India Heatwave & Inflation Risks: भारत इस समय दोहरी मार झेल रहा है। एक तरफ खाड़ी देशों में युद्ध के चलते कच्चे तेल की कीमतें $100 के पार हैं, तो दूसरी तरफ भीषण गर्मी और कम बारिश के अनुमान ने नई चिंता पैदा कर दी है। उत्तर भारत के कई हिस्सों में तापमान 47 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है, जिससे न केवल बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर है, बल्कि आने वाले महीनों में खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ने का खतरा भी पैदा हो गया है।
47 डिग्री तापमान और कम बारिश से 'परफेक्ट स्टॉर्म' की आहट
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस साल मौसम का मिजाज अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी मुसीबत साबित हो सकता है। हीटवेव के कारण फसलों, खासकर सब्जियों के उत्पादन पर बुरा असर पड़ रहा है। सरकार ने जून से सितंबर के बीच 'सामान्य से कम' बारिश की भविष्यवाणी की है। भारत की खेती काफी हद तक मानसून पर टिकी है, ऐसे में कम बारिश का सीधा असर पैदावार पर पड़ेगा जिससे महंगाई और बढ़ सकती है।
महंगाई दर 5% के पार जाने का खतरा
पिछले साल तक भारत में महंगाई दर RBI के 4% के लक्ष्य के नीचे थी, लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस वित्त वर्ष में महंगाई 5% के करीब रह सकती है, जो RBI के 4.6% के अनुमान से ज्यादा है। भारत के इन्फ्लेशन बास्केट में 'फूड' का हिस्सा करीब 37% है। अगर फसलें खराब होती हैं, तो इसका सीधा असर आपकी जेब पर पड़ेगा।
तेल और खेती का डेडली कनेक्शन
कच्चे तेल की कीमतें पहले ही आसमान छू रही हैं, और अब कम बारिश इस समस्या को और बढ़ा देगी। जब बारिश कम होती है, तो किसानों को सिंचाई के लिए डीजल पंपों का सहारा लेना पड़ता है। तेल महंगा होने के कारण खेती की लागत बढ़ेगी, जिसे अंततः उपभोक्ताओं को ही चुकाना होगा।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर मंडराते काले बादल
भारत की 60% से ज्यादा आबादी गांवों में रहती है और खेती पर निर्भर है। अगर मानसून खराब रहता है, तो ग्रामीण आय घटेगी, जिससे बाजार में डिमांड कम होगी और आर्थिक विकास (GDP) की रफ्तार धीमी पड़ सकती है। ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स के मुताबिक, अगर महंगाई अनियंत्रित हुई तो RBI ब्याज दरों में कटौती करने के बजाय उन्हें और बढ़ा सकता है।
वैसे कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि स्थिति उतनी भी खराब नहीं होगी। नोमुरा के मुताबिक, भारत के पास चावल और गेहूं का पर्याप्त सरकारी स्टॉक है, जो कीमतों को बढ़ने से रोक सकता है। बेहतर सिंचाई और जलवायु-प्रतिरोधी बीजों के कारण अब खेती पर 'अल नीनो' का असर पहले के मुकाबले कम होता है।