Mamata Banerjee: पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के सोनारपुर से जो सबसे चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई, वह अभिषेक बनर्जी की फटी शर्ट या टूटे चश्मे की नहीं थी। तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव खुद को पूरी तरह से असुरक्षित महसूस कर रहे थे। वह एक नाराज भीड़ से घिरे हुए थे। उनके साथ सिर्फ दो सादी वर्दी वाले सुरक्षाकर्मी थे जो उन्हें वहां से निकालने की कोशिश कर रहे थे। भीड़ की तरफ़ से पत्थर, जूते और अंडे फेंके जा रहे थे। कुछ लोग उन पर चिल्ला रहे थे और उन्हें मारने की भी कोशिश कर रहे थे।
इस हमले के बाद जो बात सबसे ज्यादा खटक रही थी, वह प्रदर्शनकारियों का गुस्सा नहीं। बल्कि अभिषेक की अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस की गैर-मौजूदगी थी। यह घटना सोनारपुर नगर पालिका के वार्ड नंबर 9 में हुई। यहां सभी 35 वार्डों पर TMC का ही कब्जा है। इस नगर पालिका में विपक्ष का कोई नामोनिशान नहीं है। और फिर भी जब अभिषेक पर हमला हुआ, तो उनके आस-पास स्थानीय पार्षदों, ब्लॉक नेताओं, जिले के बड़े नेताओं या जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं और कैडर की कोई नजर नहीं आई।
News18 से बात करते हुए TMC के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, "यहां की राजनीतिक स्थिति बहुत गंभीर है। शायद ही कोई ऐसा स्थानीय नेता बचा हो जिसके घर का घेराव BJP के स्थानीय कार्यकर्ताओं ने न किया हो। हमने अभिषेक बनर्जी से गुजारिश की थी कि वे यहां न आएं। लेकिन वे आए। क्योंकि वे हमारे नेता हैं। हालांकि, हम उनके साथ खड़े नहीं हो पाए। अब कोई भी उनके साथ एक ही फ्रेम में नजर नहीं आना चाहता। कुछ दिनों के लिए हमें चुपचाप और छिपकर रहना होगा।"
उस समय न तो कोई स्थानीय सांसद या विधायक मौके पर पहुंचा और न ही शाम को जब उन्हें अस्पताल ले जाया जा रहा था। बंगाल चुनाव में हार के बाद कोई उनके या पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ खड़ा हुआ नजर नहीं आया। बंगाल की इस सबसे ताक़तवर राजनेता के आस-पास जमा भीड़ बेहद कम थी। उनके साथ अनुभवी सांसद डेरेक ओ ब्रायन और कोलकाता के पूर्व मेयर सोवन चटर्जी खड़े थे।
अभिषेक बनर्जी के राजनीतिक करियर के लिए महत्वपूर्ण मोड़
विश्लेषकों का कहना है कि तृणमूल कांग्रेस के महासचिव अभिषेक बनर्जी पर सोनारपुर में हुआ हमला उनके राजनीतिक करियर का निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। इससे यह तय होगा कि उन्हें सिर्फ एक राजनीतिक विरासत का उत्तराधिकारी माना जाएगा या वह अपने दम पर जन नेता के रूप में उभरेंगे। अपने अब तक के राजनीतिक करियर के दौरान अभिषेक बनर्जी ने सत्तारूढ़ दल के नेता के तौर पर काम किया है, क्योंकि उनकी बुआ एवं तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री थीं। अभिषेक को पार्टी में दूसरे सबसे बड़े नेता के रूप में देखा जाता है।
विश्लेषकों के मुताबिक, अभिषेक बनर्जी की राजनीतिक यात्रा काफी अलग रही है। शायद बदलते हालात का एकमात्र संकेत मई 2023 में झाड़ग्राम जिले में कुडमी आंदोलन के दौरान सामने आया, जब प्रदर्शनकारियों ने उनके काफिले को रोक दिया। उन्हें उस आक्रोश का सामना करना पड़ा जिसे संगठनात्मक ताकत या प्रशासनिक अधिकार से नियंत्रित नहीं किया जा सकता था।
नेता द्वारा उस आक्रोश को नजरअंदाज करने का परिणाम तब दिखा जब 2026 के विधानसभा चुनावों में कुडमी बहुल जिले में टीएमसी को चारों सीटों पर करारी हार का सामना करना पड़ा। सोनारपुर की घटना को लेकर राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह अनुभव परिवर्तनकारी साबित हो सकता है।