रखी जाए। अदालत ने आयोग को मतदाताओं तक गणना फॉर्म पहुंचाने और उन्हें प्राप्त करने के साथ-साथ फॉर्म-6, फॉर्म-7 और फॉर्म-8 स्वीकार करना जारी रखने को कहा।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वह 30 अक्टूबर की समय सीमा के नाम पर वोटर लिस्ट में नए नाम जोड़ने की प्रक्रिया को बंद न करे। बेंच ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर कोई व्यक्ति दिल्ली के भीतर ही एक निर्वाचन क्षेत्र से दूसरे में स्थानांतरित हुआ है, तो उससे फॉर्म 6 मांगना गलत है। आपको फॉर्म 8 भरने की अनुमति देनी चाहिए।"
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची तथा जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने इस मामले की सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग से यह भी सवाल किया कि जिन लोगों के नाम पहले की मतदाता सूचियों में दर्ज थे। लेकिन ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से हटा दिए गए, उनसे नए मतदाता के रूप में रजिस्ट्रेशन कराने वाला फॉर्म-6 भरने के लिए क्यों कहा जा रहा है।
पीठ ने इस मामले में तत्काल कोई औपचारिक आदेश पारित नहीं किया। लेकिन कहा कि वह दो सप्ताह बाद इस मुद्दे पर फिर विचार करेगी। अदालत ने जोर दिया कि प्रयास उन 43 लाख से अधिक लोगों की संख्या कम करने का होना चाहिए, जिनके नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं।
हटाए गए मतदाताओं के नाम और कारण सार्वजनिक करने का सुझाव
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि चुनाव आयोग उन सभी लोगों की सूची प्रकाशित करे, जिनके नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं। लिस्ट में प्रत्येक मतदाता का नाम हटाने का कारण भी स्पष्ट रूप से दर्ज किया जाना चाहिए। पीठ ने सुझाव दिया कि ऐसे मतदाताओं से अपने निकटतम बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) से संपर्क करने और फॉर्म-8 भरने के लिए कहा जा सकता है। आयोग उन्हें गणना फॉर्म भी उपलब्ध करा सकता है, ताकि वे वोटर लिस्ट में अपना नाम दोबारा शामिल कराने के लिए आवश्यक प्रक्रिया पूरी कर सकें।
अदालत ने कहा कि संबंधित लोगों को यह जानकारी दी जानी चाहिए कि वे फॉर्म-6 या फॉर्म-8 में से उपयुक्त फॉर्म भर सकते हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि केवल प्रक्रियागत कारणों से किसी पात्र मतदाता का नाम सूची से बाहर न रह जाए।
'पहले मतदाता रह चुके व्यक्ति से फॉर्म-6 भरने पर जोर कैसे दे सकते हैं?'
टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, यह मामला सामाजिक कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज की ओर से दायर जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया। याचिका पर बहस करते हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने चुनाव आयोग की उस प्रक्रिया पर आपत्ति जताई, जिसके तहत ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से बाहर किए गए लोगों से फॉर्म-6 भरने के लिए कहा जा रहा था।
प्रशांत भूषण की दलील थी कि पहले से मतदाता रह चुके लोगों को फॉर्म-6 भरने के लिए बाध्य करने से उन्हें यह घोषणा करनी पड़ सकती है कि वे पहली बार मतदाता के रूप में रजिस्ट्रेशन करा रहे हैं, जबकि उनका नाम पहले ही वोटर लिस्ट में दर्ज था। इस पर पीठ ने सवाल उठाया कि यदि कोई व्यक्ति पहले से मतदाता था, तो उससे नए वोटर के रूप में नाम दर्ज कराने वाला फॉर्म भरने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है।
अदालत ने कहा कि मतदान का अधिकार एक महत्वपूर्ण अधिकार है। यदि कोई व्यक्ति वसंत कुंज से द्वारका जैसे दिल्ली के एक इलाके से दूसरे इलाके में शिफ्ट हो गया है, कुछ समय के लिए शहर से बाहर चला गया है या किसी अन्य कारण से चुनाव आयोग के नोटिस का जवाब नहीं दे पाया, तो क्या केवल इस वजह से उसे मतदान के अधिकार से वंचित कर दिया जाना चाहिए?
पीठ ने यह भी कहा कि हो सकता है कि किसी व्यक्ति को पता बदलने के कारण गणना फॉर्म मिला ही न हो या वह निर्धारित समय में अपना दावा दाखिल न कर पाया हो। ऐसे मामलों में केवल अनुपस्थिति या प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाने के आधार पर उसका नाम वोटर लिस्ट से स्थायी रूप से हटाना उचित प्रक्रिया के सवाल खड़े करता है।
एक निर्वाचन क्षेत्र से दूसरे में जाने पर फॉर्म-8 की अनुमति देने की बात
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति दिल्ली के एक निर्वाचन क्षेत्र से दूसरे निर्वाचन क्षेत्र में स्थानांतरित हुआ है, तो उससे फॉर्म-6 भरने के लिए कहना गलत हो सकता है। ऐसे मामलों में फॉर्म-8 की अनुमति दी जानी चाहिए। फॉर्म-8 का उपयोग वोटर लिस्ट में दर्ज डिटेल्स में संशोधन, पता बदलने या एक निर्वाचन क्षेत्र से दूसरे निर्वाचन क्षेत्र में शिफ्टिंग जैसी स्थितियों में किया जाता है। वहीं, फॉर्म-6 नए मतदाता के रूप में नाम दर्ज कराने के लिए है और फॉर्म-7 वोटर लिस्ट से नाम हटाने या हटाने पर आपत्ति दर्ज कराने से संबंधित है।
पीठ ने कहा कि जिन लोगों के नाम 'स्थायी रूप से स्थानांतरित' होने के आधार पर हटाए गए हैं, जो इसी तरह की परिस्थितियों में आते हैं, उन्हें फॉर्म-8 भरने की अनुमति दी जानी चाहिए। अदालत की चिंता का मुख्य विषय यह था कि पहले से रजिस्टर्ड मतदाताओं को दोबारा नाम दर्ज कराने की ऐसी प्रक्रिया में न धकेला जाए, जिसमें उन्हें अपनी वास्तविक स्थिति के विपरीत घोषणा करनी पड़े।
चुनाव आयोग ने एक लाख से अधिक जागरूकता शिविर लगाने की बात कही
सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डी. एस. नायडू पेश हुए। उन्होंने अदालत को बताया कि आयोग ने लोगों को मतदाता सूची में अपने नाम दोबारा शामिल कराने की प्रक्रिया के बारे में जागरूक करने के लिए दिल्ली में एक लाख से अधिक शिविर आयोजित किए हैं। आयोग की ओर से इन शिविरों का उल्लेख यह बताने के लिए किया गया कि प्रभावित लोगों को नाम दोबारा दर्ज कराने की प्रक्रिया की जानकारी देने के प्रयास किए गए हैं।
हालांकि, सुनवाई में अदालत ने विशेष रूप से इस बात पर ध्यान दिया कि नाम हटाए जाने के बाद मतदाताओं के लिए उपलब्ध प्रक्रिया व्यावहारिक और उचित होनी चाहिए, खासकर उन लोगों के लिए जिनके नाम पहले की मतदाता सूचियों में मौजूद थे। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस मामले में कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया है। पीठ ने कहा कि वह दो सप्ताह बाद इस मुद्दे की दोबारा समीक्षा करेगी। अदालत ने चुनाव आयोग से नाम हटाए गए मतदाताओं की संख्या कम करने और उन्हें सूची में दोबारा शामिल होने का अवसर देने की दिशा में प्रयास करने को कहा।