Indus Waters Treaty: सिंधु जल समझौते पर भारत का सबसे बड़ा कानूनी ब्रह्मास्त्र, 15 पॉइंट में समझिए पाकिस्तान क्यों मुंह की ही खाएगा
Indus Waters Treaty India Pakistan Conflict: 1951 में टेनेसी वैली अथॉरिटी के पूर्व अध्यक्ष डेविड लिलिएंटथल ने वर्ल्ड बैंक की मदद से दोनों देशों को संयुक्त रूप से सिंधु बेसिन विकसित करने का प्रस्ताव दिया। वर्ल्ड बैंक के तत्कालीन अध्यक्ष यूजीन ब्लैक ने 6 सितंबर 1951 को दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों को पत्र लिखकर इसका प्रस्ताव दिया। इसे दोनों ने स्वीकार किया
अगस्त 1947 में भारत के विभाजन के साथ ही सिंधु जल विवाद भी पैदा हो गया
Indus Waters Treaty Legal points: भारत और पाकिस्तान के बीच साल 1960 से चले आ रहे सिंधु जल समझौते को लेकर खड़े हुए विवाद के बीच कानूनी मोर्चे पर भारत का पक्ष मजबूत है। इसे लेकर विदेश मंत्रालय (MEA) के पूर्व अतिरिक्त सचिव और कानूनी सलाहकार डॉ. विष्णु दत्त शर्मा ने एक डिटेल्ड लीगल एनालिसिस किया है।
पीटीआई पर मौजूद इस एनालिसिस से साफ है कि अगर पाकिस्तान इस समझौते के नियमों का उल्लंघन कर एकतरफा कोई कदम उठाता है तो अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत भारत के पास उसे करारा जवाब देने का एक बड़ा कानूनी ब्रह्मास्त्र मौजूद है। यहां नीचे 15 पॉइंट में समझिए कि इस समझौते का कानूनी ढांचा क्या है और पाकिस्तान इसमें कैसे मुंह की खाएगा-
1- सिंधु नदी प्रणाली का विशाल दायरा
सिंधु नदी लगभग 1800 मील लंबी है। इसकी पश्चिमी सहायक नदियां (काबुल, कुर्रम) 700 मील से अधिक लंबी हैं जबकि पूर्वी सहायक नदियां (झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास, सतलुज) कुल मिलाकर 2800 मील से अधिक लंबी हैं। यह पूरा सिस्टम 450000 वर्ग मील क्षेत्र को कवर करता है। ये इसे दुनिया की सबसे बड़े नदी प्रणालियों में से एक बनाता है। इसका अधिकांश हिस्सा भारत और पाकिस्तान में स्थित है।
2- बंटवारे के बाद विवाद और दिल्ली समझौता
अगस्त 1947 में भारत के विभाजन के साथ ही सिंधु जल विवाद भी पैदा हो गया। दोनों देशों के बीच पानी के नियमन को लेकर पहला समझौता 4 मई 1948 को हुआ। इसे 'इंटर-डोमिनियन एग्रीमेंट' या 'दिल्ली समझौता' कहा जाता है। इसमें यह माना गया था कि पश्चिम पंजाब (पाकिस्तान) पूर्वी पंजाब (भारत) के पानी पर अधिकार के रूप में कोई दावा नहीं कर सकता। हालांकि पाकिस्तान ने बाद में 23 अगस्त 1950 को इस समझौते को मानने से इनकार कर दिया था।
3- वर्ल्ड बैंक की एंट्री और 1960 की संधि
1951 में टेनेसी वैली अथॉरिटी के पूर्व अध्यक्ष डेविड लिलिएंटथल ने वर्ल्ड बैंक की मदद से दोनों देशों को संयुक्त रूप से सिंधु बेसिन विकसित करने का प्रस्ताव दिया। वर्ल्ड बैंक के तत्कालीन अध्यक्ष यूजीन ब्लैक ने 6 सितंबर 1951 को दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों को पत्र लिखकर इसका प्रस्ताव दिया। इसे दोनों ने स्वीकार किया। बेहद उतार-चढ़ाव और टूटने की कगार पर पहुंचने के बावजूद आखिरकार 1960 में इस संधि पर हस्ताक्षर हो सके।
4- संधि की कानूनी संरचना और वर्ल्ड बैंक की भूमिका
सिंधु जल समझौते पर 19 सितंबर 1960 को कराची में हस्ताक्षर किए गए थे। यह 12 जनवरी 1961 को लागू हुआ लेकिन इसे 1 अप्रैल 1960 से ही लागू माना गया। इस संधि में 12 अनुच्छेदों के तहत कुल 79 पैराग्राफ और 8 एनेक्सचर शामिल हैं। वर्ल्ड बैंक ने सिर्फ विशिष्ट अनुच्छेदों (Articles V, X) और एनेक्सचर (F, G, H) के उद्देश्यों के लिए इस पर हस्ताक्षर किए थे।
5- नदियों का आवंटन और कानूनी मिसाल
इस संधि के तहत पूर्वी नदियों (रावी, ब्यास, सतलुज) का पानी भारत को और पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम, चिनाब) का पानी कुछ अपवादों को छोड़कर पाकिस्तान को आवंटित किया गया है। इस दस्तावेज में स्पष्ट लिखा है कि इस संधि की किसी भी बात को कानून का कोई सामान्य सिद्धांत या मिसाल नहीं माना जाएगा।
6- संधि का मुख्य उद्देश्य: सद्भावना और सहयोग
संधि की प्रस्तावना में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि भारत और पाकिस्तान सरकार सिंधु नदी प्रणाली के पानी का पूर्ण और संतोषजनक उपयोग करने की समान इच्छा रखती हैं। इसके तहत दोनों देशों को सद्भावना, मित्रता और सहयोग की भावना के साथ एक-दूसरे के अधिकारों और दायित्वों को तय करना था और भविष्य में उठने वाले किसी भी सवाल का निपटारा करना था।
विवाद निपटारे का त्रि-स्तरीय तंत्र
7- स्थायी सिंधु आयोग
संधि के तहत विवादों और मतभेदों के निपटारे के लिए एक स्थायी सिंधु आयोग का गठन किया गया है। इसमें दोनों देशों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं। इसकी भूमिका मुख्य रूप से प्रशासनिक और परामर्शी होती है।
8- संधि में सवाल, मतभेद और विवाद में अंतर
अनुच्छेद IX विवाद निपटान ढांचे का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह किसी मुद्दे को तीन श्रेणियों में बांटता है, सवाल, मतभेद और विवाद, किसी भी सवाल की जांच सबसे पहले आयोग करता है। अगर आयोग में सहमति नहीं बनती तो उसे मतभेद माना जाता है। फिर इसे एक निष्पक्ष विशेषज्ञ के पास भेजा जाता है। कोई मुद्दा विवाद तभी बनता है जब वह निष्पक्ष विशेषज्ञ के अधिकार क्षेत्र से बाहर हो या विशेषज्ञ खुद आयोग को इसकी जानकारी दे।
9- मध्यस्थता अदालत के लिए कड़ी शर्तें
कोई भी मतभेद विवाद की श्रेणी में तभी आ सकता है जब आयोग के दोनों कमिश्नर इस पर सहमत हों। जब विवाद खड़ा हो जाता है तो आयोग दोनों सरकारों को रिपोर्ट करता है। इसके बाद मध्यस्थों की मदद ली जा सकती है। किसी मध्यस्थता अदालत का गठन सिर्फ दोनों देशों की आपसी सहमति या बातचीत और मध्यस्थता के पूरी तरह विफल होने के बाद ही किया जा सकता है।
पाकिस्तान क्यों खाएगा मुंह की? भारत का कानूनी पक्ष
10- एकतरफा अदालत जाने का कोई अधिकार नहीं
एनेक्सचर G (मध्यस्थता अदालत) की शुरुआती भाषा बेहद महत्वपूर्ण है। इसमें लिखा है कि, 'अगर आवश्यकता पैदा होती है तो...' इसका मतलब यह है कि यह चरण तभी आएगा जब सभी आवश्यक शर्तें पूरी होंगी। कोई भी पक्ष अपनी मर्जी से किसी भी सवाल को सीधे मध्यस्थता अदालत में नहीं घसीट सकता। इसके लिए पहले आपसी बातचीत और निष्पक्ष विशेषज्ञ के चरणों से गुजरना अनिवार्य है।
11- एकतरफा कदम पूरी तरह अवैध
कोई भी कमिश्नर मतभेद को निष्पक्ष विशेषज्ञ के पास ले जाने के लिए एकतरफा पहल तो कर सकता है लेकिन किसी मतभेद को विवाद घोषित करने या मध्यस्थता अदालत की प्रक्रिया को एकतरफा शुरू करने का कोई प्रावधान इस संधि में नहीं है। द्विपक्षीय संधियों में हमेशा आपसी निर्धारण का प्रावधान होता है और यही बात सिंधु जल समझौते पर भी लागू होती है।
12- पाकिस्तान की एकतरफा जिद संधि का उल्लंघन
अगर संधि के नियमों के तहत कोई विवाद आधिकारिक रूप से खड़ा ही नहीं हुआ है और उसके बिना ही पाकिस्तान मध्यस्थता अदालत गठित करने के लिए एकतरफा प्रक्रिया शुरू करता है तो यह संधि का सीधा उल्लंघन माना जाएगा और यह पूरी तरह से अवैध होगा। ऐसे में भारत के पास इसके खिलाफ सुधारात्मक कदम उठाने के कानूनी विकल्प मौजूद हैं।
13- वियना कन्वेंशन का कानूनी आधार
अंतरराष्ट्रीय कानून में जब कोई एक पक्ष संधि के किसी महत्वपूर्ण हिस्से का उल्लंघन करता है तो वियना कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ ट्रीटीज 1969 को जरूरी डॉक्यूमेंट के रूप में देखा जाता है। हालांकि भारत और पाकिस्तान दोनों ही इस कन्वेंशन के पक्षकार नहीं हैं और सिंधु जल समझौता इससे पहले का है लेकिन इसके नियम अंतरराष्ट्रीय प्रथागत कानून को दर्शाते हैं।
14- मटेरियल ब्रीच का नियम
वियना कन्वेंशन का अनुच्छेद 60 संधि के उल्लंघन के परिणामों को स्पष्ट करता है। इसके तहत संधि के उद्देश्य या प्रयोजन को पूरा करने के लिए आवश्यक किसी भी प्रावधान का उल्लंघन करना मटेरियल ब्रीच यानी गंभीर उल्लंघन माना जाता है। यह भारत के लिए एक मजबूत कानूनी आधार तैयार करता है।
15- आतंकवाद के कारण भारत सस्पेंड कर सकता है संधि
डॉ विष्णु दत्त शर्मा के निष्कर्ष के मुताबिक इस पूरी संधि की मूल भावना सद्भावना और मित्रता पर आधारित है। ऐसे में यह दलील दी जा सकती है कि पाकिस्तान द्वारा लगातार सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा देना संधि के तहत उसके दायित्वों को पूरा करने में विफलता है। ऐसे में पाकिस्तान की ओर से किया जा रहा यह कृत्य एक मटेरियल ब्रीच का रूप लेता है। इस आधार पर भारत को अंतरराष्ट्रीय प्रथागत कानून के तहत यह पूरा अधिकार है कि वह सिंधु जल समझौते को स्थगित कर दे। अगर पाकिस्तान जरूरी प्रक्रियाओं को दरकिनार कर भारत को एकतरफा मध्यस्थता अदालत में खींचने की कोशिश करता है तो वह खुद अपनी ही चाल में फंसकर मुंह की खाएगा।