मुजफ्फरनगर में 97 केस की फाइलों पर फिर उठे सवाल, जज रवि कुमार दिवाकर ने फैसले में क्या लिखा?
अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने NDPS Act के एक मामले में आरोपी को बरी करते हुए अदालत से 97 हत्या के मामलों को वापस लेने के आदेश पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि न्यायाधीश का सबसे जरूरी काम न्याय करना है, लेकिन अगर न्याय करने वाले के साथ ही अन्याय हो जाए तो वह अपनी बात कहां रखेगा। उनके इस बयान के बाद अदालत से जुड़े इस फैसले को लेकर चर्चा शुरू हो गई है।
मुजफ्फरनगर: उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में 97 हत्या के मामलों की पत्रावलियां वापस लिए जाने का मामला एक बार फिर चर्चा में है। फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या-3 के पीठासीन अधिकारी रवि कुमार दिवाकर ने NDPS Act के एक पुराने मामले में फैसला सुनाते हुए इन फाइलों को वापस लिए जाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। रवि कुमार दिवाकर मूल रूप से उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के रहने वाले हैं। उनका जन्म जुलाई 1980 में हुआ था। पढ़ाई की बात करें तो उन्होंने B.Com और LLM की पढ़ाई की है। इसके बाद साल 2009 में उन्होंने अतिरिक्त सिविल जज के तौर पर उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा में कदम रखा। तब से अब तक उन्होंने न्यायिक सेवा में करीब 17 साल पूरे किए हैं। इस दौरान उनकी तैनाती उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों में रही और उन्होंने सुल्तानपुर, बदायूं, वाराणसी, बरेली और मुजफ्फरनगर जैसे जिलों में अलग-अलग जिम्मेदारियां संभालीं। फिलहाल वह मुजफ्फरनगर की फास्ट ट्रैक कोर्ट में अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश के पद पर तैनात हैं।
दरअसल, जज रवि कुमार दिवाकर की अदालत से हत्या के 97 लंबित मामलों की पत्रावलियां अगस्त में जिला एवं सत्र न्यायालय में वापस ली गई थीं। इससे पहले उनकी अदालत में हत्या से जुड़े कई मामलों में फैसले हुए थे। अब एक एनडीपीएस मामले के फैसले में जज ने इन पत्रावलियों को वापस लेने के आदेश और उसकी कानूनी प्रक्रिया पर अपनी टिप्पणी दर्ज की है।
रिटायरमेंट से 13 दिन पहले लिया गया था फैसला
फैसले में दर्ज जज की टिप्पणी के मुताबिक, 97 पत्रावलियों को वापस लेने का आदेश तत्कालीन जिला जज के रिटायरमेंट से करीब 13 दिन पहले जारी हुआ था। जज ने सवाल उठाया कि इन मामलों को वापस लेने के आदेश में इसके पीछे का कारण स्पष्ट नहीं किया गया।
रिपोर्टों के अनुसार, इन 97 मामलों में ऐसे मुकदमे भी शामिल थे जिनकी सुनवाई उनकी अदालत में आगे बढ़ चुकी थी। जज दिवाकर ने अपने फैसले में ऐसे मामलों को वापस लेने की कानूनी व्यवस्था का उल्लेख करते हुए इस प्रक्रिया पर आपत्ति दर्ज की।
‘पार्ट-हर्ड’ मामलों को लेकर क्या है सवाल?
मामले का अहम हिस्सा ‘पार्ट-हर्ड’ यानी ऐसे मुकदमों से जुड़ा है जिनकी सुनवाई शुरू हो चुकी है। जज दिवाकर ने अपने फैसले में दंड प्रक्रिया संहिता और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की संबंधित धाराओं का हवाला दिया।
उनकी टिप्पणी के मुताबिक, ऐसे मामलों को वापस लेने के लिए कानूनी प्रावधानों और प्रक्रिया का पालन जरूरी है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि किसी प्रशासनिक आदेश में कारण स्पष्ट नहीं किया गया है तो उसकी वैधानिकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
किस मामले में सुनाया गया फैसला?
यह टिप्पणी मुजफ्फरनगर के अशोक भारती से जुड़े पुराने NDPS मामले में फैसला सुनाते समय सामने आई। मामला वर्ष 2015 का था और आरोपी पर 150 ग्राम चरस रखने का आरोप था।
अदालत ने अभियोजन की ओर से पेश साक्ष्यों में कमियां पाईं। रिपोर्ट के अनुसार, बरामदगी के दौरान स्वतंत्र गवाहों की मौजूदगी, साक्ष्यों में अंतर और NDPS कानून के जरूरी प्रावधानों के पालन को लेकर सवाल सामने आए। अदालत ने पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने पर आरोपी को दोषमुक्त कर दिया।
पहले भी 97 फाइलें चर्चा में आई थीं
97 पत्रावलियों का मामला पहली बार अगस्त में सामने आया था। उस समय रिपोर्टों में बताया गया था कि जज रवि कुमार दिवाकर की अदालत से हत्या के मामलों की 100 के आसपास लंबित फाइलें जिला जज की अदालत में वापस ली गई थीं। बाद की रिपोर्टों में संख्या 97 बताई गई।
रवि कुमार दिवाकर की अदालत इस साल हत्या के कई मामलों में मृत्युदंड सुनाने को लेकर भी चर्चा में रही है। अलग-अलग रिपोर्टों के अनुसार, अप्रैल से सितंबर के बीच उनकी अदालत ने हत्या के मामलों में कई दोषियों को मौत की सजा सुनाई।
जज ने फैसले में न्याय व्यवस्था पर भी टिप्पणी की
NDPS मामले के फैसले में जज ने न्यायिक और प्रशासनिक शक्तियों के इस्तेमाल से जुड़े व्यापक सवाल भी उठाए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि न्यायिक व्यवस्था में अधिकारों का इस्तेमाल निर्धारित कानूनी सीमाओं के भीतर होना चाहिए।
इस तरह 97 मामलों की पत्रावलियां वापस लिए जाने का मुद्दा अब सिर्फ प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा है। जज रवि कुमार दिवाकर की हालिया टिप्पणी के बाद यह मामला न्यायिक प्रक्रिया और अदालतों के प्रशासनिक अधिकारों से जुड़े सवालों के संदर्भ में फिर चर्चा में आ गया है।