MGNREGA: केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2026 की पहली छमाही (अप्रैल से सितंबर) के लिए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत खर्च को उसकी कुल सालाना रकम के 60 फीसदी तक सीमित कर दिया है। The Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक, यह पहली बार है जब सरकार ने इस ग्रामीण रोजगार योजना पर खर्च की कोई सीमा तय की है।
खर्च नियंत्रण सिस्टम का हिस्सा बना मनरेगा
अब तक मनरेगा एक मांग-आधारित योजना रही है, जिसे ग्रामीण विकास मंत्रालय (MoRD) चलाता है। लेकिन, अब वित्त मंत्रालय ने इसे मंथली/क्वार्टरली एक्सपेंडिचर प्लान (MEP/QEP) के तहत लाने का फैसला किया है।
यह एक खर्च नियंत्रण प्रणाली है, जिसे मंत्रालयों की नकदी प्रवाह और उधारी पर नजर रखने के लिए 2017 में शुरू किया गया था। मनरेगा अब तक इस व्यवस्था से बाहर था।
ग्रामीण विकास मंत्रालय ने क्या कहा?
ग्रामीण विकास मंत्रालय की दलील है कि मनरेगा मांग-आधारित योजना है यानी इसमें खर्च काम की मांग के मुताबिक कम या ज्यादा हो सकता है। ऐसे में इस पर खर्च की कोई पूर्व-निर्धारित सीमा लगाना व्यवहारिक नहीं है।
इसके बावजूद मंत्रालय ने इस साल की पहली और दूसरी तिमाही के लिए MEP/QEP योजना वित्त मंत्रालय के बजट डिवीजन को सौंप दी है, जिसमें खर्च की सीमा बढ़ाने का प्रस्ताव दिया गया था। लेकिन वित्त मंत्रालय ने उस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया।
वित्त मंत्रालय ने क्या तय किया?
कई दौर की बातचीत के बाद, वित्त मंत्रालय ने तय किया कि MoRD वित्त वर्ष 2026 की पहली छमाही में मनरेगा की कुल सालाना रकम ₹86,000 करोड़ में से 60% यानी ₹51,600 करोड़ तक ही खर्च कर सकता है।
मनरेगा की मजदूरी बकाया पर सवाल
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वित्त मंत्रालय ने मनरेगा की लंबित देनदारियों पर सवाल उठाए हैं, जो कि इस साल की आवंटित रकम से चुकाई जानी हैं। मनरेगा कानून, 2005 के अनुसार मजदूरी का भुगतान 15 दिनों के भीतर किया जाना अनिवार्य है।
इसके बावजूद ₹21,000 करोड़ से अधिक की देनदारियां अब भी बाकी हैं, जिस पर वित्त मंत्रालय ने चिंता जताई है। इतनी बड़ी रकम की बकाया देनदारी के चलते सीमित खर्च के दायरे में योजना चलाना और कठिन हो सकता है।
मनरेगा के तहत वित्त वर्ष में कम से कम 100 दिन के रोजगार की गारंटी मिलती है। यह गारंटी हर उस ग्रामीण परिवार के लिए है, जिसके बालिग सदस्य असंगठित मजदूरी करने के लिए तैयार हों।
यह योजना अगस्त 2005 में संसद द्वारा पारित की गई थी और फरवरी 2006 में देश के सबसे गरीब जिलों में लागू की गई। 2008 में इसे पूरे देश में विस्तार दे दिया गया।
भ्रष्टाचार रोकने के भी उपाय कर रही सरकार
सरकार मनरेगा में भ्रष्टाचार और गड़बड़ियों को रोकने के लिए कई कदम उठा रही है। जैसे कि नेशनल मोबाइल मॉनिटरिंग सिस्टम (NMMS) के जरिए श्रमिकों की डिजिटल हाजिरी अनिवार्य करना और आधार लिंक्ड बैंक खातों के जरिए मजदूरी भुगतान सुनिश्चित करना।