Justice Ujjal Bhuyan: सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिव उज्ज्वल भुयान ने शनिवार को कहा कि गंगा नदी में नाव में बैठकर चिकन खाने पर रोक लगाने वाला कोई कानून नहीं है। उन्होंने व्रत तोड़ने के दौरान चिकन बिरयानी खाने के लिए युवाओं की गिरफ्तारी की आलोचना की। उन्होंने कहा, "मुझे यकीन है कि चिकन बिरयानी खाना कोई अपराध नहीं है। यह अपराध हो ही नहीं सकता... उन्हें इसी वजह से गिरफ्तार किया गया। उन्हें तीन महीने तक जेल में रहना पड़ा।"
जस्टिस उज्जल भुयान ने कहा है कि भारत में असहमति (Dissent) व्यक्त करने की लोकतांत्रिक जगह लगातार सिमटती जा रही है। उन्होंने कहा कि विरोध-प्रदर्शन करने वाले छात्रों को बढ़ती गिरफ्तारियों और आसानी से जमानत न मिलने जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है।
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी (NLIU) में आयोजित चौथे जस्टिस जी.पी. सिंह स्मृति व्याख्यान को संबोधित करते हुए जस्टिस भुयान ने कहा कि दुर्भाग्य से आज सामान्य गतिविधियों को भी अपराध की कैटेगरी में रखा जा रहा है।
गंगा नदी का क्यों किया जिक्र?
टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, उन्होंने अधिकारियों द्वारा की जाने वाली कथित असंगत कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए एक उदाहरण दिया। जस्टिस भुयान ने कहा कि गंगा नदी पर नाव में बैठकर चिकन खाने पर कोई कानूनी रोक नहीं है। फिर भी ऐसे मामले में लोगों को गिरफ्तार कर लिया जाता है और उन्हें तीन महीने तक जमानत भी नहीं मिलती। उन्होंने सवाल किया कि ऐसी कार्रवाई का कानूनी आधार क्या है।
अपने संबोधन में जस्टिस भुयान ने कहा कि लोकतंत्र में असहमति की आवाज के लिए पर्याप्त स्थान होना आवश्यक है। सामान्य नागरिक गतिविधियों को अनावश्यक रूप से अपराध नहीं बनाया जाना चाहिए। उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि विरोध-प्रदर्शन करने वाले छात्रों और नागरिकों के खिलाफ बढ़ती कार्रवाई लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
पर्यावरण पर भी जताई नाराजगी
'इंडियन एक्सप्रेस' के मुताबिक, पर्यावरण से जुड़े विरोध-प्रदर्शनों और छात्रों के प्रदर्शनों का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा, "जो लोग पर्यावरण को हो रहे नुकसान पर अपना दुख जाहिर करने आते हैं तो उन्हें ऐसे भगा दिया जाता है जैसे वे अपराधी हों। कैंपस में विरोध करने वाले छात्रों को गिरफ्तार कर लिया जाता है और उन्हें 30-40 दिनों तक जमानत नहीं मिलती।" उन्होंने आगे कहा कि अक्सर छात्रों को सस्पेंड भी कर दिया जाता है, जिससे उन्हें अपनी पढ़ाई दोबारा शुरू करने के लिए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाना पड़ता है।
जस्टिस भुयान ने सवाल उठाया कि क्या कोर्ट ज़मानत की सख़्त शर्तों के ज़रिए असहमति जताने को भी हतोत्साहित कर रहे हैं। उन्होंने कहा, "ये मुद्दे गंभीर सवाल खड़े करते हैं... हालांकि कोर्ट संवेदनशील हैं और जमानत देते भी हैं। लेकिन कई बार इसमें देर हो जाती है। लेकिन जमानत देते समय लगाई जाने वाली सख़्त शर्तें ही सबसे ज़्यादा चिंता का विषय हैं। क्या ऐसे सख्त आदेशों के जरिए कोर्ट अप्रत्यक्ष रूप से नागरिकों को अपनी असहमति जाहिर न करने के लिए कह रहे हैं या उन्हें हतोत्साहित कर रहे हैं?"