Mamata Banerjee: क्या ममता बनर्जी का पॉलिटिकल करियर खत्म? दिल्ली में एक मुलाकात और बंगाल में सिर्फ 13 दिन में बिखर गई TMC
Mamata Banerjee: ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) को अपने 28 साल के इतिहास में पहली फूट का सामना करना पड़ा है। पार्टी के 58 बागी विधायकों ने निष्कासित नेता रिताब्रता बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष चुनकर विधायक दल पर अपना कब्जा जमा लिया। इसके साथ ही उन्होंने विधानसभा स्पीकर से मान्यता भी प्राप्त कर ली। इससे ममता बनर्जी की पार्टी अपने गठन के बाद से अब तक के सबसे गंभीर आंतरिक संकट में घिर गई है
Mamata Banerjee: राजनीतिक पंडितो का कहना है कि ममता बनर्जी का भविष्य अब अंधकारमय हो गया है
Mamata Banerjee: पश्चिम बंगाल की राजनीतिक नब्ज पर पकड़, जन आंदोलन और हर चुनौती के सामने डटकर खड़े रहने के दम पर अपना राजनीतिक सफर तय करने वाली ममता बनर्जी इस वक्त मुश्किल में हैं। पूर्व सीएम के लिए पिछले महीने बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद का समय किसी राजनीतिक भूचाल से कम नहीं रहा है। ठीक एक महीने पहले ममता तृणमूल कांग्रेस (TMC) का निर्विवाद चेहरा थीं। उनके पास एक मजबूत विधायी शक्ति थी। लेकिन भारतीय जनता पार्टी (BJP) के हाथों मिली करारी चुनावी हार ने बंगाल में तृणमूल के राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह से बदल कर रखा दिया है।
राजनीतिक रूप से लगा यह जोरदार झटका इसलिए भी कचोट देने वाला था क्योंकि उन्हें भवानीपुर से अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी शुभेंदु अधिकारी से हार का सामना करना पड़ा। जबकि यह निर्वाचन क्षेत्र लंबे समय से उनका राजनीतिक गढ़ माना जाता रहा था। चुनाव नतीजों ने विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस की ताकत घटाकर महज 80 विधायकों तक सीमित कर दी। इससे ममता बनर्जी को अभूतपूर्व रूप से कमजोर स्थिति में विपक्ष का नेतृत्व करना पड़ रहा है।
राज्य में 2021 में हुए विधानसभा चुनाव में तृणमूल के सदन में 215 विधायक निर्वाचित हुए थे। हालांकि पिछले महीने हुए चुनाव में मिली करारी हार ने तेजी से बदलते घटनाक्रम के बीच तृणमूल के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया है। ममता ने पार्टी की स्थापना 1998 में की थी।
58 विधायकों ने छोड़ा साथ
तृणमूल के बागी विधायकों के एक ग्रुप ने बुधवार को बंगाल विधानसभा स्पीकर रथींद्र बोस को 58 MLA के समर्थन पत्र सौंपे। इसमें निष्कासित नेता रिताब्रता बनर्जी को अपने विधायक दल का नेता बताया गया और विपक्ष के नेता पद पर दावा किया गया। रिताब्रता ने दावा किया कि बागी गुट के समर्थन में दो अन्य विधायक भी हैं।
कुछ ही दिन पहले तृणमूल ने रिताब्रता बनर्जी और उनके साथी विधायक संदीपन साहा को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित कर दिया था। उन पर संगठन को कमजोर करने का आरोप लगाया गया था। बगावत को शांत करने के बजाय इस निष्कासन ने आग में घी डालने का काम किया।
बंगाल विधानसभा में तृणमूल का सफर शुरू में जितना शानदार रहा उसका अंत उतना ही भयावह स्थिति को दर्शाता है। वाम दल विरोधी लहर पर सवार तृणमूल ने 2011 में 184 सीट पर जीत दर्ज की थी। फिर सहयोगियों के साथ मिलकर वाम मोर्चे के 34 साल के शासन का अंत किया था।
वर्ष 2016 में 211 सीट पर जीत हासिल कर तृणमूल ने अपना दबदबा कायम रखा। फर 2021 में ममता के नेतृत्व में विधानसभा की 294 सीट में से 215 पर अपना परचम फहराया था। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ममता बनर्जी के सामने अब एक ऐसी चुनौती है, जिसका सामना उन्होंने अपने लगभग तीन दशकों के सार्वजनिक जीवन में कभी नहीं किया। हालांकि, राजनीतिक पंडितों का कहना है कि इस खराब हालात के बजाय भी ममता के राजनीतिक करियर का अंत मान लेना अभी जल्दबाजी होगी।
सिर्फ 13 दिन के अंदर बिखर गई TMC
दिल्ली में संयोगवश हुई एक मुलाकात, सिग्नेचर जालसाजी के आरोप, तृणमूल कांग्रेस सांसद अभिषेक बनर्जी की भूमिका को लेकर बढ़ता असंतोष और उत्तराधिकार की लड़ाई जैसी महज 13 दिन के भीतर तेजी से घटी इन सिलसिलेवार घटनाओं ने 28 साल पुरानी TMC को उसके पहले विभाजन की दहलीज पर ला खड़ा किया।
'बंग भवन' में 22 मई को तृणमूल के बागी विधायक रिताब्रता बनर्जी और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के बीच कथित तौर पर हुई संयोगवश मुलाकात से शुरू हुआ घटनाक्रम बुधवार को उस समय निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया, जब 58 विधायकों ने पार्टी के विधायक दल को कंट्रोल कर लिया। विधायकों ने रिताब्रता बनर्जी को अपना नेता चुन लिया और विधानसभा स्पीकर से भी इसकी मान्यता हासिल कर ली।
चुनावी हार के बाद TMC में विभाजन
इस बगावत ने औपचारिक रूप से उस पार्टी में विभाजन की रेखा खींच दी, जिसकी स्थापना ममता बनर्जी ने एक जनवरी, 1998 को कांग्रेस से अलग होकर की थी। हालांकि, विद्रोह के बीज काफी पहले ही पड़ चुके थे। विधानसभा चुनाव में चार मई को BJP के हाथों मिली हार के बाद पार्टी के भीतर कलह उभरने लगी थी। पार्टी के कुछ विधायकों को लगने लगा था कि संगठन और निर्णय प्रक्रिया में पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी के भतीजे एवं सांसद अभिषेक बनर्जी का दखल लगातार बढ़ रहा है, जिससे असंतोष धीरे-धीरे गहराता चला गया।
नवनिर्वाचित विधायकों की बैठक में 6 मई को ममता बनर्जी ने कथित तौर पर विधायकों से चुनाव अभियान में अभिषेक बनर्जी की भूमिका के लिए खड़े होकर उनका अभिनंदन करने को कहा। हालांकि इसका उद्देश्य उनके योगदान को स्वीकारना था। लेकिन पार्टी के एक वर्ग में इस कदम को लेकर फुसफुसाहट शुरू हो गई। कुछ विधायकों को लगने लगा कि पार्टी का केंद्र धीरे-धीरे एक ही परिवार के इर्द-गिर्द सिमटता जा रहा है।
19 मई को शुरू हुआ बगावत
पार्टी में असंतोष पहली बार खुले तौर पर 19 मई को सामने आया। एक अन्य बैठक में रिताब्रता बनर्जी और इंटाल्ली के विधायक संदीपन साहा ने सवाल उठाया कि फालटा विधायक जहांगीर खान द्वारा पुन:चुनाव से हटने की सार्वजनिक घोषणा किए जाने के बावजूद पार्टी ने उन्हें निष्कासित क्यों नहीं किया। चूंकि जहांगीर को अभिषेक बनर्जी का करीबी माना जाता था, इसलिए इस आलोचना को व्यापक तौर पर तृणमूल के राष्ट्रीय महासचिव को सीधी चुनौती के रूप में देखा गया।
पीटीआई के मुताबिक, घटनाक्रम ने तीन दिन बाद निर्णायक मोड़ लिया। रिताब्रता बनर्जी राज्यसभा सदस्य के रूप में अपना कार्यकाल समाप्त होने के बाद की औपचारिकताएं पूरी करने के लिए 22 मई को दिल्ली गए हुए थे। तभी वह दोपहर के भोजन के लिए बंग भवन पहुंचे, जहां उनकी मुलाकात मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से हो गई।
इसके बाद रिताब्रता ने सार्वजनिक रूप से विपक्षी विधायकों और सांसदों को प्रशासनिक समीक्षा बैठकों में आमंत्रित करने के शुभेंदु अधिकारी के फैसले का स्वागत किया और इसे स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा बताया। उनके इस बयान ने तत्काल राजनीतिक हलकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।
जाली सिग्नेचर से शुरू हुआ विवाद
हालांकि, कुछ ही दिन में तृणमूल एक अलग विवाद में घिर गई। 25 मई को आरोप सामने आए कि विधानसभा में विधायक दल के नेतृत्व ढांचे से जुड़े दस्तावेजों पर कई विधायकों के जाली सिग्नेचर कर विधानसभा स्पीकर को सौंपे गए थे। इस आरोप ने पहले से सुलग रहे असंतोष को और हवा दे दी। फिर पार्टी के भीतर जारी खींचतान को खुले टकराव में बदल दिया।
इस विवाद ने 27 मई को कानूनी मोड़ ले लिया जब रिताब्रता बनर्जी और संदीपन साहा ने विधानसभा स्पीकर से औपचारिक शिकायत कर हस्ताक्षरों की जालसाजी का आरोप लगाया। इसके बाद विधानसभा सचिवालय ने मामले को पुलिस के संज्ञान में दिया, जिसके साथ ही CID की ओर से जांच शुरू हो गई।
अभिषेक बनर्जी के खिलाफ लोगों का फूटा गुस्सा
अगले दो दिन के दौरान जब जांचकर्ताओं ने विधायकों से पूछताछ शुरू की, तो मामला महज एक प्रक्रियागत विवाद तक सीमित नहीं रहा। बल्कि तेजी से राजनीतिक संघर्ष में बदल गया। यह राजनीतिक सकंट 30 मई को उस समय और गहरा गया, जब अभिषेक बनर्जी पर सोनारपुर दौरे के दौरान भीड़ ने हमला कर दिया।
सभी राजनीतिक दलों ने इस घटना की निंदा की। लेकिन तृणमूल के कई नेताओं ने निजी तौर पर संगठन और विधायक दल के कुछ वर्गों की अपेक्षाकृत फीकी प्रतिक्रिया पर ध्यान दिलाया। उनके अनुसार, यह नेतृत्व और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के एक हिस्से के बीच बढ़ती दूरी का संकेत था।
इसके बाद 31 मई तक नेतृत्व की पकड़ कमजोर पड़ती साफ दिखाई देने लगी। ममता बनर्जी ने अपने कालीघाट स्थित आवास पर नवनिर्वाचित विधायकों की बैठक बुलाई। लेकिन उसमें अपेक्षा से कम उपस्थिति रही। निर्णायक रूप से विभाजन एक जून को मुख्यमंत्री शुभेंदु द्वारा सार्वजनिक रूप से यह खुलासा किए जाने के कुछ ही घंटे बाद सामने आया कि सीआईडी जांच रिताब्रता बनर्जी और संदीपन साहा की शिकायतों के आधार पर शुरू हुई है।
निष्कासन ने आग में घी का काम किया
तृणमूल कांग्रेस ने दोनों नेताओं को पार्टी से निष्कासित कर दिया। लेकिन संकट को थामने के बजाय इस कदम ने बगावत को और तेज कर दिया। देखते ही देखते बागी खेमे के भीतर इस मुहिम को एक नाम भी मिल गया- 'ऑपरेशन क्राउन प्रिंस...'।
बागी गुट को तृणमूल कांग्रेस के आधिकारिक विधायक दल के रूप में मान्यता मिल गई है। दिल्ली में शुरू हुई यह बगावत, जिसने सिग्नेचर जालसाजी के आरोपों, संगठन के भीतर बढ़ते असंतोष और उत्तराधिकार की लड़ाई के सहारे रफ्तार पकड़ी थी, उसका अंतिम और निर्णायक अध्याय आखिरकार विधानसभा के भीतर ही लिखा गया। ममता बनर्जी के व्यक्तित्व और राजनीतिक प्रभुत्व के इर्द-गिर्द खड़ी हुई पार्टी ने महज 13 दिन में अपने अब तक के इतिहास की सबसे बड़ी दरार देखी।