Mohan Bhagwat ON Gen Z: NEET पेपर लीक विवाद को लेकर भारत की 'जेनरेशन Z' (Gen Z) के विरोध-प्रदर्शन के खत्म होने के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने युवा पीढ़ी को भावुक और हालात के हिसाब से ढलने वाला बताया है। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि वे अक्सर "शांत मन" से नहीं सोचते।
हैदराबाद में एक कार्यक्रम में बोलते हुए RSS प्रमुख ने कहा कि यह पीढ़ी उन चीजों से आसानी से प्रभावित हो जाती है जो साफ तौर पर असली लगती हैं। भागवत ने कहा कि यही चीज सामाजिक आंदोलनों को लेकर उनकी सोच पर असर डालती है।
भागवत ने कहा, "Gen Z स्वभाव से अच्छी हालात के हिसाब से ढलने वाली और भावुक पीढ़ी है। वे बहुत शांत मन से नहीं सोचते। अगर कोई चीज उन्हें साफ तौर पर असली लगती है, तो वे उससे जुड़ जाते हैं।"
भागवत की ये बातें कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में हफ़्तों तक चले छात्र विरोध-प्रदर्शनों के बाद सामने आईं। इन प्रदर्शनों ने तब राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा जब एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल पर बैठे।
20 जुलाई को दिल्ली में हुआ था बवाल
20 जुलाई को 'संसद चलो' मार्च के दौरान तनाव बढ़ गया, जब संसद की ओर बढ़ रही भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने कथित तौर पर आंसू गैस छोड़ी और लाठीचार्ज किया। पुलिस की कार्रवाई के बावजूद, युवा विरोध-प्रदर्शन पर डटे रहे और शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े की मांग करते रहे।
आखिरकार, बढ़ती मांग के बीच धर्मेंद्र प्रधान ने पद छोड़ दिया और सरकार व CJP ने एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में घोषणा की है कि संगठन की अन्य मांगें भी मान ली गई हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने LGBTQ+ समुदाय के बारे में भी बात की। उन्होंने कहा कि LGBTQ+ भारतीय समाज का ही हिस्सा हैं। उन्हें समाज से अलग-थलग नहीं किया जाना चाहिए।
"जेन-जेड वाले दूसरों की देखा-देखी चीजें करते हैं"
मोहन भागवत ने हैदराबाद में विश्व मांगल्य सभा द्वारा 'समकालीन मातृत्व' विषय पर आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए यह भी कहा कि 'जेन-जेड' वाले दूसरों की देखा-देखी चीजें करते हैं। वे भावुक होते हैं और शांत मन से नहीं सोचते। भागवत ने कहा कि 'जेन-जेड' वालों को जो बात सही लगती है, उसी की ओर वे आकर्षित हो जाते हैं। 'जेन जेड' उस पीढ़ी को कहा जाता है जो 1997 से 2012 के बीच पैदा हुई है।
उन्होंने कहा, "विवाह एक अनुशासन है, जो धर्म के संस्कार देता है। इसका विकल्प 'सह-जीवन' संबंध है। इसके परिणाम क्या हैं? हमें जिम्मेदारियां नहीं, बल्कि सिर्फ खुशी चाहिए। जब तक मन हो साथ रहो और जब मन न हो तो अलग हो जाओ। कोई जिम्मेदारी नहीं। इससे क्या बढ़ेगा? क्या बढ़ रहा है, दुनिया भर में यह देखा जा सकता है।" उन्होंने कहा कि हालांकि, आधुनिकता भी जरूरी है। समय के साथ बदलना भी देश की परंपराओं का एक नियम है।
भागवत ने कहा कि माता-पिता को मोबाइल फोन के इस्तेमाल में अनुशासन अपनाना चाहिए। उन्होंने नई पीढ़ी के बच्चों के सवालों के जवाब देने और परिवार से जुड़े विभिन्न मुद्दों को सुलझाने के लिए परिवार के सदस्यों के बीच बातचीत को भी महत्वपूर्ण बताया। मोबाइल फोन का बहुत ज्यादा इस्तेमाल समेत नई पीढ़ी की जीवनशैली को लेकर माता-पिता की चिंताओं पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि बड़ों को खुद वैसा ही आचरण करना चाहिए जैसा वे नयी पीढ़ी में देखना चाहते हैं।
भागवत ने कहा, "समाज में जो बदलाव आप देखना चाहते हैं, उसकी शुरुआत खुद से करें। सोशल मीडिया पर अपना समय कम करें। मोबाइल के इस्तेमाल में अनुशासन बरतें। हम सरकार की ओर देखते हैं। हमारी परंपरा में सरकार का स्थान दूसरा है, समाज का पहला। (हम कहते हैं कि) सरकार को यह या वह कानून बनाना चाहिए...जबकि हम खुद अपने घर पर भी ऐसा कर सकते हैं।" उन्होंने कहा, "हम बच्चों को मोबाइल के इस्तेमाल के नियम तो बताते हैं, लेकिन खुद मोबाइल से इतने जुड़े हुए हैं कि बच्चा रोने पर मां उसे मोबाइल थमा देती है।"