ई-कॉमर्स पर टैक्स को लेकर छिड़ी जंग! अमेरिका की 'परमानेंट' छूट की मांग पर भारत की ना; कंपनियों को सता रहा है अनिश्चितता का डर

India Digital Trade: दुनिया भर की बड़ी टेक कंपनियों का मानना है कि अगर यह समझौता खत्म हुआ, तो व्यापार करना मुश्किल हो जाएगा। बिजनेस लीडर्स का मानना है कि डिजिटल ट्रेड पर ड्यूटी लगने से लागत बढ़ेगी और सप्लाई चेन पर असर पड़ेगा, जो पहले से ही मिडिल ईस्ट के युद्ध के कारण तनाव में है

अपडेटेड Mar 29, 2026 पर 8:22 AM
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पिछले लगभग 30 वर्षों से दुनिया भर में एक समझौता लागू है कि डिजिटल तरीके से भेजी जाने वाली चीजों पर कोई देश कस्टम ड्यूटी नहीं लगाएगा

E-commerce Tariff: कैमरून के याउंडे में विश्व व्यापार संगठन (WTO) की बैठक चल रही है। जानकारी एक मुताबिक, बैठक में डिजिटल व्यापार और ई-कॉमर्स को लेकर भारत और अमेरिका के बीच खींचतान चल रही है। भारत ने संकेत दिया है कि वह ई-कॉमर्स ट्रांसमिशन जैसे- डिजिटल डाउनलोड, फिल्में, सॉफ्टवेयर पर टैरिफ न लगाने की वैश्विक छूट को आगे बढ़ाने के लिए तैयार हो सकता है, लेकिन वह इसे 'स्थायी' बनाने के पक्ष में बिल्कुल नहीं है।

क्या है यह 'टैक्स फ्री' विवाद?

पिछले लगभग 30 वर्षों से दुनिया भर में एक समझौता लागू है कि डिजिटल तरीके से भेजी जाने वाली चीजों जैसे- ई-बुक्स, नेटफ्लिक्स मूवी या सॉफ्टवेयर पर कोई देश कस्टम ड्यूटी नहीं लगाएगा। यह छूट इसी महीने खत्म हो रही है। अमेरिका चाहता है कि इस छूट को हमेशा के लिए लागू कर दिया जाए ताकि अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट और एपल जैसी कंपनियों को भविष्य में टैक्स का डर न रहे।


वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने इस पर 'गंभीर पुनर्विचार' की बात कही है। भारत का मानना है कि यह छूट विकासशील देशों को मिलने वाले संभावित टैक्स राजस्व से वंचित करती है।

'बीच का रास्ता' चाहता है भारत

शुक्रवार रात को भारतीय राजनयिकों ने एक बड़ा संकेत दिया, जिससे गतिरोध टूटने की उम्मीद जगी है। भारत ने संकेत दिया है कि वह इस 'मोराटोरियम' यानी टैक्स पर रोक को अगले 2 साल के लिए बढ़ाने पर सहमत हो सकता है। हालांकि, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमिसन ग्रीर ने साफ कर दिया है कि वाशिंगटन किसी अस्थायी विस्तार में नहीं, बल्कि केवल स्थायी समाधान में दिलचस्पी रखता है। उनके अनुसार, यह 'सबसे आसान और जरूरी' फैसला है जिसे लिया जाना चाहिए।

कंपनियों को सता रहा है अनिश्चितता का डर

दुनिया भर की बड़ी टेक कंपनियों का मानना है कि अगर यह समझौता खत्म हुआ, तो व्यापार करना मुश्किल हो जाएगा। माइक्रोसॉफ्ट के डायरेक्टर जॉन बेसेक के अनुसार, डिजिटल इकोनॉमी में अनिश्चितता का मतलब है निवेश करने में हिचकिचाहट। बिजनेस लीडर्स का मानना है कि डिजिटल ट्रेड पर ड्यूटी लगने से लागत बढ़ेगी और सप्लाई चेन पर असर पड़ेगा, जो पहले से ही मिडिल ईस्ट के युद्ध के कारण तनाव में है।

WTO की प्रासंगिकता की परीक्षा

याउंडे में हो रही यह बैठक WTO के लिए एक बड़ा टेस्ट है। जहां अफ्रीकी और कैरेबियाई देश 2 साल के विस्तार का सुझाव दे रहे हैं, वहीं कुछ देश 5 से 10 साल के बीच का रास्ता निकालने की कोशिश कर रहे हैं। नॉर्वे के विदेश मंत्री के अनुसार, इस मोराटोरियम को आगे बढ़ाना WTO की साख बचाने के लिए बेहद जरूरी है ताकि यह साबित हो सके कि संगठन आज की डिजिटल अर्थव्यवस्था में भी ठोस परिणाम दे सकता है।

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