नेपाल के पीएम बालेन शाह के करीबी समेत उनके पार्टी के 17 सांसद Gen-Z क्रांति को लेकर फंसेंगे? फिर राजनीतिक भूचाल!
इस लिस्ट में सबसे बड़ा नाम रवि लामिछाने का है, जो टीवी एंकर से नेता बने हैं और प्रधानमंत्री बालेन शाह की पार्टी (RSP) के अध्यक्ष हैं। बता दें कि पिछले साल सितंबर में हुए इस छात्र आंदोलन के ठीक छह महीने बाद देश में चुनाव हुए थे, जिसमें बालेन शाह की पार्टी को भारी बहुमत मिला था
नेपाल के पीएम बालेन शाह के करीबी समेत उनके पार्टी के 17 सांसद Gen-Z क्रांति को लेकर फंसेंगे? फिर राजनीतिक भूचाल!
नेपाल की राजनीति में एक बार फिर बड़ा भूचाल आ गया है। राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (NHRC) ने पिछले साल हुए 'Gen-Z आंदोलन' के दौरान हुई भीषण हिंसा को लेकर एक चौंकाने वाली रिपोर्ट जारी की है। आयोग ने प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह (बालेन शाह) की सत्ताधारी पार्टी 'राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी' (RSP) के 17 मौजूदा सांसदों के खिलाफ हिंसा भड़काने के आरोपों में गंभीर जांच की सिफारिश की है।
इस लिस्ट में सबसे बड़ा नाम रवि लामिछाने का है, जो टीवी एंकर से नेता बने हैं और प्रधानमंत्री बालेन शाह की पार्टी (RSP) के अध्यक्ष हैं। बता दें कि पिछले साल सितंबर में हुए इस छात्र आंदोलन के ठीक छह महीने बाद देश में चुनाव हुए थे, जिसमें बालेन शाह की पार्टी को भारी बहुमत मिला था।
किन-किन पर गिरेगी गाज?
मानव अधिकार आयोग ने बुधवार को सार्वजनिक की गई अपनी रिपोर्ट में जिन 17 सांसदों की सूक्ष्म स्तर पर जांच करने को कहा है, उनमें मुख्य नाम हैं:
रवि लामिछाने (पार्टी अध्यक्ष)
तोशिमा कार्की
मनीष झा
सुधन गुरुंग
हरी ढकाल
सुलभ खरेल
गणेश कार्की और अन्य सांसद।
आरोप क्या हैं?
आयोग का कहना है कि आंदोलन के पहले, आंदोलन के दौरान और उसके बाद इन नेताओं के सार्वजनिक बयानों, सोशल मीडिया पोस्ट और खुफिया विभाग की रिपोर्ट से ऐसे संकेत मिलते हैं कि इन्होंने भीड़ को उकसाया। जांच में यह देखा जाएगा कि क्या इनके बयानों की वजह से जनता का गुस्सा भड़का और शांति व्यवस्था खराब हुई।
जेल तोड़ने और हिंसा की शुरुआत कैसे हुई?
रिपोर्ट में एक बेहद गंभीर घटना का जिक्र है। पार्टी अध्यक्ष रवि लामिछाने सहकारी घोटाले और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों में 'नखू जेल' में बंद थे। आरोप है कि उनकी पार्टी के सांसदों ने भीड़ को उकसाया, जिसके बाद प्रदर्शनकारियों ने जेल पर धावा बोल दिया और लामिछाने को कस्टडी से छुड़ा लिया। इस घटना के बाद पूरे नेपाल की अलग-अलग जेलों में कैदियों के भागने और जेल तोड़ने (Jail Breaks) की बाढ़ आ गई थी।
तीन पूर्व मंत्रियों और पूर्व पीएम ओली पर भी सख्त एक्शन की तैयारी
आयोग ने सिर्फ मौजूदा सरकार ही नहीं, बल्कि आंदोलन के समय (8-9 सितंबर 2025) सत्ता में रही पिछली सरकार के बड़े दिग्गजों को भी लपेटे में लिया है। आयोग ने तत्कालीन प्रधानमंत्री के. पी. शर्मा ओली, पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक और पूर्व संचार मंत्री पृथ्वी सुब्बा गुरुंग के खिलाफ मानव अधिकार उल्लंघन के मामले में सख्त कार्रवाई की सिफारिश की है।
बनेगा नया कानून, पद से होंगे सस्पेंड:
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए आयोग ने कहा कि फिलहाल ऐसे मामलों के लिए देश में कड़ा कानून नहीं है। इसलिए सरकार एक नया कानून बनाए, जिसके तहत दोषी पाए जाने पर:
6 महीने की जेल या 3 लाख नेपाली रुपये का जुर्माना (या दोनों) हो।
5 साल तक चुनाव लड़ने या सरकारी पद पर बैठने पर रोक लगे।
3 साल तक विदेश यात्रा और प्रशासनिक पदों पर बैन लगे।
जब तक यह कानून नहीं बनता, तब तक इन पदों पर बैठे नेताओं को तुरंत 6 महीने के लिए सस्पेंड किया जाए।
आंदोलन में क्या हुआ था?
रिपोर्ट के मुताबिक, 8 सितंबर को माईतीघर मंडला में शुरू हुआ प्रदर्शन पहले शांतिपूर्ण था, लेकिन अगले ही दिन इसने हिंसक रूप ले लिया। इस पूरी हिंसा में प्रदर्शनकारियों, आम नागरिकों और पुलिसकर्मियों समेत कम से कम 76 लोगों की मौत हुई थी।
8 सितंबर: संसद भवन के पास सुरक्षा बलों की गोलीबारी में 42 प्रदर्शनकारी और नागरिक मारे गए। फॉरेंसिक जांच में सामने आया कि भीड़ पर असली (लाइव) गोलियां चलाई गई थीं।
9 सितंबर: देश भर में आगजनी की घटनाओं में 21 लोग जिंदा जल गए। इसी दिन गुस्साई भीड़ ने 3 पुलिसकर्मियों की पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। अस्पताल में इलाज के दौरान 23 और लोगों ने दम तोड़ा।
10 सितंबर: जेलों से भागने की कोशिश के दौरान पुलिस की कार्रवाई में 10 और कैदी मारे गए।
सेना की देरी और सोशल मीडिया बैन पर उठे सवाल
आयोग ने उस समय की सरकार द्वारा सोशल मीडिया पर लगाए गए बैन को असंवैधानिक बताया है और पूर्व संचार मंत्री को इसका जिम्मेदार माना है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस आंदोलन में कुछ संगठित समूहों ने घुसपैठ की थी, जिन्होंने पेट्रोल बम (Molotov Cocktails) लाने और सोशल मीडिया पर एआई (AI) द्वारा बनाई गई फर्जी हिंसक तस्वीरें फैलाकर माहौल बिगाड़ा।
इसके अलावा, नेपाल सेना की भूमिका पर भी सवाल उठे हैं। संसद और सुप्रीम कोर्ट जैसी मुख्य इमारतों में आग लगाए जाने के बाद सेना देर से क्यों पहुंची, इस पर सेना प्रमुख और कमांडरों से जवाब तलब करने को कहा गया है।
पीड़ितों के लिए मुआवजे का ऐलान
मानव अधिकार आयोग ने सरकार को निर्देश दिए हैं कि:
हिंसा में घायल हुए सभी लोगों का जीवनभर मुफ्त इलाज कराया जाए।
मृतकों के परिवार के कम से कम एक सदस्य को नौकरी या रोजगार दिया जाए।
जो लोग हमेशा के लिए दिव्यांग हो गए हैं, उन्हें जीवनभर आर्थिक सहायता मिले।
आगजनी में मारे गए 21 लोगों (जिनमें 12 की पहचान अभी तक नहीं हुई है) के परिवारों को उचित मुआवजा दिया जाए।