देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नाम दर्ज एक रिकॉर्ड को आज पार कर गये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। चुनावों के जरिये निर्वाचित होकर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर सबसे लंबे समय तक लगातार बने रहने वाले प्रधानमंत्री हो गये हैं मोदी। लेकिन मोदी की उपलब्धियां इस रिकॉर्ड से बहुत आगे हैं। प्रशासन, राजनीति और चुनाव में उनको हासिल हुई कामयाबी से आगे निकलना तो दूर, करीब फटकना भी भविष्य में किसी के लिए नहीं होगा आसान
चुनावों के जरिये निर्वाचित होकर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर सबसे लंबे समय तक लगातार बने रहने वाले प्रधानमंत्री हो गये हैं नरेंद्र मोदी
20 मई 2014, ये वो दिन था, जब नरेंद्र मोदी संसद भवन पहुंचे थे, अपने दम पर लोकसभा चुनावों में बीजेपी को बहुमत दिलाकर। बीजेपी संसदीय दल की बैठक में सदन के नेता के रूप में उनके नाम पर मुहर लगनी थी। सेंट्रल हॉल में ये कार्यक्रम था, लेकिन वहां पहुंचने से पहले जब संसद के मुख्य द्वार पर नरेंद्र मोदी का आगमन हुआ, तो वो तत्काल नीचे झुक गये। साथ में चल रही पत्रकारों की बड़ी जमात जब तक कुछ समझे, तब तक मोदी दंडवत होकर नमन करते दिखे संसद की इस पुरानी ईमारत को, जहां पर आजादी से पहले सेंट्रल लेजिस्लेटिव एसेंबली की बैठकें होती थीं और आजादी के बाद लोकसभा और राज्य सभा की।
इसके बाद मोदी सेंट्रल हॉल पहुंचे, जहां करतल ध्वनि के साथ पार्टी नेताओं और नवनिर्वाचित बीजेपी सांसदों ने उनका स्वागत किया। इस बैठक में सर्वसम्मति से उनका चयन हुआ, सदन के नेता के तौर पर। बीजेपी संसदीय दल के इस नेता को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया और इसके साथ ही मोदी पदनामित प्रधानमंत्री बन गये।
बीस मई की शाम को ही मोदी गांधीनगर पहुंचे, आखिर अगले दिन गुजरात विधानसभा से इस्तीफा देना था, मुख्यमंत्री की कुर्सी किसी और को सौंपनी थी, जिस पर पौने तेरह साल से वो लगातार बैठे हुए थे और जिस दौरान किये गये कार्य के कारण ही देश भर में ऐसा माहौल बना पाये कि अपनी अगुआई में बीजेपी को पूर्ण बहुमत दिलाकर केंद्र में मजबूत सरकार बनाने जा रहे थे मोदी।
संसद के मुख्य द्वार पर अचानक दंडवत क्यों लेट गये थे मोदी?
20 मई की देर रात उन्हें किसी ने फोन किया, पूछा- संसद के मुख्य द्वार पर आप अचानक दंडवत क्यों लेट गये, और ऐसा करते हुए क्या महसूस किया आपने। मोदी ने कहा कि सहज ही संसद के इस भवन को नमन करने का मन हुआ, क्योंकि प्रजातंत्र का ये सबसे बड़ा मंदिर है और प्रजातंत्र का ही ये कमाल है कि वडनगर के गरीब घर में पैदा हुआ ये मोदी अब देश का प्रधानमंत्री बनने जा रहा है।
स्वाभाविक तौर पर प्रजातंत्र की ताकत और जनता के समर्थन से वर्ष 2014 के मई महीने में मोदी पहली बार प्रधानमंत्री बनने जा रहे थे, किसी की कृपा से नहीं, किसी गॉडफादर की बैकिंग से नहीं। अपने पुरुषार्थ और अपार जन समर्थन के कारण उन्हें देश की बागडोर संभालने का मौका मिलने जा रहा था।
जवाहरलाल नेहरू जिन परिस्थितियों में देश के पहले प्रधानमंत्री बने थे, उससे बिल्कुल उलट परिस्थिति में मोदी प्रधानमंत्री बनने जा रहे थे। नेहरू को पहली बार पीएम की कुर्सी गांधी कृपा से हासिल हुई थी, मोदी को अपने दम पर।
इतिहास की किताबों में साफ दर्ज है कि जब 1946 में कांग्रेस का नया अध्यक्ष बनाया जाना था, उसके साथ कुछ और चीजें तय हो जानी थीं। पहली बात तो ये कि जो भी कांग्रेस अध्यक्ष बनता, वही वायसराय की अगुआई में चलने वाली अंतरिम सरकार में नंबर दो होता और आजादी के बाद देश का पहला प्रधानमंत्री। इसलिए इस कुर्सी पर मौलाना आजाद भी अपनी निगाह गड़ाये हुए थे, वो भी उस परिस्थिति में, जब जिन्ना की अगुआई में मुस्लिम अपने लिए स्वतंत्र पाकिस्तान हासिल करने में लगे हुए थे।
जहां तक कांग्रेस पार्टी का सवाल था, पार्टी में ज्यादातर लोग चाह रहे थे कि सरदार पटेल कांग्रेस अध्यक्ष बनें। इसका सबूत ये था कि उस समय जो सोलह प्रांतीय कांग्रेस समितियां पूरे देश में थीं, उनमें से चौदह ने पटेल के पक्ष में अपना औपचारिक समर्थन दिया था, सिर्फ दो प्रदेश समितियां ऐसी थीं, जो आचार्य कृपालानी के पक्ष में थीं। लेकिन इन दोनों की जगह गांधी की जिद की वजह से उनके कृपापात्र नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष बन गये। अपने परम शिष्य सरदार पटेल को गांधी ने समझा लिया, कांग्रेस अध्यक्ष की दावेदारी से दूर हट जाने के लिए और बेहिचक सरदार ने गांधी की बात मान ली।
आजादी की पूर्व संध्या पर जब गांधी ने नेहरू को सौंपी कमान
गांधी ने आगे चलकर नेहरू को कमान सौंपने का कारण भी बताया, सरदार तो गांधी की मानकर चुप बैठ सकते थे, लेकिन नेहरू से सत्ता मोह छूट नहीं सकता था और वो कांग्रेस से हटकर अपनी अलग पार्टी बनाने से भी संकोच नहीं करते। आजादी की पूर्व संध्या पर कांग्रेस के अंदर इस तरह का कलह गांधी को मंजूर नहीं था। इसीलिए गांधी की जिद की वजह से नेहरू 1946 में कांग्रेस के अध्यक्ष बने और इसी कारण देश के पहले प्रधानमंत्री, 15 अगस्त 1947 को आजादी हासिल होने के बाद।
हालांकि देश की जनता का मैंडेट नेहरू को हासिल हुआ 1952 में, जब पहली बार देश में लोकसभा के लिए चुनाव हुए। उस चुनाव के दौरान कांग्रेस की नैया को पार लगाने में नेहरू से कही भी कम योगदान उन क्षेत्रीय क्षत्रपों का नहीं था, जो अपने- अपने राज्य में नेहरू से ज्यादा मजबूत, लोकप्रिय थे और कांग्रेस के पक्ष में जनता के वोट हासिल कर सकते थे।
जहां तक चुनाव प्रक्रिया का सवाल था, वो कितनी निष्पक्ष, पारदर्शी और ‘लेवल प्लेइंग फील्ड’ वाली थी, इसका अंदाजा इस बात से लग जाता है कि प्रधानमंत्री की कुर्सी पर पांच सालों से बैठे नेहरू तो भारतीय वायुसेना के विमान में बैठकर पूरे देश का चक्कर आराम से लगा गये, सरकारी मशीनरी का कांग्रेस पार्टी के प्रचार के लिए जमकर इस्तेमाल किया, वहीं विपक्ष के नेता बिना किसी फंडिग और संसाधन के, बड़ी मुश्किल से तांगे या टूटी- फूटी जीप पर सवार होकर महज कुछ जिलों या राज्यो का ही दौरा कर पाये। ये हाल रहा आजादी के बाद हुए पहले आम चुनावों का।
जनता ने 1977 में इंदिरा गांधी को उखाड़ फेंका
नेहरू के जमाने से शुरू हुई ये चुनाव प्रक्रिया कितनी साफ- सुथरी थी, इसका अंदाजा देश की जनता को 1971 में भी लगा, जब लोकसभा के चुनाव के दौरान खुद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चुनाव क्षेत्र रायबरेली में सरकारी मशीनरी का जमकर इस्तेमाल हुआ। यही वजह रही कि 1975 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनका चुनाव निरस्त कर दिया और इससे भन्नाई इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगा दी, विपक्षी नेताओं को जेल में ठूंस दिया, प्रेस की आजादी का गला घोंट दिया। इससे देश को निजात मिली पौने दो साल बाद, जब 1977 में इस भ्रम में इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी हटाई कि पूरे देश में उनको जन समर्थन मिलने वाला है। इसी भरोसे वो चुनाव कराने गईं, लेकिन जनता ने उन्हें उखाड़ फेंका और ‘जनता सरकार’ को 1977 में सत्ता में ला दिया।
उस समय भला किसने सोचा था कि इमरजेंसी के विरोध में चलने वाले जन आंदोलन में जो युवा गुजरात में भूमिगत रहते हुए लोगों को संगठित कर रहा है, वही युवा एक दिन उस नेहरू से आगे निकल जाएगा, जिन्होंने अपने बाद अपनी बेटी को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने की प्लानिंग अपने जीवन में ही करनी शुरू कर दी थी।
जब पांच साल तक ‘नोमिनेटेड पीएम’ रहने के बाद नेहरू पहली बार 1952 में आधिकारिक तौर पर जनता का ‘मैंडेट’ हासिल करने निकले थे, उस वक्त महज डेढ़ साल के मोदी वडनगर के अपने मामूली से घर में मां हीराबा की छाया में जीवन के शुरूआती कदम उठाने की कोशिश कर रहे थे। इलाहाबाद के एक अभिजात्य परिवार में जन्मे नेहरू ने जब पहली बार निर्वाचित प्रधानमंत्री के तौर पर पद और गोपनीयता की शपथ ली, उस वक्त भला कहां पता था कि उनका रिकॉर्ड एक ऐसा बच्चा भविष्य में तोड़ेगा, जिसका जन्म किसी महानगर या बड़े खानदान में नहीं, बल्कि एक चाय बेचने वाले के घर में, गुजरात के एक छोटे से कस्बे वडनगर में होगा।
यही नहीं, 1964 में जब 27 मई के दिन नेहरू का देहांत हुआ, उस वक्त भी भला किसने सोचा था कि लंदन के हैरो पब्लिक स्कूल से पढ़े नेहरू का रिकॉर्ड एक कस्बाई, सरकारी स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा तोड़ेगा। जब नेहरू का देहांत हुआ, उस वक्त मोदी वडनगर के बीएन हाईस्कूल से आठवीं पास करने के बाद नौंवी कक्षा की पढ़ाई में जुटे थे।
नेहरू को मिला पिता मोतीलाल नेहरू के रसूख और धन का बड़ा साथ
नेहरू के सियासी कैरियर को धार देने में पिता मोतीलाल नेहरू के रसूख और धन का बड़ा हाथ रहा, जिन्होंने कांग्रेस का दफ्तर चलाने के लिए इलाहाबाद का अपना विशालकाय घर दे दिया, जो फिलहाल ‘स्वराज भवन’ के तौर पर जाना जाता है। उसके बाद उन्होंने अपना दूसरा महलनुमा घर ‘आनंद भवन’ के तौर पर बनाया, उसमें गांधी से लेकर राष्ट्रीय आंदोलन के तमाम बड़े नेता उस जमाने के करोड़पति मोतीलाल नेहरू का भव्य आतिथ्य सत्कार हासिल कर आनंदित होते रहे, युवा नेहरू को आगे बढ़ाते रहे, जिनका लीगल कैरियर लंदन से लॉ की पढ़ाई पूरी कर स्वदेश आने के बावजूद पिता जैसा कामयाब नहीं रहा था।
बावजूद इसके बापू के लाड़ले के तौर पर नेहरू की राजनीति परवान चढ़ती रही और आखिरकार गांधी ने ही उन्हें देश का पहला प्रधानमंत्री बना दिया। प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नेहरू अपने देहांत तक लगातार बने रहे। कुल मिलाकर पौने सतरह साल तक नेहरू प्रधानमंत्री रहे, लेकिन इसमें निर्वाचित प्रधानमंत्री के तौर पर उनका कार्यकाल 4398 दिनों का रहा, तेरह मई 1952 से लेकर 27 मई 1964 तक।
नेहरू के इसी रिकॉर्ड को अब मोदी ने तोड़ दिया है। इसमें मई महीने का भी अनूठा संयोग है। नेहरू ने निर्वाचित प्रधानमंत्री के तौर पर मई 1952 में ही पहली बार गद्दी संभाली थी और 1964 के मई महीने में ही उनका देहांत हुआ। जहां तक मोदी का सवाल है, उन्होंने भी मई के महीने में ही पहली बार प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली, नेहरू के देहांत के ठीक पचास साल बाद, 26 मई 2014 को।
इस साल 26 मई को प्रधानमंत्री के तौर पर लगातार बारह साल पूरा करने वाले मोदी आज दस जून 2026 के दिन नेहरू से आगे निकल गये हैं। निर्वाचित प्रधानमंत्री के तौर पर उनका निरंतर कार्यकाल सबसे लंबा हो गया है, नेहरू के 4398 दिनों के मुकाबले आज उनके 4399 दिन हो चुके हैं।
मोदी ने बिना किसी सियासी सरपरस्त के हासिल किया ये मुकाम
लेकिन मोदी की उपलब्धियां नेहरू के मुकाबले इसलिए भी विशिष्ट हो जाती हैं, क्योंकि उन्होंने बिना किसी सियासी सरपरस्त के ये मुकाम हासिल किया है, अपने दम पर किया है। आज पूरी पार्टी और उनकी सरकार में शामिल सभी मंत्री और देश के ज्यादातर राज्यों में मौजूद एनडीए सरकारें उनके इस अनोखे कीर्तिमान का जश्न मना रही हैं, लेकिन एक दौर ऐसा भी रहा है, जब पार्टी के बाहर के सियासी दुश्मन तो ठीक, खुद पार्टी के अंदर मोदी को निबटाने वालों की कमी नहीं रही।
भला कौन भूल सकता है कि जिस मोदी ने गुजरात प्रदेश भाजपा के संगठन मंत्री के तौर पर पहली बार राज्य में बीजेपी की सरकार बनाने की आधारशीला रखी, उसी मोदी को पार्टी की आंतरिक राजनीति के कारण 1995 के उस साल में ही गुजरात से निर्वासित होना पड़ा, जिस साल गुजरात में बीजेपी के पहले सीएम के तौर पर केशुभाई पटेल ने शपथ ली थी।
जब मोदी को गुजरात छोड़कर दिल्ली आना पड़ा, बहुत सारे सियासी पंडितों ने उनका भविष्य खत्म मान लिया था। लेकिन महज छह साल के अंदर वो वापस गुजरात लौटे। तब उन्हें गुजरात वापस लौटने के लिए खुद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा, जिन वाजपेयी ने 1995 में पार्टी के विद्रोही नेता शंकरसिंह वाघेला के साथ सरकार बचाने के लिए हुए समझौते के तहत मोदी को दिल्ली जाने का इशारा किया था।
जब मोदी गुजरात लौटे, उससे पहले वो अपनी संगठन शक्ति का लोहा मनवा चुके थे, हरियाणा से लेकर हिमाचल और जम्मू- कश्मीर से लेकर पंजाब और चंडीगढ़ में पार्टी को मजबूत कर चुके थे, कई राज्यों में सत्ता का स्वाद चखा चुके थे, पार्टी की केंद्रीय ईकाई में संगठन महामंत्री बन चुके थे।
मोदी को अक्टूबर 2001 में गुजरात भेजने का फैसला पार्टी नेतृत्व की अपनी मजबूरी ही थी। पार्टी आलाकमान को मोदी के अलावा कोई तारणहार नहीं दिख रहा था, गुजरात में पार्टी का किला बचाने के लिए, जहां पार्टी को स्थानीय निकाय चुनावों से लेकर लोकसभा और विधानसभा के उपचुनावों में भी तब हार का सामना करना पड़ा था। उस नकारात्मक परिस्थिति में मोदी ने सात अक्टूबर 2001 को पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। लगे हाथों एलान किया कि वो यहां टेस्ट मैच नहीं, वनडे खेलने आए हैं, क्योंकि गुजरात में पार्टी को अगले डेढ़ साल में मजबूत करने की बड़ी चुनौती थी उनके पास। 2003 की शुरूआत में ही विधानसभा का कार्यकाल पूरा होने वाला था और चुनाव मैदान में उतरना था।
गोधरा कांड के बाद हुए चुनाव में मिली जबरदस्त जीत
लेकिन जब 2002 में गोधरा कांड के बाद हुए गुजरात दंगों को लेकर मोदी पर हमले हुए और उन्होंने इसके जवाब में विधानसभा भंग कर जनता का विश्वास फिर से हासिल करने का मन बनाया, तो 2003 की कौन कहे, दिसंबर 2002 में ही विधानसभा चुनाव हुए। इन चुनावों में मोदी ने अपनी पार्टी को जबरदस्त जीत दिलाई। 1995 और 1998 में संगठन की तरफ से मोदी ने ये गुजरात में जीत दिलाने की जिम्मेदारी निभाई थी, 2002 में खुद गुजरात के सीएम के तौर पर।
इसके बाद मोदी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 2007 और 2012 में भी गुजरात में अपनी पार्टी को विधानसभा चुनावों में जीत दिलाने में कामयाब रहे और इस तरह मोदी ने जीत की हैट्रिक बनाई। इस जोरदार कामयाबी का कारण था, बतौर मुख्यमंत्री उनका जबरदस्त प्रदर्शन, जिसकी वजह से उनके गुजरात मॉडल को लेकर गुजरात तो ठीक, देश- दुनिया में भी उनकी लोकप्रियता काफी बढ़ चुकी थी।
दिसंबर 2012 में हुए विधानसभा चुनावों में जीत के बाद पूरे देश में मोदी को अगले प्रधानमंत्री के तौर पर देखा जाने लगा, हालांकि उस वक्त केंद्र में कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए की सरकार थी। लेकिन मोदी को देश की जनता से विश्वास हासिल करने से पहले पार्टी का विश्वास हासिल करना था।
मोदी को सुनने के लिए उमड़ती थी लाखों की भीड़
बीजेपी कार्यकर्ताओं में मोदी को लेकर जबरदस्त उत्साह था, जहां जाते थे, वही लाखों की तादाद में लोग उनको सुनने के लिए उमड़ते थे, लेकिन पार्टी के कुछ बड़े नेताओं की अपनी महत्वाकांक्षा थी। इसमें लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेता भी थी, जिनका चेहरा आगे रखकर बीजेपी 2009 का लोकसभा चुनाव लड़ी थी, लेकिन कामयाब नहीं रही थी। इसके बावजूद आडवाणी की पीएम पद की लालसा गई नहीं थी।
यही वजह थी कि जून 2013 में जब गोवा में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई, तो उसमें आडवाणी शामिल नहीं हुए, वो नहीं चाहते थे कि उनकी जगह मोदी को आगे किया जाए। कहां ये माना जा रहा था कि गोवा की कार्यकारिणी में मोदी का ऐलान बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर हो जाएगा, लेकिन आडवाणी के तेवर की वजह से कार्यकारिणी के आखिरी दिन, 9 जून को तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह मोदी को सिर्फ कैंपेन कमिटि का अध्यक्ष बनाने की घोषणा ही कर पाए।
लेकिन आडवाणी को ये भी मंजूर नहीं हुआ। अगले ही दिन, दस जून 2013 को आडवाणी ने विरोध स्वरूप पार्टी के सभी पदों इस्तीफा दिया। बड़ी मुश्किल से उन्हें समझाकर इस्तीफा वापस करवाया गया, लेकिन नीतीश कुमार जैसे नेताओं ने तो खुलेआम मोदी विरोध का झंडा बुलंद कर दिया, जबकि वो बीजेपी के समर्थन से बिहार में सरकार चला रहे थे।
जब मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने की औपचारिक घोषणा हुई
हालात कितने चुनौतीपूर्ण थे, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 16 जून 2013 को नीतीश कुमार ने अपनी सरकार में शामिल बीजेपी के मंत्रियों को बर्खास्त कर दिया और एनडीए से बाहर निकल गये। यही नहीं, तेरह सितंबर 2013 को जब राजनाथ सिंह ने मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने की औपचारिक घोषणा की, तब आडवाणी उस बैठक में नहीं गये, बल्कि घोषणा के बाद मोदी खुद आडवाणी का आशीर्वाद लेने उनके घर गये, अपनी तरफ से सम्मान देने में कोई कोताही नहीं की उन्होंने।
क्या नेहरू ऐसा कर सकते थे, इतिहास में झांके तो जवाब है नहीं। सबको याद होगा कि जब सरदार पटेल का 1950 में देहांत हुआ, तो नेहरू ने तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को पटेल के अंतिम संस्कार में जाने से मना करने की कोशिश की थी। यही नहीं, जो राजेंद्र प्रसाद नेहरू की अनिच्छा के बावजूद देश के प्रथम राष्ट्रपति ही नहीं बने, बल्कि दो- दो बार पुनर्निर्वाचित हुए, उनका जब 18 फरवरी 1963 को देहांत हुए, तो नेहरू पटना में उनके अंतिम संस्कार में शामिल तक नहीं हुए, बल्कि तत्कालीन राष्ट्रपति राधाकृष्णन को भी इसमें शामिल होने से रोकने की कोशिश की।
जिस सरदार पटेल का वाजिब हक छीनकर नेहरू को देश का प्रथम प्रधानमंत्री बनाया गया था, उस नेहरू से इतना भी नहीं हुआ कि अपने पौने सतरह साल लंबे पीएम कार्यकाल में देश का श्रेष्ठ नागरिक सम्मान भारत रत्न उस सरदार को इनायत कर सकें, जिन्होंने भारत के एकीकरण का भगीरथ कार्य किया था।
मजे की बात ये रही कि नेहरू को खुद पीएम रहते हुए 1955 में भारत रत्न लेने में कोई नैतिक संकोच नहीं हुआ, सरदार को 1991 में भारत रत्न हासिल हुआ, वो भी नेहरू के अपने प्रपौत्र राजीव गांधी के साथ, मरणोपरांत, जिन राजीव का देहांत ही 1991 में हुआ था। सरदार को देश का सर्वश्रेष्ठ नागरिक सम्मान हासिल करने के लिए इकतालीस साल का इंतजार करना पड़ा, वो भी तब जबकि नेहरू- गाधी खानदान का कोई अपना व्यक्ति प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नहीं बैठा था।
जहां तक मोदी का सवाल है, अपने बारह वर्षों के मौजूदा शासनकाल में उन्होंने नागरिक सम्मानों को देश के आम आदमी के सामर्थ्य और उपलब्धियों को शासकीय तौर पर सराहना प्रदान करने का हथियार बना दिया है, न कि अभिजात्य वर्ग का अंलकरण, जैसा नेहरू- गांधी राज में रहा था। हर साल सैकड़ों की तादाद में उन लोगों को ये अलंकरण मिलते हैं, जो कभी अखबार की सुर्खियों को बटोरने में नहीं लगे रहते, बल्कि धरातल पर बड़े बदलाव अपने प्रयासों से लाने में लगे रहते हैं।
जहां तक भारत रत्न का सवाल है, उससे सिर्फ अपनी विचारधारा और अपनी पार्टी के लोगों को नहीं नवाजा है मोदी ने, जैसा नेहरू करते थे, बल्कि उन विभूतियों को भी नवाजा है, जिनके अपने राजनीतिक शिष्य कहे जाने वाले लोग उनके लिए कुछ नहीं कर पाए थे। कर्पूरी ठाकुर का उदाहरण सबके सामने है, जिन्हें भारत रत्न प्रदान करने का यश मोदी ने हासिल किया। ये काम लालू यादव जैसे लोगों ने नहीं किया, जिन्होंने कर्पूरी ठाकुर के नाम पर ही अपनी राजनीति चमकाई और जमकर उनका फायदा उठाया। मोदी ने 2024 में न सिर्फ कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न से नवाजा बल्कि लालकृष्ण आडवाणी, पीवी नरसिंह राव और एमएस स्वामीनाथन को भी। राव और स्वामीनाथन का कोई संबंध बीजेपी से नहीं था, बल्कि राव तो वो प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने आरएसएस पर आखिरी बार प्रतिबंध लगाया था, 1992 में विवादस्पद बाबरी ढांचा विध्वंस के बाद। जहां तक रिश्तों को संभालने, खुद से पहल कर सुधारने का सवाल है, उसके लिए मोदी का नीतीश कुमार के मामले में दिखाया गया बड़प्पन सबके सामने है। जिन नीतीश ने बार- बार मोदी का साथ छोड़ा, उन्हें अपमानित किया, उन्हें भी सहेजते रहे मोदी, ये सोचकर कि भारतीय राजनीति में नीतीश जैसे लोग कम ही हैं, जो सियासी तौर पर लंबे लमय तक विरोधी रहने के बावजूद ईमानदारी और शुचिता के मामले में विरले हैं।
जहां तक नेहरू के साथ मोदी की तुलना का सवाल है, उसमें इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालते समय नेहरू के पास कोई बड़ा प्रशासनिक अनुभव नहीं था, जबकि मोदी सबसे योग्य थे इसके लिए पद को संभालते समय। पीएम बनने के पहले एक मात्र प्रशासनिक अनुभव जो नेहरू का रहा था, वो था इलाहाबाद म्युनिसपलिटी के चेयरमैन के तौर पर। जहां तक मोदी का सवाल है, देश का प्रधानमंत्री बनने से पहले पौने तेरह साल का सफल सीएम कार्यकाल रहा था उनका, गुजरात में उन्होंने सीएम के तौर पर जो रिकॉर्ड पारी खेली थी, जैसा काम किया था, उसी के आधार पर उनकी धाक जमी थी प्रशासक के तौर पर।
बतौर प्रशासक मोदी का रिकॉर्ड एक मायने में अनूठा है। सीएम से लेकर पीएम तक, ये पचीसवां साल है मोदी का। इसी साल सात अक्टूबर को पचीस साल हो जाएंगे उन्हें शासन के शीर्ष पर रहते हुए। सिर्फ यही एक अनूठा रिकॉर्ड नहीं है, अनूठा तो ये भी है कि सीएम के तौर पर जीत की हैट्रिक लगा चुके मोदी पीएम के तौर पर भी जीत की हैट्रिक लगा चुके हैं। ऐसा रिकॉर्ड भारतीय राजनीति में कभी इससे पहले नहीं बना और मोदी के बाद दोबारा बन पाए, ये दूर- दूर तक दिखता नहीं।
स्वाभाविक तौर पर ये शानदार रिकॉर्ड मोदी के रिकॉर्डतोड़ प्रदर्शन की वजह से बना है। बतौर मुख्यमंत्री गुजरात को भारत का ग्रोथ इंजिन बनाने में कामयाब रहे मोदी दिसंबर 2025 में भारत को दुनिया की चौथी बड़ी बड़ी अर्थव्यवस्था तक लाने में कामयाब रहे थे। दुनिया में मची उथलपुथल के बीच भारत ही एक मात्र देश है, जो मोदी की अगुआई में तेज रफ्तार के साथ आगे बढ़ रहा है।
बतौर पीएम मोदी ने भारत को हर क्षेत्र में नई उंचाई पर पहुंचाया है, चाहे मसला इंफ्रास्ट्रक्चर का हो, या पर्यावरण का, रक्षा का हो या स्वास्थ्य सुविधाएं हों, आवास की सुविधाएं हों या डिजिटल रिवोल्यूशन हो। आम आदमी तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने के लिए जनधन, आधार, मोबाइल की त्रिपुटी तो उनके शासन की कामयाबी की बड़ी निशानी है। भारत की मूल पहचान को स्थापित करने में भी कामयाब रहे हैं मोदी, उपनिवेशवाद की छाया को खुरेच कर दूर किया है। जो कोई सोच नहीं सकता था, वैसे साहसिक फैसले किये हैं, चाहे जम्मू- कश्मीर से आर्टिकल 370 की समाप्ति हो या फिर अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण।
ढाई दर्जन से अधिक देशों के सर्वश्रेष्ठ नागरिक सम्मान वो हासिल कर चुके हैं मोदी
वैश्विक मोर्चे पर भी मोदी की कामयाबी जबरदस्त है, ढाई दर्जन से अधिक देशों के सर्वश्रेष्ठ नागरिक सम्मान वो हासिल कर चुके हैं, उनकी वैश्विक स्वीकार्यता की निशानी है ये। योग को पूरी दुनिया में स्थापित करना हो या फिर भारत की प्राचीन नगरियों में जान फूंकना हो, मोदी की छाप हर जगह है। यही वजह है कि चुनाव दर चुनाव उन्हें कामयाबी मिलती रही है, अभूतपूर्व जनसमर्थन मिलते रहता है।
जहां ज्यादातर नेताओं के साथ भाई- भतीजावाद और ऐशोआराम जुड़ा रहता है, वही मोदी का न तो कोई भाई और न ही कोई भतीजा आसपास दिखता है। अगर नेहरू से तुलना करने जाएं, तो मोदी ऋषि लगेंगे इस मामले में। नेहरू ने पीएम रहते हुए जहां अपनी बहन विजयालक्ष्मी पंडित को एक के बाद कई देशों का राजदूत बनाया, तो वही अपनी बेटी को अपने जीवन काल में ही कांग्रेस अध्यक्ष और फिर आगे चलकर पीएम बनाने का मार्ग प्रशस्त करने के लिए कामराज प्लान का सहारा लिया। जितने भी लोग बेटी इंदु की राह में बाधा बन सकते थे, सबको कमजोर किया नेहरू ने, रास्ते से हटाया उन्हें।
इसके उलट मोदी के परिवार का कोई सदस्य सरकारी व्यवस्था में दूर- दूर तक नहीं फटका, उनके आसपास आने का तो सवाल ही नहीं। परिवार के लिए कभी कुछ नहीं किया।
नेहरू से लेकर इंदिरा और राजीव गांधी तक, ये सभी प्रधानमंत्री रहते हुए छुट्टियां मनाने निकल जाते थे, हिल स्टेशन से लेकर अंडमान और लक्षद्वीप तक। इसके उलट मोदी ने सीएम से लेकर पीएम तक, एक दिन की छुट्टी नहीं ली, कभी आराम फरमाने नहीं गये। विदेश भी जाते हैं, तो रिकॉर्डतोड़ बैठकें करते हैं, स्वदेश लौटते ही काम फटाफट चालू हो जाता है उनका। यही वजह है कि मोदी को जनता का लगातर प्यार मिला है, उनकी लोकप्रियता लगातार बढ़ी है।
अतुलनीय हैं मोदी की चुनाव सफलताएं
मोदी की चुनाव सफलताएं भी भारतीय राजनीति के लिहाज से अतुलनीय हैं। मोदी जब संघ के प्रचारक के तौर पर करीब डेढ़ दशक तक काम करने के बाद बीजेपी से 1987 में जुड़े, तो उस समय बीजेपी की छाप राजनीतिक पंडितों के बीच ब्राह्मण- बनियों की पार्टी के तौर पर थी। उस पार्टी को मोदी सर्वसमावेशी बनाने में कामयाब रहे हैं, दलित, आदिवासी, पिछड़े सबको जोड़ते हुए। जितनी बड़ी तादाद में मोदी की कैबिनेट में इन वर्गों के लोग हैं, उतना पहले कभी नहीं हुआ। देश को पहला आदिवासी राष्ट्रपति देने का यश भी मोदी के खाते में ही गया, जब उन्होंने द्रौपदी मूर्मू को इस पद पर बिठाने का मार्ग प्रशस्त किया।
जो बीजेपी अस्सी के दशक तक सिर्फ उत्तर भारत की पार्टी मानी जाती थी, आज वो पूरे देश की पार्टी है। पूर्वोत्तर से लेकर दक्षिण तक, पश्चिम से लेकर पूरब तक, हर जगह पार्टी का प्रभुत्व बढ़ा है। भला कौन कल्पना कर सकता था कि पश्चिम बंगाल में इतने बड़े मैंडेट के साथ बीजेपी की अपनी बहुमत वाली सरकार बनेगी, मोदी ने ये भी कर दिखाया।
उम्मीदवार चाहे कोई भी हो, मतदाता को पसंद होते हैं मोदी
मोदी बीजेपी के सबसे बड़े नेता हैं, सबसे बड़े कैंपेनर हैं, उनके नाम पर वोट पड़ते हैं। उम्मीदवार चाहे कोई भी हो, मतदाता को वो पसंद हो या न हो, लेकिन मोदी को ध्यान में रखते हुए लोग उसे जीता देते हैं, ये भारतीय राजनीति के अंदर पिछले सवा दशक की सच्चाई है। इससे पहले गुजरात सीएम के तौर पर भी मोदी ये कर चुके हैं।
हालांकि मोदी आज भी अपने को सामान्य कार्यकर्ता के तौर पर ही पेश करते हैं, पार्टी के अनुशासित सिपाही के तौर पर। इतिहास के जानकारों को याद होगा कि जब पीडी टंडन कांग्रेस के अघ्यक्ष चुने गये थे, नेहरू ने सार्वजनिक तौर पर बयान देकर उनका विरोध किया था और उन्हें इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया। इससे उलट मोदी पार्टी फोरम के बाहर पार्टी के आंतरिक मुद्दों को लेकर कभी नहीं बोले, करीब तीन दशक की सियासत के बावजूद। हमेशा पार्टी को अपनी मां माना, अपने को पार्टी का सिपाही करार दिया।
मोदी का सबसे बड़ा हथियार है उनकी दूरदृष्टि, लगन और बड़े लक्ष्य हासिल करने के लिए परिश्रम की पराकाष्ठा का भाव। अपनी कामयाबी पर वो फूल कर कुप्पा नहीं होते, आराम फरमाने नहीं जाते, बल्कि और बड़े लक्ष्य हासिल करने के लिए आगे बढ़ते हैं। यही वजह है कि मोदी एक के बाद एक लगातार नये कीर्तिमान स्थापित करते जा रहे हैं, संगठन, सरकार और देश- दुनिया के लिहाज से। मोदी की असीमित उर्जा देखकर लगता भी नहीं कि इस रिकॉर्ड बनाओ अभियान में निकट भविष्य में कोई कमी आने वाली है।
क्या कभी खत्म होगा मोदी युग?
मोदी युग कब खत्म होगा, इसकी भविष्यवाणी अब वो राजनीतिक पंडित भी करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते, जो शुरूआती वर्षों में लगातार उनके कैरियर पर हर कुछ महीने पर फुल स्टॉप लग जाने का फतवा जारी करते रहते थे। अब इन पंडितों की जुबान बंद हो चुकी है, इतनी बार उनको गलत साबित कर चुके हैं वो।
लेकिन मोदी के मामले में एक बात तो तय है, मोदी जब तक अपनी पारी खत्म करेंगे, भारतीय राजनीति में ऐसे रिकॉर्ड बन चुके होंगे, जिसे पार पाने की जल्दी कोई कल्पना भी नहीं कर पाएगा। जहां तक उनकी उपलब्धियों का सवाल है, उसका बखान पार्टी और सरकार में शामिल लोग तो ठीक, देश और दुनिया की वो तमाम हस्तियां भी आज के दिन कर रही हैं, जो कभी मोदी की मुखालफत में पीछे नहीं थीं।
मोदी आज उस उंचाई पर पहुंच चुके हैं, जहां आप उन्हें इग्नोर नहीं कर सकते, झक मारकर उनकी नोटिस लेनी पड़ेगी, उनकी तारीफ करनी पड़ेगी। यही वजह है कि आज नेहरू का रिकॉर्ड तोड़ने वाले मोदी के लिए देश तो ठीक, दुनिया के तमाम देशों के शासनाध्यक्षों के बधाई संदेश आ रहे हैं, जबकि मोदी एक और बड़े मंजिल को पार करने की तैयारी में।