Vande Mataram Controversy: "देश में रहना है तो..." वंदे मातरम को लेकर शुभेंदु अधिकारी और मुस्लिम संगठन आमने-सामने
Vande Mataram Controversy: पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा है कि अगर लोग इस देश में रहना चाहते हैं तो उन्हें वंदे मातरम बोलना और राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करना होगा। उन्होंने इस प्रथा को भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म का अभिन्न अंग बताया।
“वंदे मातरम् गाना होगा, देश में रहना है तो संस्कृति माननी होगी”: शुभेंदु अधिकारी
Vande Mataram Controversy: पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा है कि अगर लोग इस देश में रहना चाहते हैं तो उन्हें वंदे मातरम बोलना और राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करना होगा। बता दें कि अधिकारी का यह बयान पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा स्कूलों की सभाओं में वंदे मातरम को अनिवार्य बनाने के फैसले पर चल रही बहस के बीच आया है।
पत्रकारों को संबोधित करते हुए शुभेंदु अधिकारी ने कहा, “अगर आप देश में रहना चाहते हैं तो आपको वंदे मातरम बोलना होगा। अगर आप देश में रहना चाहते हैं तो आपको जन गण मन का जाप करना होगा। अगर आप देश में रहना चाहते हैं तो आपको 26 जनवरी (गणतंत्र दिवस) और 15 अगस्त (स्वतंत्रता दिवस) मनाना होगा।”
उन्होंने इस प्रथा को भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म का अभिन्न अंग बताया। भाजपा नेता ने स्कूलों में वंदे मातरम् गाने की शुरुआत का भी समर्थन किया। उन्होंने कहा, "हमने हर स्कूल में वंदे मातरम् गाना शुरू कराया है।"
मौसम की स्थिति का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि स्कूलों को सलाह दी गई है कि “अगर वे सुबह वंदे मातरम गाना चाहें तो गा सकते हैं।”
देश की संस्कृति को मानना पड़ेगा
अधिकारी ने आगे कहा, “भारत का नाम हिंदुस्तान भी है” और इस बात पर जोर दिया कि “अगर आप देश में रहना चाहते हैं, तो आपको देश की संस्कृति का पालन करना होगा।” उन्होंने यह भी कहा कि “यह देश किसी और का नहीं हो सकता।”
ये बयान पश्चिम बंगाल सरकार के उस फैसले को लेकर मचे बवाल के बीच आई हैं, जिसमें सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में सुबह की सभाओं के दौरान वंदे मातरम गाना अनिवार्य कर दिया गया है।
AIMPLB ने किया कड़ा विरोध
समाचार एजेंसी PTI के अनुसार, यह निर्देश राज्य के मदरसों पर भी तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया गया है। हालांकि, इस फैसले का अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने कड़ा विरोध किया है। संगठन का कहना है कि यह कदम संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों का उल्लंघन है।
मंगलवार को जारी एक बयान में संगठन ने कहा कि यह निर्देश "न केवल संविधान की भावना के विपरीत है, बल्कि भारत की धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक परंपराओं के भी विरुद्ध है।"
AIMPLB ने बंगाल भर के सरकारी स्कूलों और सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त मदरसों में वंदे मातरम के सभी श्लोकों के अनिवार्य पाठ पर भी चिंता व्यक्त की। संगठन ने मांग की कि अधिसूचना या तो वापस ली जाए या मुस्लिम छात्रों को इसके कार्यान्वयन से छूट दी जाए।
राज्य सरकार के फैसले को AIMPLB के प्रवक्ता ने बताया मौलिक अधिकारों के विपरीत
बोर्ड के प्रवक्ता एसक्यूआर इलियास ने कहा कि छात्रों को उनके धार्मिक विश्वासों के विपरीत गीत का पाठ करने के लिए बाध्य करना संविधान के अनुच्छेद 19, 25 और 28(3) के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
उन्होंने बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि किसी भी नागरिक को ऐसे राष्ट्रीय या धार्मिक समारोह में भाग लेने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है जो उनके सच्चे विश्वासों के विरुद्ध हो।
इलियास के मुताबिक, वंदे मातरम की कुछ पंक्तियों में ऐसे विचार हैं जिन्हें मुसलमान एकेश्वरवाद के इस्लामी सिद्धांत के विपरीत मानते हैं।
PTI के अनुसार, उन्होंने कहा, “इसलिए, मुस्लिम छात्रों को यह गीत गाने के लिए मजबूर करना उनकी धार्मिक पहचान और संवैधानिक स्वतंत्रता का सीधा उल्लंघन है।”
संगठन ने आगे तर्क दिया कि एक धर्मनिरपेक्ष राज्य को एक समुदाय की धार्मिक या सांस्कृतिक परंपराओं को दूसरे समुदाय पर थोपना नहीं चाहिए।
इस संगठन ने पश्चिम बंगाल के मुस्लिम छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों से अपने कानूनी और संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक रहने और उत्पीड़न की स्थिति में कानूनी उपाय अपनाने का आग्रह किया।
वंदे मातरम पूरे देश का राष्ट्रीय गीत है- किरने रिजिजू
इस बीच, केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने भी इस मुद्दे पर अपनी राय व्यक्त की और राष्ट्रगान का राजनीतिकरण करने के प्रयासों की आलोचना की।
इस विवाद पर बोलते हुए रिजिजू ने कहा, “वंदे मातरम पूरे देश का राष्ट्रीय गीत है। यह सिर्फ मेरा, आपका, किसी एक राज्य का या किसी विशेष धर्म का नहीं है; बल्कि पूरे राष्ट्र का गीत है।”
उन्होंने आगे कहा कि सभी को इस गीत का उचित सम्मान करना चाहिए और इस मुद्दे का राजनीतिकरण करने की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।