छात्र की चुनी हुई भाषा की टीचर नहीं थी तो स्कूल ने संस्कृत भाषा में लिख दिया नाम, हाईकोर्ट पहुंचा मामला

स्कूल में एक छात्र ने तीसरी भाषा के तौर पर पंजाबी भाषा चुनी थी। लेकिन स्कूल में उस भाषा की टीचर नहीं होने पर उसका नाम संस्कृत भाषा में दर्ज कर दिया गया। हाई कोर्ट ने फिलहाल स्टूडेंट को राहत देते हुए अगली सुनवाई तक संस्कृत की परीक्षा में शामिल होने से छूट दे दी है।

अपडेटेड Sep 22, 2026 पर 12:32 PM
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छात्र ने इस मामले में राहत के लिए दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया।

दिल्ली के एक स्कूल में तीसरी भाषा को लेकर छात्र और स्कूल के बीच विवाद खड़ा हो गया है। छात्र ने तीसरी भाषा के तौर पर पंजाबी भाषा चुनी थी। लेकिन स्कूल में पंजाबी भाषा पढ़ाने के लिए योग्य टीचर उपलब्ध नहीं होने पर छात्र का नाम संस्कृत भाषा में दर्ज कर दिया। इसके बाद स्कूल ने उसे संस्कृत की परीक्षा देने के लिए कहा जा रहा था। छात्र ने इस मामले में राहत के लिए दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया। हाई कोर्ट ने फिलहाल स्टूडेंट को राहत देते हुए अगली सुनवाई तक संस्कृत की परीक्षा में शामिल होने से छूट दे दी है।

दिल्ली हाई कोर्ट ने तीसरी भाषा के तौर पर पंजाबी चुनने वाले छात्र के मामले में दखल दिया है। नवभारत टाइम्स में छपी खबर के मुताबिक, जस्टिस जसमीत सिंह ने 17 सितंबर के आदेश में कहा कि मामले की सुनवाई लंबित रहने के दौरान छात्र को संस्कृत की परीक्षा देने की जरूरत नहीं होगी। स्कूल ने पंजाबी पढ़ाने के लिए योग्य टीचर उपलब्ध नहीं होने का हवाला देकर स्टूडेंट का नाम संस्कृत भाषा में दर्ज कर दिया था।

छात्र ने सीबीएसई के निर्देशों के तहत चुनी थी भाषा

छात्र ने पंजाबी को अपनी तीसरी भाषा के रूप में चुना था। लेकिन स्कूल में इस भाषा की टीचर नहीं होने पर संस्कृत भाषा में उसका नाम लिख दिया और अब उसे परीक्षा देने को कहा जा रहा था। इसके खिलाफ छात्र ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दाखिल की। याचिका में कहा गया कि पंजाबी का विकल्प राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020 और CBSE के दिशा-निर्देशों के तहत उपलब्ध है। ऐसे में छात्र अपनी पसंद की भाषा पढ़ना चाहता था।

राहत के लिए छात्र से खटखटाया कोर्ट का दरवाजा

छात्र ने तीसरी भाषा के तौर पर पंजाबी भाषा चुनी थी। लेकिन स्कूल प्रशासन ने बताया कि उसके पास पंजाबी भाषा पढ़ाने वाला योग्य टीचर उपलब्ध नहीं है। इसके बाद स्कूल ने छात्र की तीसरी भाषा पंजाबी के बजाय संस्कृत दर्ज कर दी। छात्र ने इस फैसले को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट से तत्काल राहत मांगी। उसने कहा कि जिस विषय को उसने चुना नहीं, उसकी परीक्षा देने के लिए उसे मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। मामले की तात्कालिकता को देखते हुए छात्र ने अंतरिम आवेदन भी दाखिल किया गया। कोर्ट ने फिलहाल परीक्षा को लेकर छात्र के हित में अंतरिम व्यवस्था कर दी। कोर्ट ने संस्कृत एग्जाम से छूट देते हुए साफ किया कि यह व्यवस्था मामले के अंतिम फैसले के अधीन रहेगी। अब 28 सितंबर को मेन याचिका पर सुनवाई होगी।


क्या टीचर की कमी के चलते दूसरी भाषा दे सकता है स्कूल?

अब अदालत के सामने मुख्य सवाल यह है कि छात्र ने जिस भाषा को तीसरी भाषा के तौर पर चुना है, क्या स्कूल अपने यहां टीचर उपलब्ध नहीं होने के आधार पर उसकी जगह कोई दूसरी भाषा दे सकता है।

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