विदेशी खाद पर निर्भरता होगी खत्म! यूरिया के विकल्प पर सरकार का बड़ा दांव, 66% सस्ती भी पड़ेगी
Urea Alternative: भारत सरकार यूरिया के विकल्प के तौर पर ग्रीन अमोनिया का बड़ा परीक्षण कर रही है। छह राज्यों में 10,000 एकड़ खेतों पर इसकी आजमाइश होगी। दावा है कि इससे खाद की लागत एक-तिहाई तक आ सकती है और आयात पर निर्भरता घट सकती है। समझिए पूरी तस्वीर।
भारत हर साल खाद और उसे बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल पर बड़ी रकम खर्च करता है।
भारत में यूरिया की जगह ग्रीन अमोनिया इस्तेमाल करने की तैयारी चल रही है। सरकार छह राज्यों में 10,000 एकड़ खेतों पर इसका परीक्षण कर रही है। मकसद यह पता लगाना है कि इससे खेती की लागत घट सकती है या नहीं। साथ ही, खाद का इस्तेमाल भी ज्यादा असरदार तरीके से हो सकेगा। सरकार देश में ग्रीन अमोनिया की मांग बढ़ाना भी चाहती है। नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने Moneycontrol को यह जानकारी दी है।
ग्रीन अमोनिया पर सरकार का फोकस क्यों
अमोनिया का इस्तेमाल यूरिया और दूसरी नाइट्रोजन वाली खाद बनाने में होता है। अभी इसे बनाने के लिए ज्यादातर प्राकृतिक गैस से मिलने वाली हाइड्रोजन का इस्तेमाल किया जाता है। यानी इसका उत्पादन जीवाश्म ईंधन पर निर्भर है। भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर अमोनिया देश में ही बनाता है। फिर भी कुछ मात्रा विदेशों से मंगानी पड़ती है।
अब सरकार यह जांच रही है कि ग्रीन अमोनिया को यूरिया में बदले बिना सीधे खेत की मिट्टी में डाला जा सकता है या नहीं। ग्रीन अमोनिया बनाने के लिए प्राकृतिक गैस के बजाय सौर और पवन ऊर्जा जैसी नवीकरणीय बिजली का इस्तेमाल करके हाइड्रोजन तैयार की जाती है।
यूरिया के मुकाबले एक-तिहाई तक हो सकती है लागत
नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के सचिव संतोष सारंगी के मुताबिक, अमोनिया को सीधे मिट्टी में डालने से लागत मौजूदा स्तर के करीब एक-तिहाई तक आ सकती है। यानी खाद करीब 66% सस्ती हो सकती है। इससे खाद का इस्तेमाल भी बेहतर तरीके से हो सकता है।
उन्होंने बताया कि जब किसान खेत में यूरिया डालते हैं, तो खाद का काफी हिस्सा सिंचाई और दूसरी प्रक्रियाओं के दौरान बर्बाद हो जाता है। लेकिन अमोनिया को सीधे मिट्टी के अंदर डालने से इस नुकसान को कम किया जा सकता है।
इसके लिए कृषि वैज्ञानिक खास मशीनों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इन मशीनों से अमोनिया को मिट्टी की सतह से करीब छह इंच नीचे डाला जाता है। वैज्ञानिक यह भी देख रहे हैं कि इस तरीके से खाद की कुल जरूरत और उसे बार-बार डालने की जरूरत कितनी कम हो सकती है। यह परीक्षण राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के तहत भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) कर रही है।
10 फसलों पर होगा परीक्षण, सरसों भी शामिल
ICAR ने 24 अक्टूबर को पंजाब में इस परियोजना की शुरुआत की। इसके तहत 2026 के रबी सीजन में 10,000 एकड़ खेतों पर परीक्षण करने का लक्ष्य रखा गया है। पंजाब के छह कृषि विज्ञान केंद्रों में 300-300 प्रदर्शन किए जाएंगे। इस तरह राज्य में कुल 1,800 प्रदर्शन होंगे।
इसके अलावा, हरियाणा के महेंद्रगढ़ में सरसों की फसल पर 300 एकड़ में अलग से परीक्षण किया जा रहा है। वैज्ञानिक देखेंगे कि अमोनिया के इस्तेमाल से फसल की बढ़त और पैदावार पर क्या असर पड़ता है।
साथ ही, वे यह भी जांचेंगे कि पौधों को नाइट्रोजन कितनी अच्छी तरह मिलती है और किसानों के लिए यह तरीका किफायती है या नहीं। ICAR के मुताबिक, तरल अमोनिया में करीब 82% नाइट्रोजन होता है। इसे खास मशीनों से मिट्टी के अंदर उचित गहराई पर डाला जाता है।
खाद के आयात पर ₹2.59 लाख करोड़ खर्च
भारत हर साल खाद और उसे बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल पर बड़ी रकम खर्च करता है। वित्त वर्ष 2025-26 में देश ने 14.5 अरब डॉलर से ज्यादा, यानी करीब ₹1.38 लाख करोड़ के उर्वरक आयात किए।
खाद बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल और दूसरे इनपुट का खर्च जोड़ दें, तो कुल आयात बिल 27.2 अरब डॉलर से ज्यादा, यानी करीब ₹2.59 लाख करोड़ रहा। सरकार ने 16 मार्च तक वित्त वर्ष 2025-26 में खाद सब्सिडी पर ₹1.93 लाख करोड़ खर्च किए थे। इस मद में पूरे साल के लिए ₹2.02 लाख करोड़ का बजट रखा गया था।
ऐसे में ग्रीन अमोनिया का परीक्षण सफल रहता है, तो सरकार को खाद की लागत घटाने और आयात पर निर्भरता कम करने का विकल्प मिल सकता है। हालांकि, किसानों के लिए यह तरीका कितना सस्ता और फायदेमंद होगा, इसका पता परीक्षण के नतीजों से चलेगा।