'पोलिंग बूथ के CCTV फुटेज से वोटर हो सकते हैं टारगेट', राहुल गांधी की मांग को चुनाव आयोग ने बताया 'खतरनाक'

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने हाल ही में चुनाव आयोग से यह मांग की थी कि लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभा चुनावों की डिजिटल, मशीन-रीडेबल वोटर लिस्ट और वेबकास्टिंग फुटेज सार्वजनिक की जाए, ताकि चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता बनी रहे

अपडेटेड Jun 21, 2025 पर 4:47 PM
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राहुल गांधी की मांग को चुनाव आयोग ने बताया 'खतरनाक'

कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की मांग पर चुनाव आयोग (ECI) ने शनिवार को साफ किया कि मतदान केंद्रों की वेबकास्टिंग या CCTV फुटेज शेयर नहीं की जा सकती, क्योंकि इससे वोटरों की गोपनीयता और सुरक्षा पर खतरा पैदा होता है। साथ ही, आयोग ने इसे कानूनी रूप से भी गलत बताया।

दरअसल राहुल गांधी ने हाल ही में चुनाव आयोग से यह मांग की थी कि लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभा चुनावों की डिजिटल, मशीन-रीडेबल वोटर लिस्ट और वेबकास्टिंग फुटेज सार्वजनिक की जाए, ताकि चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता बनी रहे।

चुनाव आयोग ने क्या जवाब दिया?


चुनाव आयोग ने इस मांग को "तर्कसंगत दिखने वाली लेकिन खतरनाक" बताया। आयोग ने कहा कि वोटिंग के दिन के वीडियो या CCTV फुटेज शेयर करने से वोट डालने या न डालने वाले लोगों की पहचान की जा सकती है, जिससे उन्हें डराया-धमकाया जा सकता है या भेदभाव किया जा सकता है और यह गोपनीय मतदान के अधिकार का उल्लंघन होगा।

आयोग ने यह भी कहा कि कोई राजनीतिक पार्टी अगर किसी बूथ में कम वोट पाती है, तो वह CCTV फुटेज देखकर यह पता लगा सकती है कि किन लोगों ने वोट डाला और किन्होंने नहीं, जिससे वे लोगों को बाद में परेशान कर सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट और कानून का हवाला

चुनाव आयोग ने भारतीय प्रतिनिधित्व अधिनियम (1950/1951) और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा मतदान न करना भी मतदाता का अधिकार है, और यह भी गोपनीय होता है। फुटेज शेयर करना इस गोपनीयता का उल्लंघन है।

RP Act की धारा 128 के तहत वोट की गोपनीयता उल्लंघन करना अपराध है, जिसकी सजा तीन महीने तक की जेल या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।

वीडियो रिकॉर्डिंग में क्या होता है?

चुनाव के दिन की वीडियो रिकॉर्डिंग में दिखता है कि कौन वोटिंग स्टेशन में गया, किस क्रम में गया और उनका चेहरा – ये सब Form 17A जैसी संवेदनशील जानकारी होती है। अगर यह जानकारी सार्वजनिक हुई, तो वोटरों की पहचान और सुरक्षा खतरे में आ सकती है।

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