केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने समय के गणना को लेकर एक नई जानकारी दी है। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि ग्रीनविच मीन टाइम (GTM) की जगह महाकाल स्टैंडर्ड टाइम की स्थापना की जाए। केंद्रीय मंत्री ने एक वैज्ञानिक चर्चा का आह्वान किया कि क्या "महाकाल स्टैंडर्ड टाइम" को ग्रीनविच मीन टाइम (GMT) के एक वैकल्पिक ढांचे के तौर पर देखा जा सकता है। उन्होंने इस विचार को भारत की सभ्यता और वैज्ञानिक विरासत के संदर्भ में रखा। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश का उज्जैन “समय की गणना का मूल केंद्र” माना जाता है। ‘महाकाल: द मास्टर ऑफ टाइम’ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन के दौरान उन्होंने यह बात कही।
‘महाकाल स्टैंडर्ड टाइम’ पर धर्मेंद्र प्रधान का बड़ा बयान
उज्जैन में आयोजित ‘महाकाल: द मास्टर ऑफ टाइम’ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि समय की गणना के तरीके और नाम पर फिर से विचार किया जा सकता है। उन्होंने वैज्ञानिकों और विचारकों से अपील की कि इस पर खुलकर चर्चा होनी चाहिए। सम्मेलन में उन्होंने कहा कि, उज्जैन वह जगह है, जहां भूमध्य रेखा और कर्क रेखा मिलती हैं और प्राचीन समय में यहीं से दुनिया के समय की गणना की जाती थी। इसलिए अब तार्किक रूप से ग्रीनविच मीन टाइम (GMT) की जगह महाकाल स्टैंडर्ड टाइम (MST) को स्थापित करने का समय आ गया है। उन्होंने यह भी कहा कि आज के आधुनिक एआई (AI) टूल्स भी मानते हैं कि समय की गणना का मूल केंद्र उज्जैन के आसपास का क्षेत्र ही रहा है। अब जरूरत है कि भारत अपने वैज्ञानिक गौरव को फिर से दुनिया के सामने मजबूती से स्थापित करे।
नई सोच विकसित करना है लक्ष्य
उन्होंने कहा कि उज्जैन में साइंस सेंटर और प्लैनेटेरियम को मजबूत करना एक बड़ा कदम है। इससे आने वाली पीढ़ियां वैज्ञानिक सोच के साथ आगे बढ़ सकेंगी। उनके अनुसार, उज्जैन एक ऐसी जगह है जहां आध्यात्मिकता और विज्ञान के बीच की दूरी खत्म हो जाती है और नई सोच विकसित होती है। उन्होंने यह भी जोर देकर कहा कि आध्यात्मिकता के बिना विज्ञान अधूरा है। इसके लिए उन्होंने उज्जैन और वहाँ स्थित पूजनीय महाकाल मंदिर का उदाहरण दिया। महाकाल मंदिर में होने वाली एक खास परंपरा का ज़िक्र करते हुए धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि वैशाख महीने के पहले दिन से भगवान शिव पर मिट्टी के बर्तन से लगातार पानी चढ़ाने की प्रथा सिर्फ धार्मिक नहीं है, बल्कि इसका एक वैज्ञानिक कारण भी है। यह परंपरा गर्मी और पर्यावरण से जुड़ी समस्याओं को समझने और उनसे निपटने का एक तरीका भी मानी जाती है।
कहां से शुरू हुई ग्रीनविच मीन टाइम
बता दें कि, आज का टाइमजोन GTM यानी ग्रीनविच मीन टाइम से ही मैच किया जाता है। ग्रीनविच दक्षिण पूर्वी लंदन का हिस्सा है, जो अब 'रॉयल ऑब्जर्वेटरी' के नाम से मशहूर है। ब्रिटेन ने कानून बनाकर ग्रिनविच वेधशाला के टाइम को पूरे देश में लागू कर दिया गया और बाद में दुनिया ने भी ग्रिनविच मीन टाइम या GMT को अपने समय के मानक के रूप में अपना लियाय़
ग्रीनविच मीन टाइम (GMT) से पहले हर देश और शहर अपना अलग स्थानीय समय मानता था, जो सूरज की स्थिति के हिसाब से तय होता था। इससे यात्रा और संचार में काफी दिक्कत होती थी, खासकर जब रेल और जहाज़ों का उपयोग बढ़ा। साल 1884 में अंतर्राष्ट्रीय मेरिडियन सम्मेलन हुआ, जिसमें दुनिया के कई देशों ने हिस्सा लिया। इस सम्मेलन में तय किया गया कि लंदन के ग्रीनविच से गुजरने वाली रेखा (Prime Meridian) को 0 डिग्री देशांतर माना जाएगा।
क्या है ‘महाकाल स्टैंडर्ड टाइम’
उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर ऐतिहासिक रूप से समय और खगोल विज्ञान से जुड़ा रहा है। प्राचीन भारतीय खगोल विज्ञान में उज्जैन को महत्वपूर्ण स्थान मिला हुआ था। इसे कभी समय गणना का केंद्र माना जाता था। कर्क रेखा के पास होने की वजह से भी इसका वैज्ञानिक महत्व बताया जाता है। कुछ इतिहासकारों का दावा है कि प्राचीन भारत में उज्जैन को “प्रधान मध्याह्न रेखा” (Prime Meridian) माना जाता था, यानी समय की गणना का केंद्र।