National Herald Case: सोनिया और राहुल गांधी ने दिल्ली HC में ED की याचिका को दी चुनौती, बताया 'कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग'
National Herald Case: नेशनल हेराल्ड मनी लॉन्ड्रिंग मामले में कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया है। दोनों नेताओं ने कोर्ट में अलग-अलग याचिकाएं दाखिल कर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की उस चुनौती का विरोध किया है।
नेशनल हेराल्ड केस में सोनिया और राहुल गांधी ने दिल्ली HC में ED की याचिका को दी चुनौती
National Herald Case: नेशनल हेराल्ड मनी लॉन्ड्रिंग मामले में कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया है। दोनों नेताओं ने कोर्ट में अलग-अलग याचिकाएं दाखिल कर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की उस चुनौती का विरोध किया है, जिसमें एजेंसी ने ट्रायल कोर्ट के एक आदेश को चुनौती दी है।
18 सितंबर को दाखिल अलग-अलग लेकिन काफी हद तक एक जैसे जवाबों में, कांग्रेस नेताओं ने ED की कार्रवाई के कानूनी आधार पर सवाल उठाए। उन्होंने तर्क दिया कि एजेंसी, बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी की निजी शिकायत के आधार पर प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) का केस नहीं बना सकती।
यह मामला दिल्ली हाईकोर्ट में 12 अक्टूबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है।
गांधी परिवार ने ED की कार्रवाई के कानूनी आधार पर उठाए सवाल
दाखिल किए गए जवाबों के मुताबिक, गांधी परिवार का कहना है कि ED की कार्रवाई को सही नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि यह मामला पुलिस में दर्ज FIR के बजाय सुब्रमण्यम स्वामी की 2013 की निजी शिकायत के आधार पर शुरू हुई थी।
गांधी परिवार का तर्क है कि PMLA में ED की कार्रवाई का आधार "निजी शिकायत" बनाने का कोई प्रावधान नहीं है। उनका कहना है कि स्वामी की शिकायत उन कानूनी शर्तों को पूरा नहीं करती जो एजेंसी के लिए मनी लॉन्ड्रिंग की कार्रवाई शुरू करने के लिए जरूरी हैं।
उनकी दलीलें PMLA की धारा 5(1) पर केंद्रित हैं। जवाबों में कहा गया है कि यह प्रावधान उन स्थितियों में कार्रवाई की इजाजत देता है जिनमें CrPC की धारा 173 के तहत पुलिस की अंतिम रिपोर्ट शामिल हो, या फिर किसी अधिकृत अधिकारी की शिकायत हो जो 'शेड्यूल्ड ऑफेंस' (सूचीबद्ध अपराध) की जांच कर रहा हो।
बचाव पक्ष का कहना है कि कोई निजी व्यक्ति ऐसी जांच नहीं कर सकता और जांच करने के लिए मजिस्ट्रेट को मिली शक्तियां इस कानूनी जरूरत को दरकिनार नहीं कर सकतीं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र
गांधी परिवार ने 'विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत संघ' मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2023 के फैसले का भी हवाला दिया है।
उनका तर्क है कि इस फैसले के अनुसार, PMLA के तहत कार्रवाई शुरू करने के लिए 'शेड्यूल्ड ऑफेंस' (अनुसूचित अपराध) का रजिस्ट्रेशन जरूरी है। जवाब में यह भी आरोप लगाया गया है कि ED ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले में 'निजी शिकायत' के जिक्र का इस्तेमाल तो किया है, लेकिन उसके व्यापक संदर्भ पर ध्यान नहीं दिया है।
बचाव पक्ष ने उस लंबी अवधि की ओर भी इशारा किया है, जिसके दौरान स्वामी ने कथित तौर पर अदालत के सामने सबूत पेश नहीं किए। जवाबों के अनुसार, इसे इस बात के संकेत के तौर पर बताया गया कि निजी शिकायत को कार्यवाही का आधार मानने में क्या मुश्किलें आती हैं।
ED के अपने पुराने रिकॉर्ड का दिया हवाला
गांधी परिवार ने ED के पुराने रिकॉर्ड और बातचीत का हवाला देकर अपनी बात को सही ठहराने की कोशिश की है।
उनके जवाबों में जनवरी और अगस्त 2015 में जारी एजेंसी के टेक्निकल सर्कुलर, 2013 में सेंट्रल इन्फॉर्मेशन कमीशन के सामने दी गई जानकारी और 2024 में राइट टू इन्फॉर्मेशन (RTI) के तहत मिले जवाब का जिक्र है।
बचाव पक्ष का कहना है कि इन रिकॉर्ड्स से पता चलता है कि ED ने पहले यह रुख अपनाया था कि PMLA के तहत कार्रवाई शुरू करने से पहले FIR जरूरी है।
जवाबों में ED द्वारा जून 2021 में दर्ज ECIR का भी जिक्र है, जो स्वामी की शिकायत के सात साल बाद दर्ज की गई थी। बचाव पक्ष ने कहा कि ECIR को ट्रायल कोर्ट के सामने सितंबर 2025 में ही पेश किया गया, जब कोर्ट ने एजेंसी को इसे रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश दिया था।
नई FIR और ट्रायल कोर्ट का आदेश
जवाबों में 3 अक्टूबर, 2025 को दिल्ली पुलिस की इकोनॉमिक ऑफेंस विंग द्वारा दर्ज की गई FIR का भी जिक्र है। हालांकि, गांधी परिवार की दलीलों के अनुसार, ED ने ट्रायल कोर्ट को बताया था कि वह इस FIR पर निर्भर नहीं है।
हाई कोर्ट के सामने यह विवाद ट्रायल कोर्ट के उस फैसले से पैदा हुआ है जिसमें उसने ED की प्रॉसिक्यूशन कंप्लेंट (अभियोजन शिकायत) पर संज्ञान लेने से इनकार कर दिया था। दलीलों के मुताबिक, दिसंबर के आदेश में कहा गया था कि इस शिकायत पर कानूनी तौर पर आगे नहीं बढ़ा जा सकता।
गांधी परिवार ने इस बात पर जोर दिया है कि ट्रायल कोर्ट का फैसला कानूनी और अधिकार-क्षेत्र से जुड़े उन मुद्दों पर आधारित था, जो 'प्रेडिकेट-ऑफेंस' (मूल अपराध) के लिए FIR न होने से संबंधित थे। उनका कहना है कि निचली अदालत ने मुख्य आरोपों पर उनके गुण-दोष के आधार पर कोई फैसला नहीं सुनाया।
ED 24 घंटे के अंदर हाई कोर्ट पहुंची
बचाव पक्ष ने उस तेजी पर भी सवाल उठाए हैं जिसके साथ ED हाई कोर्ट पहुंची।
जवाबों के मुताबिक, एजेंसी ने ट्रायल कोर्ट के आदेश के 24 घंटे के अंदर अपनी रिविजन याचिका दायर की। गांधी परिवार ने इस रफ्तार को "बिजली की गति" बताया और तर्क दिया कि ऐसा लगता है कि इस कार्रवाई में एजेंसी पर आम तौर पर लागू होने वाली आंतरिक मंज़ूरी की प्रक्रियाओं को नजरअंदाज किया गया है।
उन्होंने हाई कोर्ट से ED की रिविजन याचिका को खारिज करने का भी आग्रह किया है और इसे "कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग" बताया है।
क्या है नेशनल हेराल्ड केस?
नेशनल हेराल्ड केस की शुरुआत बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी की ओर से 2013 में की गई एक शिकायत से हुई थी। इस शिकायत में Associated Journals Ltd (AJL) के अधिग्रहण को लेकर कथित साजिश के आरोप लगाए गए थे। बता दें कि AJL ही नेशनल हेराल्ड अखबार का प्रकाशन करती है।
यह शिकायत 'यंग इंडियन' से भी जुड़ा है, जिसमें सोनिया गांधी और राहुल गांधी के पास सबसे ज्यादा शेयर हैं। आरोप AJL की उन संपत्तियों से जुड़े हैं जिनकी कीमत 2,000 करोड़ रुपये से ज्यादा बताई गई है, और साथ ही 'यंग इंडियन' के जरिए किए गए 50 लाख रुपये के लेन-देन से भी जुड़े हैं।
वहीं, इस मामले में ED ने अप्रैल 2025 में मनी लॉन्ड्रिंग की शिकायत दर्ज की। ट्रायल कोर्ट ने दिसंबर 2025 में इसे खारिज कर दिया, जिसके बाद एजेंसी दिल्ली हाई कोर्ट गई।
इस मामले में शामिल अन्य लोगों और संस्थाओं में सैम पित्रोदा, सुमन दुबे, सुनील भंडारी, यंग इंडियन और डोटेक्स मर्चेंडाइज प्राइवेट लिमिटेड शामिल हैं।