FTA With GCC: भारत और खाड़ी देशों के समूह (GCC) के बीच होने वाले मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को लेकर एक बड़ी खबर सामने आ रही है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, भारत इस समझौते में सोने पर कोई भी टैक्स छूट या रियायत देने के मूड में नहीं है। सरकार का यह फैसला घरेलू बाजार में सोने के बढ़ते आयात और स्थानीय कारोबारियों के हितों को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।
ओमान की तर्ज पर सुरक्षित रहेगा गोल्ड
हाल ही में 18 दिसंबर को मस्कट में ओमान के साथ हुए समझौते में भी भारत ने सोने और चांदी की ईंटों (Bullion) को रियायती लिस्ट से बाहर रखा था। सरकारी सूत्रों का कहना है कि चूंकि हमने ओमान के साथ समझौते में सोने को शामिल नहीं किया, इसलिए यह बेहद मुश्किल है कि हम पूरे खाड़ी सहयोग परिषद के साथ इसे शामिल करें। बता दें कि GCC में संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सऊदी अरब, कतर, कुवैत, ओमान और बहरीन जैसे छह ताकतवर देश शामिल हैं।
UAE समझौते से मिला कड़वा अनुभव
भारत ने यह सावधानी UAE के साथ हुए व्यापार समझौते के नतीजों को देखते हुए बरती है। मई 2022 में यूएई के साथ हुए समझौते में भारत ने सोने के आयात पर 1% की कस्टम ड्यूटी छूट दी थी। इसका नतीजा यह हुआ कि यूएई से होने वाला सोने का आयात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। वित्त वर्ष 2022 में यूएई से सोने का आयात $5.8 बिलियन था। वहीं वित्त वर्ष 2025 तक यह लगभग तीन गुना बढ़कर $16.8 बिलियन पर पहुंच गया। इस भारी उछाल ने भारतीय नीति निर्माताओं की चिंता बढ़ा दी थी, क्योंकि इससे घरेलू बाजार में असंतुलन पैदा होने का डर सताने लगा था।
व्यापार विशेषज्ञों ने यह भी पाया कि यूएई के साथ समझौते के तहत आने वाले कुछ सोने के आयात में 'रूल्स ऑफ ओरिजिन' का कड़ाई से पालन नहीं किया गया। कुछ कारोबारियों ने रियायती दरों का गलत फायदा उठाया, जिसके बाद सरकार को नियमों में सख्ती करनी पड़ी। इसी वजह से अब GCC देशों के साथ होने वाले समझौते में भारत सोने को लेकर कोई जोखिम नहीं उठाना चाहता।
भारत और खाड़ी देशों का कैसा है व्यापारिक रिश्ता
सोने को भले ही FTA से बाहर रखा जा रहा हो, लेकिन भारत और GCC के बीच व्यापार लगातार नई ऊंचाइयों को छू रहा है। वित्त वर्ष 2025 में द्विपक्षीय व्यापार $179 बिलियन तक पहुंच गया। भारत खाड़ी देशों को खाद्य उत्पाद, टेक्सटाइल, ज्वेलरी और फार्मास्यूटिकल्स का निर्यात करता है। बदले में भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए कच्चा तेल, एलएनजी और एलपीजी के लिए इन देशों पर निर्भर है। लगभग दो दशकों के इंतजार के बाद भारत और खाड़ी देशों ने फिर से व्यापार समझौते की दिशा में औपचारिक बातचीत शुरू की है, जो दोनों क्षेत्रों के लिए बेहद अहम है।