सोशल इंजीनियरिंग, पिछड़े-दलित-आदिवासियों का रिप्रेजेंटेशन: नेहरू कैबिनेट vs मोदी 3.0 के इस बड़े फर्क को समझिए
PM Modi Break Nehru Record: पीएम मोदी 10 जून को भारत के निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में लगातार सबसे लंबे समय तक पद पर बने रहने वाले व्यक्ति बन गए हैं। वह लगातार 4,399 दिन से इस पद पर हैं। उन्होंने देश के पहले पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का रिकॉर्ड तोड़ दिया है
PM Modi Break Nehru Record: पीएम मोदी ने देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के 4,398 दिनों के रिकॉर्ड को तोड़ दिया है
PM Modi Break Nehru Record: पीएम नरेंद्र मोदी ने लगातार सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने का नया कीर्तिमान स्थापित किया है। पीएम मोदी आज यानी 10 जून को भारत के प्रधानमंत्री के रूप में 4,399 दिन पूरे कर लिए हैं। उन्होंने देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के 4,398 दिनों के रिकॉर्ड को तोड़ दिया है। सोशल इंजीनियरिंग और पिछड़े-दलित-आदिवासी प्रतिनिधित्व के संदर्भ में नेहरू कैबिनेट और मोदी 3.0 के बीच एक बड़ा अंतर यह बताया जाता है कि दोनों दौर की सामाजिक संरचना और राजनीतिक प्राथमिकताएं काफी अलग थीं।
सामाजिक प्रतिनिधित्व में बदलाव
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय राजनीति में 12 साल पूरे होने के साथ भारतीय राजनीति में एक बड़ा बदलाव साफ दिखाई देता है। यह बदलाव सिर्फ चुनावी जीत या सत्ता में बने रहने तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व और राजनीतिक शक्ति से भी जुड़ा है। जिस राजनीति में कभी कांग्रेस और नेहरू युग के नेतृत्व को देश की मुख्यधारा माना जाता था, उसी राजनीति में BJP ने पिछड़े, दलित और आदिवासी समुदायों के बीच अपनी नई सामाजिक जमीन तैयार की है।
मोदी सरकार की सोशल इंजीनियरिंग
मोदी सरकार के समर्थक इसे भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी सोशल इंजीनियरिंग बताते हैं। उनका तर्क है कि आज सत्ता के शीर्ष स्तर पर उन वर्गों की मौजूदगी पहले से कहीं अधिक है, जो लंबे समय तक राजनीतिक प्रतिनिधित्व में अपेक्षाकृत कम दिखाई देते थे। वहीं आलोचक कहते हैं कि केवल प्रतिनिधित्व की संख्या ही नहीं। बल्कि सत्ता और निर्णय लेने वाले प्रमुख पदों पर हिस्सेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
नेहरू कैबिनेट Vs मोदी 3.0
आजादी के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू की कैबिनेट राष्ट्रीय एकता और संस्थागत निर्माण की परियोजना का हिस्सा थी। उस दौर में क्षेत्रीय, धार्मिक और वैचारिक संतुलन पर जोर था। लेकिन जातिगत प्रतिनिधित्व राजनीति का केंद्रीय मुद्दा नहीं था। सामाजिक रूप से प्रभावशाली और शिक्षित तबकों का वर्चस्व अधिक दिखाई देता था।
इसके उलट मोदी 3.0 की मंत्रिपरिषद को भाजपा ने सामाजिक प्रतिनिधित्व के मॉडल के रूप में पेश किया है। मंत्रिपरिषद में बड़ी संख्या में OBC, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदायों से आने वाले नेताओं को शामिल किया गया। BJP इसे अपने विस्तारित सामाजिक आधार और "सबका साथ, सबका विकास" की राजनीति का प्रमाण मानती है।
12 साल में कैसे बदला समीकरण?
2014 में भाजपा की जीत को शुरुआत में मुख्यतः हिंदुत्व और विकास के एजेंडे से जोड़कर देखा गया था। लेकिन अगले एक दशक में पार्टी ने गैर-यादव ओबीसी, गैर-जाटव दलित और विभिन्न आदिवासी समूहों के बीच अपनी पैठ बढ़ाने की रणनीति अपनाई।
उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में BJP ने जातीय समीकरणों को नए तरीके से साधने की कोशिश की। भगवा पार्टी ने स्थानीय और क्षेत्रीय नेतृत्व को आगे बढ़ाने के साथ-साथ संगठन और सरकार में भी सामाजिक विविधता बढ़ाने पर जोर दिया।
'मंडल आयोग' के बाद की राजनीति का नया अध्याय
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मंडल आयोग की राजनीति ने पिछड़े वर्गों को राजनीतिक ताकत दी। लेकिन मोदी दौर में BJP ने इस सामाजिक ऊर्जा को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश की। एक ओबीसी पृष्ठभूमि से आने वाले प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत राजनीतिक छवि भी इस रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है।
क्या सिर्फ संख्या ही पर्याप्त है?
हालांकि इस मॉडल पर सवाल भी उठते हैं। आलोचकों का कहना है कि प्रतिनिधित्व का वास्तविक आकलन केवल मंत्रियों की संख्या से नहीं। बल्कि यह देखकर होना चाहिए कि वित्त, गृह, रक्षा और विदेश जैसे प्रभावशाली मंत्रालयों में किन सामाजिक समूहों की भागीदारी है। उनके मुताबिक सामाजिक न्याय की बहस को केवल सांकेतिक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं किया जा सकता।
असली फर्क क्या है?
नेहरू युग में राष्ट्रीय एकीकरण प्राथमिकता थी। जबकि जाति-आधारित प्रतिनिधित्व राजनीति का प्रमुख आधार नहीं था।
मोदी युग में सामाजिक प्रतिनिधित्व स्वयं एक राजनीतिक रणनीति और चुनावी गणित का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
OBC नेतृत्व का उभार मंडल राजनीति के बाद हुआ। इसलिए नेहरू काल और आज के मंत्रिमंडलों की सीधी तुलना करते समय ऐतिहासिक संदर्भ को ध्यान में रखना जरूरी है।
मोदी 3.0 के समर्थक इसे सामाजिक आधार के विस्तार का प्रमाण बताते हैं। जबकि आलोचक यह तर्क देते हैं कि केवल संख्या नहीं बल्कि महत्वपूर्ण मंत्रालयों का वितरण भी देखना चाहिए।
नेहरू कैबिनेट (1947–1964)
स्वतंत्रता के शुरुआती वर्षों में मंत्रिमंडल में विभिन्न क्षेत्रों, धर्मों और विचारधाराओं को जगह दी गई। लेकिन सामाजिक न्याय और जातिगत प्रतिनिधित्व उस रूप में केंद्रीय राजनीतिक मुद्दा नहीं था जैसा आज है।
उस दौर की राष्ट्रीय राजनीति पर अपेक्षाकृत उच्च जातियों और शिक्षित वर्ग का प्रभाव अधिक माना जाता है।
दलित समुदाय से B. R. Ambedkar जैसे बड़े नेता मंत्रिमंडल में थे। लेकिन OBC राजनीति तब राष्ट्रीय स्तर पर संगठित शक्ति के रूप में उभर नहीं पाई थी।
मोदी 3.0 (2024 से 2026)
मोदी 3.0 मंत्रिपरिषद में सामाजिक प्रतिनिधित्व को खुले तौर पर राजनीतिक संदेश के रूप में पेश किया गया।
सरकार के अनुसार 72 सदस्यीय मंत्रिपरिषद में 27 OBC, 10 SC, 5 ST और 5 अल्पसंख्यक समुदायों से मंत्री शामिल हैं। यानी लगभग 47 मंत्री पिछड़े, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक वर्गों से आते हैं।
BJP और NDA ने इसे व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व तथा 'सबका साथ' की राजनीति से जोड़ा।
34 करोड़ के भारत से 146 करोड़ के भारत तक बदल गई राजनीति की तस्वीर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र की सत्ता के 12 साल पूरे होने के साथ भारतीय लोकतंत्र के दो बड़े दौरों की तुलना एक बार फिर चर्चा में है। एक तरफ स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का दौर था, जब देश की आबादी करीब 34 करोड़ थी। राजनीतिक प्रतिस्पर्धा सीमित थी और सत्ता का ढांचा अपेक्षाकृत केंद्रीकृत था। दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी का दौर है, जहां भारत 146 करोड़ से अधिक आबादी वाला, डिजिटल रूप से जुड़ा, आर्थिक रूप से कहीं अधिक जटिल और राजनीतिक रूप से अत्यंत प्रतिस्पर्धी लोकतंत्र बन चुका है।
इन दोनों नेताओं की तुलना केवल व्यक्तित्व या नीतियों के आधार पर नहीं। बल्कि उनके सामने मौजूद भारत के पैमाने और चुनौतियों के आधार पर भी की जानी चाहिए। नेहरू ने नवस्वतंत्र भारत की नींव रखी। जबकि पीएम मोदी ऐसे भारत का नेतृत्व कर रहे हैं जहां लोकतंत्र का आकार, मतदाताओं की संख्या, राजनीतिक दलों की मौजूदगी और शासन की जटिलता कई गुना बढ़ चुकी है।
लोकतंत्र का बढ़ता आकार
1947 में जब नेहरू ने देश की कमान संभाली थी, तब भारत की आबादी लगभग 34 करोड़ थी। 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने तक यह संख्या 131 करोड़ को पार कर चुकी थी और आज 146 करोड़ से अधिक है। यानी शासन, विकास और सेवा की जिम्मेदारी लगभग चार गुना बड़े भारत तक पहुंच चुकी है।
राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का विस्फोट
भारत के पहले आम चुनाव (1951-52) में केवल 53 राजनीतिक दल मैदान में थे। 2014 के लोकसभा चुनाव तक यह संख्या बढ़कर 464 हो गई। 2024 के आम चुनाव में 744 राजनीतिक दलों ने हिस्सा लिया। यह बताता है कि भारतीय राजनीति अब पहले की तुलना में कहीं अधिक बहुदलीय, प्रतिस्पर्धी और जटिल हो चुकी है।
सोशल इंजीनियरिंग का नया अध्याय
मोदी सरकार के 12 वर्षों की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धियों में से एक BJP के सामाजिक आधार का विस्तार माना जाता है। जिस पार्टी को कभी मुख्यतः सवर्ण और शहरी मध्यम वर्ग की पार्टी कहा जाता था। उसने पिछड़े, दलित और आदिवासी वर्गों में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश की।
मोदी 3.0 की मंत्रिपरिषद में बड़ी संख्या में ओबीसी, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदायों के नेताओं को शामिल किया गया। BJP इसे सामाजिक प्रतिनिधित्व के विस्तार का उदाहरण बताती है। यही वह पॉइंट है जहां मोदी युग की राजनीति ने नेहरू काल की राजनीति से अलग एक नया विमर्श खड़ा किया है।
दो दौर, दो चुनौतियां
नेहरू के सामने राष्ट्र निर्माण, संविधान की संस्थाओं को मजबूत करना और एक नवस्वतंत्र देश को स्थिर लोकतंत्र में बदलने की चुनौती थी। मोदी के सामने वैश्विक प्रतिस्पर्धा, विशाल जनसंख्या, डिजिटल शासन, कल्याणकारी योजनाओं की अंतिम व्यक्ति तक पहुंच और बहुदलीय लोकतंत्र में लगातार राजनीतिक समर्थन बनाए रखने की चुनौती है।
यही वजह है कि नेहरू और मोदी की तुलना केवल वर्षों या चुनावी जीत से नहीं। बल्कि उन परिस्थितियों और चुनौतियों के संदर्भ में भी की जाती है जिनमें दोनों ने भारत का नेतृत्व किया। 12 साल पूरे होने पर मोदी युग की कहानी केवल सत्ता में बने रहने की नहीं, बल्कि तेजी से बदलते भारत में राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों को नए सिरे से परिभाषित करने की भी है।
बदलते भारत की राजनीति
मोदी सरकार के 12 वर्षों का मूल्यांकन करते समय समर्थक इसी बदले हुए संदर्भ को सामने रखते हैं। उनका कहना है कि जहां नेहरू ने अपेक्षाकृत कम आबादी, सीमित राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और कांग्रेस के वर्चस्व वाले दौर में नेतृत्व किया। वहीं पीएम मोदी ने एक ऐसे भारत का नेतृत्व किया है जो जनसंख्या, मतदाताओं, राजनीतिक दलों, मीडिया, डिजिटल संचार और संघीय राजनीति के लिहाज से कई गुना अधिक जटिल हो चुका है।
यही कारण है कि मोदी के 12 वर्षों की चर्चा केवल सरकार की नीतियों तक सीमित नहीं रहती। बल्कि इस सवाल तक पहुंचती है कि क्या उन्होंने दुनिया के सबसे बड़े और सबसे प्रतिस्पर्धी लोकतंत्र में एक नया राजनीतिक-सामाजिक समीकरण खड़ा किया है।
चुनावी लोकतंत्र का अभूतपूर्व विस्तार
भारत के पहले आम चुनाव में करीब 17 करोड़ मतदाता थे। उस समय मतदान प्रक्रिया अपने शुरुआती चरण में थी और देश के बड़े हिस्से में लोकतांत्रिक संस्थाएं नई थीं। 2014 तक मतदाताओं की संख्या बढ़कर 83 करोड़ से अधिक हो गई। जबकि 2024 में यह आंकड़ा 96 करोड़ से ऊपर पहुंच गया। यानी जिस लोकतंत्र का संचालन नेहरू ने शुरू किया था, वह आज दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे जटिल चुनावी तंत्र बन चुका है।
मतदाताओं की बढ़ती संख्या के साथ-साथ चुनावी प्रबंधन, सुरक्षा, तकनीक, कल्याणकारी योजनाओं की पहुंच और राजनीतिक संवाद की चुनौतियां भी कई गुना बढ़ी हैं। यही वजह है कि मोदी समर्थक अक्सर यह तर्क देते हैं कि आज के भारत का प्रशासनिक और राजनीतिक पैमाना नेहरू युग की तुलना में कहीं अधिक बड़ा और जटिल है।
दोनों के कार्यकाल का निष्कर्ष
पीएम मोदी के 12 साल का राजनीतिक मूल्यांकन कई आधारों पर किया जाएगा, लेकिन सामाजिक प्रतिनिधित्व और सोशल इंजीनियरिंग का सवाल उसमें प्रमुख रहेगा। यदि नेहरू युग की राजनीति राष्ट्रीय निर्माण और संस्थागत आधार तैयार करने के लिए याद की जाती है, तो मोदी युग को सामाजिक आधार के पुनर्गठन और नए राजनीतिक गठबंधन गढ़ने के प्रयासों के लिए याद किया जा सकता है। यही वह बड़ा अंतर है, जिसने भारतीय राजनीति के पारंपरिक समीकरणों को नई दिशा दी है।
यदि केवल संख्यात्मक प्रतिनिधित्व देखा जाए, तो मोदी 3.0 में OBC, SC और ST समुदायों की मौजूदगी नेहरू काल की तुलना में कहीं अधिक दिखाई देती है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषक यह भी कहते हैं कि दोनों दौरों की तुलना करते समय उस समय की सामाजिक परिस्थितियों, चुनावी राजनीति और सत्ता संरचना के अंतर को ध्यान में रखना आवश्यक है।