Bihar Liquor Ban: इकोनॉमिक थिंक टैंक नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER) की नई स्टडी में बिहार में विकास कार्यों के लिए राजस्व जुटाने के उद्देश्य से शराबबंदी हटाने का प्रस्ताव दिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, 2016 में शराबबंदी लागू होने के बाद से बिहार में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में कमी नहीं आई है। बल्कि 2016 के बाद की अवधि में कुल दर्ज अपराधों में बढ़ोतरी देखी गई है। रिसर्च रिपोर्ट में कहा गया है कि बिहार को शराब पर लगा बैन तुरंत हटा लेना चाहिए।
रिपोर्ट के मुताबिक, शराब पर बैन महिलाओं के खिलाफ हिंसा को बढ़ने से रोकने में पूरी तरह से नाकाम रहा है। साथ ही, कुछ सबूतों से पता चलता है कि कानूनी शराब की जगह अब गैर-कानूनी ड्रग्स और शराब का सेवन बढ़ गया है। 'बिहार की विकास उपलब्धियां, अधूरा एजेंडा और आगे की राह' (Macro Perspective of Bihar's Development Achievements, Unfinished Agenda, and the Way Forward) नाम के इस पेपर में यह भी कहा गया है कि शराब पर एक्साइज ड्यूटी को बैन से पहले वाले स्तर पर लाने से राज्य की अपनी कमाई 14-15% बढ़ सकती है।
साथ ही कानून लागू करने और तस्करी रोकने के ऑपरेशन पर होने वाला खर्च भी कम हो सकता है। रत्ना सहाय की अगुवाई में अर्थशास्त्रियों की एक टीम द्वारा तैयार और इंडिया पॉलिसी फोरम में पेश किए गए इस रिपोर्ट में अप्रैल 2016 में लागू बिहार में शराबबंदी के आर्थिक और सामाजिक असर की जांच की गई।
शराबबंदी से महिलाओं के खिलाफ अपराध कम नहीं हुए
स्टडी रिपोर्ट में कहा गया है कि शराबबंदी लागू करने की मुख्य वजह यह सोच थी कि शराब पीने से घरेलू हिंसा बढ़ती है। साथ ही परिवार शराब पर खर्च होने वाले पैसे को ज्यादा काम की चीजों में लगाएंगे। महिला समूहों और कार्यकर्ताओं ने भी बैन का जोरदार समर्थन किया था। उनका तर्क था कि शराबबंदी से शराब से जुड़ी हिंसा और दुर्व्यवहार कम होगा। हालांकि, NCAER के रिसर्चर्स का कहना है कि अब उपलब्ध डेटा से यह पता लगाया जा सकता है कि क्या वे मकसद पूरे हुए या नहीं।
टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक रिपोर्ट में कहा गया है, "अब हमारे पास यह पता लगाने के लिए काफी डेटा और जानकारी है कि क्या शराब पर प्रतिबंध असरदार रहा या नहीं...। बिहार में शराबबंदी लागू होने के बाद महिलाओं के खिलाफ दर्ज अपराधों में कमी नहीं आई है। बल्कि, 2016 के बाद महिलाओं के खिलाफ कुल दर्ज अपराधों में बढ़ोतरी हुई है।"
स्टडी के मुताबिक, उपलब्ध सबूत यह नहीं दिखाते कि शराबबंदी के बाद महिलाओं के खिलाफ अपराधों में बड़े पैमाने पर कमी आई है। इसके बजाय, इसमें कहा गया है कि प्रतिबंध के साथ-साथ अवैध शराब के नेटवर्क के विस्तार, इसे लागू करने में आने वाली मुश्किलों और भ्रष्टाचार को लेकर चिंताएं भी बढ़ीं। पेपर में अवैध ड्रग्स समेत दूसरे नशीले पदार्थों के बढ़ते इस्तेमाल की ओर भी इशारा किया गया।
शराब के कारोबार में काफी बढ़ोतरी
स्टडी से पता चला है कि अवैध शराब के कारोबार में काफी बढ़ोतरी हुई है। इससे शराब की खपत बढ़ी। साथ ही अपराध और भ्रष्टाचार में भारी इजाफा हुआ। इसके अलावा अवैध ड्रग्स जैसे दूसरे नशीले पदार्थों का इस्तेमाल भी बढ़ा।
शराबबंदी से राज्य की कमाई पर भी असर
NCAER के पेपर में कहा गया है कि प्रतिबंध के बाद बिहार को काफी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। शराबबंदी से पहले, प्रतिबंध से ठीक पहले के तीन सालों में राज्य की अपनी कमाई में शराब पर लगने वाली एक्साइज ड्यूटी का हिस्सा लगभग 14 प्रतिशत था। साथ ही, सरकार को निगरानी, कानून लागू करने और तस्करी रोकने के अभियानों पर ज्यादा खर्च करना पड़ा, जिससे पेपर के अनुसार आर्थिक दबाव बढ़ा।
रिसर्च करने वालों का तर्क था कि शराब पर एक्साइज ड्यूटी को पुराने स्तर पर बहाल करने से राज्य की कमाई में इस टैक्स का योगदान फिर से लगभग 14 प्रतिशत तक लाने में मदद मिल सकती है। स्टडी का निष्कर्ष यह था कि शराबबंदी अपने मकसद को हासिल नहीं कर पाई। इसके बजाय महिलाओं के खिलाफ दर्ज अपराधों में बढ़ोतरी, राज्य की कमाई में नुकसान और कानून लागू करने पर ज्यादा खर्च जैसी स्थितियां पैदा हुईं।