दिल्ली के एक स्कूल में तीसरी भाषा को लेकर छात्र और स्कूल के बीच विवाद खड़ा हो गया है। छात्र ने तीसरी भाषा के तौर पर पंजाबी भाषा चुनी थी। लेकिन स्कूल में पंजाबी भाषा पढ़ाने के लिए योग्य टीचर उपलब्ध नहीं होने पर छात्र का नाम संस्कृत भाषा में दर्ज कर दिया। इसके बाद स्कूल ने उसे संस्कृत की परीक्षा देने के लिए कहा जा रहा था। छात्र ने इस मामले में राहत के लिए दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया। हाई कोर्ट ने फिलहाल स्टूडेंट को राहत देते हुए अगली सुनवाई तक संस्कृत की परीक्षा में शामिल होने से छूट दे दी है।
दिल्ली हाई कोर्ट ने तीसरी भाषा के तौर पर पंजाबी चुनने वाले छात्र के मामले में दखल दिया है। नवभारत टाइम्स में छपी खबर के मुताबिक, जस्टिस जसमीत सिंह ने 17 सितंबर के आदेश में कहा कि मामले की सुनवाई लंबित रहने के दौरान छात्र को संस्कृत की परीक्षा देने की जरूरत नहीं होगी। स्कूल ने पंजाबी पढ़ाने के लिए योग्य टीचर उपलब्ध नहीं होने का हवाला देकर स्टूडेंट का नाम संस्कृत भाषा में दर्ज कर दिया था।
छात्र ने सीबीएसई के निर्देशों के तहत चुनी थी भाषा
छात्र ने पंजाबी को अपनी तीसरी भाषा के रूप में चुना था। लेकिन स्कूल में इस भाषा की टीचर नहीं होने पर संस्कृत भाषा में उसका नाम लिख दिया और अब उसे परीक्षा देने को कहा जा रहा था। इसके खिलाफ छात्र ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दाखिल की। याचिका में कहा गया कि पंजाबी का विकल्प राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020 और CBSE के दिशा-निर्देशों के तहत उपलब्ध है। ऐसे में छात्र अपनी पसंद की भाषा पढ़ना चाहता था।
राहत के लिए छात्र से खटखटाया कोर्ट का दरवाजा
क्या टीचर की कमी के चलते दूसरी भाषा दे सकता है स्कूल?
अब अदालत के सामने मुख्य सवाल यह है कि छात्र ने जिस भाषा को तीसरी भाषा के तौर पर चुना है, क्या स्कूल अपने यहां टीचर उपलब्ध नहीं होने के आधार पर उसकी जगह कोई दूसरी भाषा दे सकता है।