Sabang Port Deal: ग्रेट निकोबार से सिर्फ 100 मील दूर! PM मोदी कर आये वो डील जो हिंद महासागर में चीन को देगी शिकस्त

Sabang Port Deal: रणनीतिक महत्व के साथ-साथ सबांग बंदरगाह भारत की 'एक्ट ईस्ट नीति' को भी मजबूती देगा। इससे अंडमान-निकोबार द्वीप समूह और इंडोनेशिया के आचे प्रांत के बीच समुद्री संपर्क बेहतर होगा। इसके अलावा बंगाल की खाड़ी में व्यापार, पर्यटन और माल ढुलाई से जुड़ी सुविधाओं का भी विस्तार होने की उम्मीद है।

अपडेटेड Jul 07, 2026 पर 10:55 PM
भारत ने स्ट्रेट ऑफ मलक्का में अपनी रणनीतिक मौजूदगी बढ़ाने जा रहा है।

होर्मुज की अहमियत को देखने के बाद भारत ने स्ट्रेट ऑफ मलक्का में अपनी रणनीतिक मौजूदगी बढ़ाने जा रहा है। भारत और इंडोनेशिया ने इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप के उत्तरी हिस्से में स्थित रणनीतिक रूप से अहम सबांग बंदरगाह को मिलकर विकसित करने के लिए एक समझौता किया है। इस समझौते से दोनों देशों के बीच समुद्री सहयोग और मजबूत होगा। साथ ही, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की रणनीतिक स्थिति भी और बेहतर होगी। सबांग पोर्ट भारत में बन रहे ग्रेट निकोबार ट्रांसशिपमेंट पोर्ट से करीब 160 किलोमीटर दूर है। यह मलक्का स्ट्रेट के पास स्थित है, जहां से दुनिया के बड़े हिस्से का समुद्री व्यापार और तेल-गैस की आपूर्ति होती है।

यह समझौता ऐसे समय में हुआ है, जब भारत विदेशी पोर्ट पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है और पूर्वी हिंद महासागर में अपनी समुद्री ताकत और मौजूदगी को लगातार मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है।

सबांग पोर्ट क्यों है इतना अहम?


मलक्का स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। दुनिया के बड़े हिस्से का व्यापार और तेल-गैस की आपूर्ति इसी रास्ते से होती है। चीन के लिए भी यह समुद्री मार्ग बेहद अहम है। उसके कच्चे तेल का करीब 80 प्रतिशत आयात और लगभग 60 प्रतिशत सामान का व्यापार इसी रास्ते से होकर गुजरता है। भारत के लिए सबांग पोर्ट की अहमियत भी काफी ज्यादा है। यह परियोजना भारत में बन रहे ग्रेट निकोबार ट्रांसशिपमेंट पोर्ट को और मजबूत करेगी। दोनों बंदरगाह मिलकर मलक्का स्ट्रेट के आसपास भारत की रणनीतिक मौजूदगी को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाएंगे।

रणनीतिक महत्व के साथ-साथ सबांग बंदरगाह भारत की 'एक्ट ईस्ट नीति' को भी मजबूती देगा। इससे अंडमान-निकोबार द्वीप समूह और इंडोनेशिया के आचे प्रांत के बीच समुद्री संपर्क बेहतर होगा। इसके अलावा बंगाल की खाड़ी में व्यापार, पर्यटन और माल ढुलाई से जुड़ी सुविधाओं का भी विस्तार होने की उम्मीद है।

व्यापार और भविष्य की संभावनाएं

फिलहाल सबांग एक छोटा पोर्ट है, जहां करीब 50 हजार टन तक के जहाज आ सकते हैं। यहां माल चढ़ाने और उतारने का काम अभी ज्यादातर जहाजों में लगी क्रेनों की मदद से किया जाता है। समुद्री मामलों के जानकारों का मानना है कि भविष्य में सबांग को एक बड़े क्षेत्रीय ट्रांसशिपमेंट हब के रूप में विकसित किया जा सकता है। इससे दक्षिण-पूर्व एशिया के छोटे बंदरगाहों तक सामान पहुंचाना आसान होगा और इस क्षेत्र में व्यापार को नई गति मिलेगी।

नेशनल मैरीटाइम फाउंडेशन के पूर्व निदेशक विजय सखूजा के अनुसार, भविष्य में सबांग बंदरगाह को बंगाल की खाड़ी के कई बड़े बंदरगाहों, जैसे चट्टोग्राम और यांगून, से कंटेनर जहाजों के जरिए जोड़ा जा सकता है। इसके अलावा हल्दिया, चट्टोग्राम और दावेई जैसे बंदरगाहों के साथ कच्चा तेल, पेट्रोलियम उत्पाद, कोयला, लौह अयस्क, उर्वरक और अनाज जैसी वस्तुओं की आवाजाही भी आसान हो सकती है।

एक्सपर्ट का मानना है कि यह सिर्फ व्यापार के लिए ही नहीं, बल्कि रणनीतिक रूप से भी भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण है। जरूरत पड़ने पर पूर्वी हिंद महासागर में गश्त, मानवीय सहायता और आपदा राहत अभियानों के दौरान भारतीय नौसेना इस बंदरगाह का इस्तेमाल ईंधन भरने, जरूरी सामान उपलब्ध कराने और जहाजों के रखरखाव के लिए भी कर सकती है। इससे भारत और इंडोनेशिया के बीच समुद्री सहयोग और मजबूत होने की उम्मीद है।

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