Explainer: क्या इस्तीफा देकर बच निकले पूर्व जज यशवंत वर्मा? जानें संसद में रिपोर्ट पेश होने के बाद अब क्या होगी कार्रवाई

Yashwant Varma Cash Row: एक रिपोर्ट के मुताबिक, इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस यशवंत वर्मा के इस्तीफे के बावजूद उनके खिलाफ संसद में चल रही कार्रवाई जारी रहने की संभावना है। रिपोर्ट में एक केंद्रीय मंत्री के हवाले से कहा गया है कि वर्मा के इस्तीफे से कार्रवाई खत्म नहीं होगी, क्योंकि उनके पद छोड़ने से पहले ही उन्हें हटाने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया था

अपडेटेड Aug 13, 2026 पर 12:14 PM
Yashwant Varma Cash Row: पूर्व जज जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ आरोप साबित हुए हैं

Yashwant Varma Cash Row: इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित आधिकारिक आवास से भारी मात्रा में कैश बरामद होने के मामले में लोकसभा स्पीकर ओम बिरला द्वारा गठित जांच समिति ने उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों को साबित पाया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वह संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सके। समिति की रिपोर्ट बुधवार को संसद के दोनों सदनों, लोकसभा और राज्यसभा में पेश की गई। रिपोर्ट में कहा गया कि दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व जज वर्मा अपने आधिकारिक आवास के स्टोर रूम में मिली कैश की मौजूदगी, उसके स्रोत या स्वामित्व के संबंध में संतोषजनक स्पष्टीकरण देने में विफल रहे।

जारी रहेगी कार्यवाही?

जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास से करेंसी मिलने के मामले में उनकी ओर से इस्तीफा दिए जाने के बावजूद संसदीय कार्रवाई खत्म होती नजर नहीं आ रही है। 'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के मुताबिक, एक केंद्रीय मंत्री ने कहा है कि जस्टिस वर्मा का इस्तीफा संसदीय कार्यवाही को समाप्त नहीं करता, क्योंकि उनके खिलाफ हटाने का प्रस्ताव इस्तीफे से पहले ही स्वीकार किया जा चुका था। अब संसद को जांच समिति की रिपोर्ट पर विचार करना होगा। फिर यह भी तय करना होगा कि वर्मा के मामले में उनके पेंशन, अन्य रिटायरमेंट लाभ और सुविधाओं को लेकर क्या कदम उठाया जाए।


समिति ने यह भी कहा कि महत्वपूर्ण साक्ष्यों को सुरक्षित या संरक्षित नहीं किया गया। कानूनी तरीके से स्टोर रूम को सील करने तथा उसका निरीक्षण किए जाने से पहले वहां मौजूद साक्ष्यों की स्थिति से छेड़छाड़ की गई। समिति ने पाया कि जस्टिस वर्मा का स्पष्टीकरण ऐसी परिस्थितियों में अपेक्षित स्पष्टवादिता, पारदर्शिता और संस्थागत जिम्मेदारी को प्रदर्शित नहीं करता। समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा, "स्वतंत्र आधिकारिक गवाहों के साक्ष्य और पुष्टिकारक सामग्री के आधार पर जांच किए जाने पर उनका स्पष्टीकरण टालमटोल वाला और असंतोषजनक रहा।"

पिछले साल बरामद हुआ अधजली गड्डियां

जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास में 14 मार्च 2025 की रात आग लग गई थी। आग बुझाने पहुंचे दमकलकर्मियों को कथित तौर पर एक स्टोर रूम में नोटों की अधजली गड्डियां मिली थीं। घटना के बाद, जस्टिस वर्मा ने पद से इस्तीफा दे दिया और उन्हें पद से हटाने की प्रक्रिया लगभग निष्प्रभावी हो गई है। हालांकि, उनके इस्तीफे को अभी तक कानून मंत्रालय ने अधिसूचित नहीं किया है। विवाद के बाद जस्टिस वर्मा को उनके मूल अदालत इलाहाबाद हाई कोर्ट भेज दिया गया था जो घटना के समय दिल्ली हाई कोर्ट के जज थे।

तत्कालीन चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) संजीव खन्ना द्वारा गठित आंतरिक समिति इस निष्कर्ष पर पहुंची थी कि जस्टिस वर्मा का उस विशेष स्टोर रूम पर सक्रिय या मौन नियंत्रण था, जहां कथित तौर पर नकदी रखी गई थी। जुलाई 2025 में 200 से अधिक सांसदों ने जस्टिस वर्मा को पद से हटाने के लिए उन पर महाभियोग चलाने के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद, अगस्त में बिरला ने आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय जजों की जांच समिति का गठन किया था।

जांच के बीच दिया इस्तीफा

हालांकि, संसद द्वारा पद से हटाए जाने की आशंका के मद्देनजर जस्टिस वर्मा ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज पद से इस्तीफा दे दिया, जिससे उनके खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही निष्प्रभावी हो गई। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति और हटाने की प्रक्रिया से जुड़े जानकारों के अनुसार, शीर्ष अदालत के एक फैसले के मुताबिक, जब कोई जज राष्ट्रपति को इस्तीफा सौंपते हैं और उसकी प्रति सार्वजनिक कर दी जाती है तो माना जाता है कि जज ने इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने बताया कि जज का इस्तीफा राष्ट्रपति की स्वीकृति पर निर्भर नहीं करता। प्रक्रिया के तहत राष्ट्रपति औपचारिक रूप से इस्तीफा स्वीकार करते हैं, जिसके बाद कानून मंत्रालय का न्याय विभाग इसकी अधिसूचना जारी करता है।

17 महीने बाद संसद में पेश हुई जांच रिपोर्ट

जस्टिस वर्मा के खिलाफ जांच करने वाली तीन सदस्यीय समिति ने 18 मई 2026 को अपनी रिपोर्ट लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को सौंप दी थी। यह रिपोर्ट बुधवार 12 अगस्त को संसद में पेश की गई। पीटीआई के मुताबिक रिपोर्ट में समिति ने वर्मा के खिलाफ लगाए गए तीनों आरोपों को सिद्ध माना है।

करेंसी मिलने की घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इन-हाउस जांच का आदेश दिया। जांच समिति ने बाद में निष्कर्ष निकाला कि जिस स्टोर रूम से कैश मिली, उस पर जस्टिस वर्मा का प्रत्यक्ष या मौन नियंत्रण था। अप्रैल 2025 में उनका तबादला इलाहाबाद हाई कोर्ट कर दिया गया, लेकिन उन्हें कोई न्यायिक काम नहीं सौंपा गया। इसके बाद मामला संसद तक पहुंचा।

संसद में कैसे शुरू हुई कार्रवाई?

21 जुलाई 2025 को लोकसभा के 146 सांसदों ने जस्टिस वर्मा को पद से हटाने की मांग वाला प्रस्ताव पेश किया। लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने 12 अगस्त 2025 को प्रस्ताव स्वीकार करते हुए मामले की जांच के लिए जजेज (इंक्वायरी) एक्ट, 1968 के तहत तीन सदस्यीय समिति गठित की। समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार ने की। इसमें बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस श्री चंद्रशेखर और वरिष्ठ अधिवक्ता बीवी आचार्य शामिल थे। खास बात यह है कि जस्टिस वर्मा ने अप्रैल 2026 में इस्तीफा दे दिया। लेकिन इसके बावजूद समिति ने अपनी जांच जारी रखी और 18 मई को रिपोर्ट लोकसभा स्पीकर को सौंप दी।

जांच समिति ने क्या कहा?

समिति ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ तीन आरोपों की जांच की और तीनों को साबित माना:-

पहला आरोप: जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास से बड़ी मात्रा में कथित तौर पर ₹500 के अधजले नोट मिले थे। समिति के मुताबिक, वर्मा नकदी की मौजूदगी, उसके स्रोत और मालिकाना हक को लेकर संतोषजनक जवाब नहीं दे सके।

दूसरा आरोप: आग लगने के बाद घटनास्थल पर मौजूद सामग्री और कथित कैश को पर्याप्त तरीके से सुरक्षित नहीं रखा गया। समिति ने माना कि महत्वपूर्ण साक्ष्य को संरक्षित करने में लापरवाही हुई और बाद में करेंसी उपलब्ध नहीं रही। इस आरोप को साबित करने के लिए समिति के लिए यह जरूरी नहीं था कि कैश वर्मा ने खुद हटाई थी।

तीसरा आरोप: समिति ने पूर्व जज वर्मा के स्पष्टीकरण को टालमटोल वाला और भ्रामक माना। उसके अनुसार, उनके जवाब कथित नकदी की मौजूदगी और बाद में उसके गायब होने की पर्याप्त व्याख्या नहीं कर सके। इस तरह समिति ने तीनों आरोपों को सिद्ध माना।

जस्टिस वर्मा ने क्या सफाई दी?

जस्टिस वर्मा ने कैश के बारे में किसी भी जानकारी से इनकार किया था। तत्कालीन चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया संजय खन्ना को दिए जवाब में उन्होंने कहा था कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी कि आउटहाउस के स्टोर रूम में कोई पैसा रखा गया था। उन्होंने कहा था कि न तो उन्हें और न ही उनके परिवार को कथित नकदी के बारे में जानकारी थी। उन्होंने परिसर से करेंसी हटाए जाने के आरोपों से भी इनकार किया।

वर्मा ने कथित नकदी की बरामदगी के तरीके पर भी सवाल उठाए थे। उनका कहना था कि आग बुझाने के लिए पहुंचे पुलिस और दमकल अधिकारियों ने करेंसी को औपचारिक रूप से जब्त नहीं किया, न कोई जब्ती मेमो बनाया और न ही नकदी की सूची तैयार की। हालांकि, जांच समिति ने उनकी दलीलों को स्वीकार नहीं किया और तीनों आरोपों को सिद्ध माना।

इस्तीफा देने के बाद क्या संसद कार्रवाई कर सकती है?

क्या इस्तीफा देने के बाद संसद जस्टिस वर्मा पर कार्रवाई कर सकती है? यही इस पूरे मामले का सबसे अहम संवैधानिक और संसदीय सवाल है। जस्टिस यशवंत वर्मा ने 9 अप्रैल 2026 को इस्तीफा दे दिया था। उस समय उनके खिलाफ संसद में कार्रवाई की प्रक्रिया चल रही थी। शुरू में माना जा रहा था कि इस्तीफे के बाद उन्हें पद से हटाने की प्रक्रिया का कोई व्यावहारिक मतलब नहीं रह जाएगा और मामला वहीं खत्म हो सकता है।

लेकिन अब जांच रिपोर्ट संसद में पेश हो चुकी है। 'द इंडियन एक्सप्रेस' के मुताबिक, सरकारी सूत्रों का कहना है कि चूंकि वर्मा के खिलाफ प्रस्ताव उनके इस्तीफे से पहले ही स्वीकार किया जा चुका था। इसलिए मामला पूरी तरह खत्म नहीं माना जा रहा। एक केंद्रीय मंत्री के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि संसद को अब वर्मा के आचरण पर विचार करना होगा। उनके पेंशन तथा अन्य रिटायरमेंट लाभों को लेकर फैसला करना होगा।

महाभियोग प्रक्रिया शीतकालीन सत्र में आगे बढ़ाने की संभावना

केंद्र सरकार संसद के शीतकालीन सत्र में वर्मा के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकती है, क्योंकि लोकसभा स्पीकर द्वारा गठित एक समिति ने उनके सरकारी आवास से नोटों की अधजली गड्डियां मिलने के मामले में उन्हें दोषी पाया है। यह जांच समिति उस वक्त गठित की गई थी, जब लगभग 200 सांसदों ने संसद द्वारा जस्टिस वर्मा को पद से हटाने की मांग की थी। वर्मा ने पद से इस्तीफा दे दिया, लेकिन कानून मंत्रालय ने अभी तक उनके इस्तीफे की अधिसूचना जारी नहीं की है। इलाहाबाद हाई कोर्ट के जजों की लिस्ट में उनका नाम अब भी शामिल है।

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इस मामले से अवगत सूत्रों ने बताया कि सरकार शीतकालीन सत्र के दौरान जस्टिस वर्मा के महाभियोग की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के प्रस्ताव पर विचार कर रही है। जज द्वारा भेजे गए इस्तीफे के बारे में पूछे जाने पर सूत्रों ने कहा कि जब हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का कोई जज इस्तीफा देता है, तो आमतौर पर उसे मंज़ूर मान लिया जाता है। हालांकि,जस्टिस वर्मा के मामले में त्याग पत्र संसद में उन्हें हटाने की प्रक्रिया शुरू होने के बाद ही भेजा गया था, इसलिए उनका इस्तीफा अभी तक मंजूर नहीं किया गया है।

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