Nizamuddin Markaz Case: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2020 के एक मामले में अहम फैसला देते हुए दो लोगों के खिलाफ आपराधिक मामला रद्द करने का फैसला सुनाया है। दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन मरकज में शामिल होने और संक्रमण फैलाने की आशंका पर दर्ज मामले में दो व्यक्तियों के खिलाफ आपराधिक केस दर्ज किया गया था। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यह मामला सिर्फ आशंका के आधार पर दर्ज किया गया था। मामले के कथित आरोपियों को दुर्भावना से फंसाया गया था।
यह मामला 2020 का है, जब देश में कोरोना महामारी के दौरान लॉकडाउन लागू था। उत्तर प्रदेश के जौनपुर के शाहगंज थाने में 2 अप्रैल 2020 को प्राथमिक सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज की गई थी। पुलिस का आरोप था कि उसे सूचना मिली थी कि ये दोनों व्यक्ति दिल्ली स्थित निजामुद्दीन मरकज में धार्मिक जलसे में शामिल होने गए थे। वहां से लौटने के बाद वे प्रशासन को बिना कोई जानकारी दिए अपने परिजनों के साथ घर पर रह रहे थे।
पुलिस ने महामारी रोग अधिनियम, 1897 और आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 की विभिन्न धाराओं के तहत यह केस दर्ज किया था। पुलिस ने इन लोगों के कोरोना संक्रमित होने की आशंका के तहत चिकित्सकीय जांच कराई और उन्हें क्वारंटीन सेंटर भेज दिया। हालांकि, लैब जांच में दोनों की कोविड रिपोर्ट निगेटिव आई।
कोरोना बीमारी नहीं साबित होने के बावजुद दाखिल की गई चार्जशीट
याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में कहा कि उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर कोरोना जांच रिपोर्ट नेगेटिव आने के बावजूद दाखिल की गई। यह पूरी तरह मनगढ़ंत और आधारहीन थी। उन्होंने अदालत को बताया कि जांच एजेंसी ने स्वास्थ्य परीक्षण करने वाले डॉक्टर और पुलिसकर्मियों के बयान तो दर्ज किए, लेकिन जमीनी तथ्यों को नजरअंदाज करते हुए बेहद सतही तरीके से चार्जशीट दाखिल कर दी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 188 (पब्लिक सर्वेंट द्वारा जारी किए गए आदेश की अवज्ञा) और धारा 269/270 (लापरवाही या खतरनाक काम जिससे इंफेक्शन फैलने की संभावना हो) के तहत लगाए गए आरोपों की जांच की। एकल-जज पीठ ने कहा कि सख्त लॉकडाउन पाबंदियां लागू होने से पहले किसी कार्यक्रम में शामिल होना, जानबूझकर संक्रमण फैलाने या आदेश का साफ उल्लंघन करने के सबूत के बिना अपने आप आपराधिक मामला नहीं माना जाता। हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि राज्य सरकार ने भी इन तथ्यों का कोई विरोध नहीं किया। जस्टिस चौधरी ने कहा कि पूरी अभियोजन कार्रवाई केवल इस निराधार आशंका पर शुरू की गई थी कि वे संक्रमित हो सकते हैं और बीमारी फैला सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि संबंधित अधिकारियों ने जल्दबाजी में कार्रवाई की।