पटना से लखनऊ जा रही इंडिगो की फ्लाइट में चालक दल के सदस्यों सहित 110 लोगों की जान तब बुधवार को खतरे में आ गई, जब 17,000 फीट की ऊंचाई पर विमान आकाशीय बिजली की चपेट में आ गया। इस घटना से विमान का अगला हिस्सा, यानी नोज बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। इंडिगो फ्लाइट 6E-929 को हुए नुकसान को देखते हुए पायलट ने चौधरी चरण सिंह एयरपोर्ट पर विमान की एमर्जेंसी लैंडिंग की मांग की। स्थिति की नजाकत को देखते हुए लखनऊ एयरपोर्ट पर विमान की एमर्जेंसी लैंडिंग कराई गई। राहत की बात यह रही कि इस घटना में चालक दल सहित किसी यात्री को कोई नुकसान नहीं हुआ।
7 अक्टूबर की दोपहर करीब 5:15 बजे एयरबस A-320 इंडिगो फ्लाइट पटना एयरपोर्ट से रवाना हुई थी। इस फ्लाइट में चालक दल के 4 सदस्यों के अलावा 106 यात्री सवार थे। यह फ्लाइट लखनऊ एयरपोर्ट पर शाम करीब 4:20 मिनट पर लैंड करनी थी। सूत्रों के अनुसार, फ्लाइट जब करीब 17 हजार फीट की ऊंचाई पर थी, तभी मौसम तेजी से बदलने लगा। कुछ ही समय बाद आमसान से बिजली गिरी और विमान की नोज से जा टकराई। आसमानी बिजली का झटका इतना तेज था कि प्लेन की नोज का हिस्सा बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया।
पायलट ने की एमर्जेंसी लैंडिंग की मांग
बिजली गिरने के बाद प्लेन को हुए नुकसान का अंजादा फ्लाइट के दोनों पायलट को हो चुका था। उन्होंने इसकी जानकारी तुरंत लखनऊ एटीसी के साथ साझा की और एमर्जेंसी लैंडिंग की मांग की। एयरपोर्ट कंट्रोल ऑपरेशन सेंटर (एओसीसी) से रनवे पर इमरजेंसी लैंडिंग से जुड़ी सभी तैयारियां पूरा करने के बाद शाम करीब 6:06 बजे विमान सुरक्षित लखनऊ एयरपोर्ट पर लैंड हो गया।
आकाशीय बिजली से विमान का अगला हिस्सा, यानी नोज बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया।
फैराडे केज सिद्धांत ने बचा लीं 110 जानें
कमर्शियल एयरलाइनर फैराडे केज के सिद्धांतों पर बनाए जाते हैं। यह एक लगातार चलने वाला कंडक्टिव यानी बिजली का सुचालक खोल होता है। यह बिजली के चार्ज को विमान की बॉडी (फ्यूजलेज) की बाहरी सतह के साथ-साथ आगे बढ़ाता है। जब किसी प्लेन पर बिजली गिरती है, जिसमें अरबों वोल्ट की बिजली होती है, तो चार्ज नोज कोन या विंगटिप जैसे बाहरी हिस्से से अंदर आता है।
फिर यह बाहरी धातु की सतह या उसमें लगी कॉपर फॉयल जाली के चारों ओर बहता है और आखिर में पिछले किनारों पर लगे स्टैटिक डिस्चार्जर विक्स के जरिए सुरक्षित रूप से बाहर निकल जाता है। विमान की यह चालक बाहरी परत अंदर मौजूद केबिन को विद्युत धारा से बचाती है। इससे संवेदनशील एवियोनिक्स, ईंधन टैंक और यात्रियों तक बिजली का खतरनाक असर नहीं पहुंचता।
रेडोम पर ही मुख्य झटका क्यों लगा
विमान के अगले हिस्से में लगे नोज कोन को तकनीकी भाषा में ‘रेडोम’ कहा जाता है। आसमान में बिजली गिरने की स्थिति में यह विमान का सबसे संवेदनशील हिस्सा माना जाता है। फ्यूजलेज के बाकी हिस्से में धातु की मिश्रधातु या कॉम्पोजिट मटेरियल के साथ कॉपर की चालक जाली का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन ‘रेडोम’ को गैर-धातु वाले फाइबरग्लास या कॉम्पोजिट मटेरियल से बनाया जाता है।
विमान का मौसम रडार नोज कोन के अंदर लगा होता है। अगर नोज के आसपास धातु की परत लगा दी जाए, तो वह माइक्रोवेव रडार सिग्नल को रोक देगी। ऐसे में पायलटों को तूफानी बादलों और खराब मौसम का सही अंदाजा नहीं लग पाएगा। चूंकि ‘रेडोम’ में विमान के बाकी हिस्से जैसी लगातार चालक बाहरी परत नहीं होती, इसलिए सीधे बिजली गिरने पर इसके एक हिस्से में तेज गर्मी से नुकसान, संरचनात्मक टूट-फूट या सतह पर छेद हो सकता है। इसके बाद विद्युत आर्क विमान के मुख्य चालक हिस्से में ट्रांसफर हो जाता है।