आजादी के बाद भी 11 महीने तक RBI के भरोसे चला था पाकिस्तान! नया मुल्क तो बना, लेकिन अपना बैंक बनाना भूल गए पड़ोसी
Partition of India 1947 Monetary System: विभाजन की उस आंधी में जमीन बांटी गई, नदियां बांटी गईं, पुलिस-फौज और मेज-कुर्सियों तक का बंटवारा हुआ। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आजादी के बाद भी करीब 11 महीनों तक पाकिस्तान का अपना कोई बैंक नहीं था
चित्र, रंग, गवर्नर के दस्तखत और पूरा डिजाइन सब कुछ भारतीय नोट वाला ही था, बस उस पर पाकिस्तान का ठप्पा लगा हुआ था
Partition of India 1947: 15 अगस्त 1947... जब नक्शे पर एक नई लकीर खींची गई और दुनिया के नक्शे पर भारत के साथ-साथ 'पाकिस्तान' नाम का एक नया मुल्क वजूद में आया। विभाजन की उस आंधी में जमीन बांटी गई, नदियां बांटी गईं, पुलिस-फौज और मेज-कुर्सियों तक का बंटवारा हुआ। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आजादी के बाद भी करीब 11 महीनों तक पाकिस्तान का अपना कोई बैंक नहीं था?
हैरान करने वाली बात यह है कि जून 1948 तक पाकिस्तान की वित्तीय रीढ़, उसका सरकारी खजाना और उसकी पूरी अर्थव्यवस्था भारत का भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ही संभाल रहा था।
जब नया मुल्क तो बना, लेकिन बैंक बनाना भूल गए!
1935 में स्थापित हुआ RBI अविभाजित ब्रिटिश भारत का केंद्रीय बैंक था। जब अगस्त 1947 में बंटवारा हुआ, तो रातों-रात कोई नया केंद्रीय बैंक खड़ा करना आसान नहीं था। बैंक बनाने के लिए सिर्फ इमारतों की जरूरत नहीं थी। उसके लिए कड़े कानून, प्रशिक्षित अधिकारी, करेंसी छापने की प्रेस और अंतरराष्ट्रीय कमर्शियल बैंकों से नेटवर्क की जरूरत थी। पाकिस्तान के पास उस समय ऐसा कोई ढांचा नहीं था। न तो सरकारी खातों को संभालने की व्यवस्था थी और न ही नोट छापने की कोई तकनीक।
इसी संकट से निपटने के लिए दोनों देशों के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ, जिसे 'पाकिस्तान ऑर्डर, 1947' नाम दिया गया। तय यह हुआ कि जब तक पाकिस्तान अपना बैंक नहीं बना लेता, तब तक RBI ही पाकिस्तान के 'सेंट्रल बैंक' के रूप में काम करेगा।
उस वक्त RBI खुद एक सरकारी बैंक नहीं था! जी हां, RBI का राष्ट्रीयकरण 1949 में हुआ था। यानी जब उसने पाकिस्तान का बैंक बनकर काम किया, तब वह एक शेयरधारकों के स्वामित्व वाला संस्थान था।
भारतीय नोटों पर छपा- 'Government of Pakistan'
बंटवारे के तुरंत बाद पाकिस्तान के पास अपने नोट छापने का कोई जरिया नहीं था। इसलिए बाजार में भारतीय रुपये ही चल रहे थे। लेकिन अपनी संप्रभुता दर्शाने के लिए पाकिस्तान सरकार ने एक अनोखा रास्ता निकाला। भारत में छपने वाले करेंसी नोटों (1, 2, 5, 10 और 100 रुपये) के ऊपर अतिरिक्त छपाई की गई। नोट के ऊपर अंग्रेजी में 'Government of Pakistan' लिखा गया। वाटरमार्क के पास उर्दू में लिखा गया- 'हुकूमत-ए-पाकिस्तान'।
चित्र, रंग, गवर्नर के दस्तखत और पूरा डिजाइन सब कुछ भारतीय नोट वाला ही था, बस उस पर पाकिस्तान का ठप्पा लगा हुआ था। ये नोट इस बात का जीता-जागता सबूत थे कि दोनों मुल्क राजनीतिक रूप से तो अलग हो चुके थे, लेकिन उनकी सांसें एक ही आर्थिक तंत्र से चल रही थीं।
1 जुलाई 1948: जब जिन्ना ने कहा- 'अब हम आर्थिक रूप से आजाद हैं'
पाकिस्तान ने तेजी से अपने बैंक के गठन पर काम शुरू किया। 12 मई 1948 को 'स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान ऑर्डर' पास किया गया। और आखिरकार, 30 जून 1948 को RBI ने पाकिस्तान के सेंट्रल बैंक के रूप में अपनी सेवाएं समाप्त कर दीं।
1 जुलाई 1948 को कराची में 'स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान' का आधिकारिक उद्घाटन हुआ और जाहिद हुसैन इसके पहले गवर्नर बने। इस उद्घाटन के मौके पर पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने कहा था, 'स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान की शुरुआत वित्तीय क्षेत्र में हमारे राज्य की संप्रभुता का प्रतीक है।'
चार चरणों में पूरा हुआ 'नोटों का बंटवारा'
पाकिस्तान के नोटों का सफर चार अलग-अलग पड़ावों से होकर गुजरा:
पहला चरण: शुद्ध भारतीय नोटों का इस्तेमाल।
दूसरा चरण: भारतीय नोट जिन पर 'Government of Pakistan' की मुहर लगी।
तीसरा चरण (अक्टूबर 1948): ब्रिटेन की प्रसिद्ध कंपनी 'थॉमस डी ला रू' से छपवाकर मंगाए गए इमरजेंसी नोट (5, 10 और 100 रुपये)।
चौथा चरण (मार्च 1949): स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान द्वारा जारी किए गए अपने पहले आधिकारिक नोट। खास बात यह थी कि ₹2 के इन नोटों पर अंग्रेजी और उर्दू के साथ बंगाली भाषा भी लिखी थी, क्योंकि तब 'पूर्वी पाकिस्तान' यानी आज का बांग्लादेश भी उसी का हिस्सा था।
1949: जब हमेशा के लिए टूट गया 'रुपये का रिश्ता'
स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान बनने के बाद भी कई महीनों तक भारतीय रुपये और पाकिस्तानी रुपये की कीमत एक बराबर (1:1) थी। लेकिन यह आर्थिक रिश्ता सितंबर 1949 में हमेशा के लिए टूट गया। ब्रिटिश पाउंड के कमजोर होने पर भारत ने अपने रुपये का अवमूल्यन कर दिया, लेकिन पाकिस्तान ने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया। इसके बाद दोनों देशों की मुद्राओं की कीमतें अलग-अलग हो गईं और दोनों के बीच व्यापारिक रिश्ते हमेशा के लिए उलझ गए।