Once a Week Insulin Explained: साल में सिर्फ 52 इंजेक्शन, भारत में लॉन्च हुए पहले वन्स-वीकली इंसुलिन की कीमत समेत 5 बड़े फैक्ट्स जानिए

Once a Week Insulin Explained: भारत में इंसुलिन थेरेपी की उपलब्धता के बावजूद लोग जल्दी इंसुलिन लेना स्वीकार नहीं करते। अध्ययन बताते हैं कि 93 प्रतिशत मरीज इंसुलिन इंजेक्शन नहीं लेना चाहते और डॉक्टर भी हिचकिचाते हैं। लोग जरूरत से 8 या 9 साल की देरी से इंसुलिन शुरू करते हैं। तब तक स्वाभाविक रूप से इंसुलिन बनाने वाली शरीर की करीब आधी बीटा कोशिकाएं हमेशा के लिए खत्म हो चुकी होती हैं

अपडेटेड Jul 09, 2026 पर 5:56 PM
भारत में डायबिटीज (मधुमेह) के मरीजों के लिए एक बहुत बड़ी और राहत भरी खबर आई है।

Once a Week Insulin news: भारत में डायबिटीज (मधुमेह) के मरीजों के लिए एक बहुत बड़ी और राहत भरी खबर आई है। जहां डायबिटीज पीड़ितों के दिन की शुरुआत सुई के दर्द के साथ होती है और उन्हें साल में कम से कम 365 इंसुलिन इंजेक्शन लेने पड़ते हैं, वहीं अब इस संख्या में भारी कमी आने वाली है। डेनमार्क की दवा निर्माता कंपनी नोवो नॉर्डिस्क (Novo Nordisk) ने भारत में दुनिया का पहला वन्स-वीकली बेसल इंसुलिन (हफ्ते में एक बार लगने वाला इंसुलिन) लॉन्च कर दिया है। हमारे सहयोगी न्यूज18 की विशेष रिपोर्ट के मुताबिक कंपनी ने गुरुवार को भारत में अवीकली (Awiqli) नाम से इस इंसुलिन को लॉन्च किया है। इस दवा के 10 जुलाई से फार्मेसियों पर उपलब्ध होने की संभावना है। नोवो नॉर्डिस्क इंडिया के प्रबंध निदेशक विक्रांत श्रोत्रिय ने इसे कंपनी के लिए एक ऐतिहासिक क्षण बताया है।

आइए जानते हैं भारत में लॉन्च हुए इस पहले वन्स-वीकली इंसुलिन से जुड़े 5 बड़े फैक्ट्स, इसकी कीमत, काम करने का तरीका और फायदे या नुकसान।

1- कीमत और उपलब्धता: सबसे बड़ा फैक्ट


कितनी है कीमत?: कंपनी ने अवीकली को 2611 रुपये में 700 यूनिट के साथ लॉन्च किया है। यह एक डिस्पोजेबल फ्लेक्सटच पेन के रूप में आता है। इसकी प्रति यूनिट लागत लगभग 3.70 रुपये बैठती है। भारत जैसे कीमत के प्रति संवेदनशील बाजार के लिए कंपनी ने इसे बेहद किफायती रखने का प्रयास किया है। विक्रांत श्रोत्रिय के मुताबिक यह आधुनिक सेकेंड-जनरेशन इंसुलिन की तुलना में औसतन 25 से 35 प्रतिशत तक सस्ता है।

2- साल में 365 के बजाय सिर्फ 52 इंजेक्शन

रोजाना इंसुलिन लेने वाले मरीजों को साल में 365 इंजेक्शन लगाने पड़ते हैं। हफ्ते में सिर्फ एक बार लिए जाने वाले अवीकली से मरीजों को साल में सिर्फ 52 इंजेक्शन ही लेने होंगे। इससे मरीजों को रोज-रोज के दर्द और झंझट से बड़ी मुक्ति मिलेगी।

3- यह शरीर के भीतर कैसे काम करता है? (इसके पीछे का विज्ञान)

इस इंसुलिन का विज्ञान 1950 के दशक की खोजों से जुड़ा है। नोवो नॉर्डिस्क ने इंसुलिन चेन पर तीन अमीनो एसिड की पोजीशन में बदलाव किया है और इसके एक छोर पर फैटी एसिड जोड़ा है। इन बदलावों के कारण शरीर में दवा का प्रभाव 190 घंटे से अधिक समय तक बढ़ जाता है। यह संशोधित मॉलिक्यूल रक्त में मौजूद एल्ब्यूमिन (Albumin) प्रोटीन के साथ प्रतिवर्ती रूप से जुड़ जाता है और घंटों के बजाय कई दिनों तक धीरे-धीरे शरीर में रिलीज होता है। यही वजह है कि एक सिंगल इंजेक्शन पूरे हफ्ते का कवरेज दे देता है। कंपनी के मुताबिक इसके क्लिनिकल प्रोग्राम के छह फेज-3a ट्रायल्स में 4000 से अधिक वैश्विक मरीजों (भारतीयों सहित) पर अध्ययन किया गया। इसमें इसने प्रतिदिन दिए जाने वाले ग्लार्गिन यू100 की तुलना में बेहतर HbA1c नियंत्रण और टाइम इन रेंज का प्रदर्शन किया।

4- किसे करना चाहिए स्विच और क्या हैं इसके फायदे व साइड इफेक्ट्स?

एक्सपर्ट्स के मुताबिक यह दवा मुख्य रूप से टाइप 2 डायबिटीज के उन वयस्क मरीजों के लिए है जिनका ब्लड शुगर ओरल दवाओं से कंट्रोस नहीं हो रहा है। फोर्टिस सी-डॉक अस्पताल के एग्जीक्यूटिव चेयरमैन डॉ अनूप मिश्रा के मुताबिक यह इंसुलिन रोजाना के इंजेक्शन के बोझ को कम करेगा और मरीजों में इलाज के प्रति निरंतरता को सुधारेगा। मैक्स हॉस्पिटल्स के ग्रुप चेयरमैन (एंडोक्रिनोलॉजी एंड डायबिटीज) डॉ अमरीश मित्तल ने कहा कि 24 घंटे वाले इंसुलिन की तुलना में 7 दिन में एक बार बड़ी खुराक देना एक महत्वपूर्ण प्रगति है। इससे उन मरीजों को इंसुलिन थेरेपी शुरू करने के लिए मनाना आसान हो जाएगा जो रोज सुई लगाने के डर से मना कर देते हैं।

चुनौतियां और साइड इफेक्ट्स

डोज एडजस्टमेंट में दिक्कत: डॉ. मित्तल के मुताबिक दैनिक इंसुलिन की तरह इसमें डोज को रोजाना माइक्रो-एडजस्ट नहीं किया जा सकता। अगर मरीज का ब्लड शुगर अचानक बहुत कम हो जाता है तो वह स्थिति लंबे समय तक बनी रह सकती है क्योंकि एक बार शरीर में जाने के बाद इस इंसुलिन को रोका नहीं जा सकता। हालांकि इसका जोखिम मौजूदा इंसुलिन जितना ही है। अगर हफ्ते की कोई खुराक छूट जाती है तो उसे प्रबंधित करना अधिक जटिल होता है और उसे तुरंत ठीक नहीं किया जा सकता। इसके लिए डॉक्टरों और मरीजों को विशेष ट्रेनिंग की जरूरत होगी।

5- भारत में इंसुलिन से हिचकिचाहट और डायबिटीज के डरावने आंकड़े

भारत में इंसुलिन थेरेपी की उपलब्धता के बावजूद लोग जल्दी इंसुलिन लेना स्वीकार नहीं करते। अध्ययन बताते हैं कि 93 प्रतिशत मरीज इंसुलिन इंजेक्शन नहीं लेना चाहते और डॉक्टर भी हिचकिचाते हैं। लोग जरूरत से 8 या 9 साल की देरी से इंसुलिन शुरू करते हैं। तब तक स्वाभाविक रूप से इंसुलिन बनाने वाली शरीर की करीब आधी बीटा कोशिकाएं हमेशा के लिए खत्म हो चुकी होती हैं।

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-6 के आंकड़े बताते हैं कि भारत में 15 वर्ष और उससे अधिक उम्र के 20.9% पुरुषों और 17.8% महिलाओं में हाई ब्लड शुगर है या वे इसकी दवा ले रहे हैं। ये आंकड़ा जो NFHS-5 में क्रमशः 15.6% और 13.5% था। भारत में इस समय 10.1 करोड़ से अधिक लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं और 13.6 करोड़ लोग प्रीडायबिटीज की श्रेणी में हैं।

नोवो नॉर्डिस्क के दूसरे अपकमिंग प्रोजेक्ट्स

इंसुलिन के अलावा नोवो नॉर्डिस्क भारत में कई दूसरी दवाएं लाने की तैयारी कर रही है। कंपनी ने भारत में वजन घटाने वाली वेगोवी पिलृ (Wegovy pill) जो कि एक ओरल GLP-1 फॉर्मूलेशन है, की मंजूरी के लिए आवेदन किया है। इसके अलावा मोटापे और हृदय जोखिम के लिए 'कैग्रिलिनटाइड-सेमाग्लूटाइड', ग्रोथ हार्मोन की कमी के लिए वन्स-वीकली थेरेपी और 'सिकल सेल डिजीज' के इलाज पर भी काम चल रहा है। भारत में सेमाग्लूटाइड (पेटेंट खत्म होने) के जेनेरिक कंपीटिशन के बावजूद कंपनी का इन-हाउस सप्लाई चेन मजबूत होने के कारण डॉक्टर और मरीज इस पर भरोसा जता रहे हैं।

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