Shaksgam Valley: भारत ने मंगलवार (13 जनवरी) को शक्सगाम घाटी पर चीन के नए दावों को खारिज कर दिया। आर्मी चीफ जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने पाकिस्तान और चीन के बीच 1963 के सीमा समझौते को गैर-कानूनी बताया। उन्होंने दोहराया कि नई दिल्ली इस क्षेत्र में की गई किसी भी गतिविधि को मान्यता नहीं देता है। इस मुद्दे पर बोलते हुए जनरल द्विवेदी ने मंगलवार को कहा कि भारत 1963 के समझौते को अमान्य मानता है। इसके तहत पाकिस्तान ने शक्सगाम घाटी में कुछ इलाका चीन को दे दिया था।
पाकिस्तान ने 1963 में अवैध रूप से कब्जाए गए भारतीय क्षेत्र में से शक्सगाम घाटी के 5,180 वर्ग किलोमीटर हिस्से को चीन को सौंप दिया था। इसे लेकर भारत की आपत्तियों के बीच चीन ने सोमवार (12 जनवरी) को शक्सगाम घाटी पर अपने क्षेत्रीय दावों को फिर से दोहराया। चीन ने कहा कि इस इलाके में उसके इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट पूरी तरह से वैध हैं।
भारत ने पिछले शुक्रवार को शक्सगाम घाटी में चीन के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की आलोचना करते हुए कहा था कि यह भारतीय क्षेत्र है। नई दिल्ली ने कहा कि भारत को अपने हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाने का अधिकार है। इस बीच आर्मी चीफ ने मंगलवार को कहा, "हम वहां किसी भी गतिविधि को स्वीकार नहीं करते हैं। जहां तक चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर की बात है। हम इसे स्वीकार नहीं करते हैं। इसे दोनों देशों द्वारा किया जा रहा एक गैर-कानूनी काम मानते हैं।"
उनकी यह टिप्पणी सोमवार को चीन द्वारा जम्मू और कश्मीर की शक्सगाम घाटी पर अपने क्षेत्रीय दावों की पुष्टि करने और उस क्षेत्र में अपने इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स का बचाव करने के बाद आई है। भारत की आपत्तियों पर जवाब देते हुए चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने कहा, "सबसे पहले तो जिस क्षेत्र का आप उल्लेख कर रहे हैं, वह चीन का हिस्सा है।"
उन्होंने कहा, "अपने ही क्षेत्र में चीन की इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट गतिविधियां बिल्कुल उचित हैं।" माओ ने कहा कि चीन और पाकिस्तान ने 1960 के दशक में सीमा समझौता किया था। दोनों देशों के बीच सीमा तय की गई थी। उन्होंने कहा कि यह संप्रभु देशों के रूप में चीन और पाकिस्तान का अधिकार है।
चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) को लेकर भारत द्वारा आलोचना किए जाने पर माओ ने बीजिंग के पुराने रुख को दोहराते हुए कहा कि यह एक आर्थिक पहल है। इसका उद्देश्य स्थानीय आर्थिक एवं सामाजिक विकास करना और लोगों की जीवन में सुधार लाना है।
इससे विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा था, "शक्सगाम घाटी भारतीय क्षेत्र है। हमने 1963 में किए गए तथाकथित चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते को कभी मान्यता नहीं दी है। हम लगातार कहते आए हैं कि यह समझौता अवैध और अमान्य है।"
उन्होंने कहा, "हम तथाकथित चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) को भी मान्यता नहीं देते, क्योंकि यह भारतीय क्षेत्र से होकर गुजरता है, जिसपर पाकिस्तान का अवैध और जबरन कब्जा है।" जायसवाल ने कहा कि पूरा जम्मू कश्मीर और लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा हैं। उन्होंने कहा, "यह बात पाकिस्तानी और चीनी अधिकारियों को कई बार स्पष्ट रूप से बता दी गई है।"
कश्मीर मुद्दे पर चीन का रुख क्या है?
कश्मीर मुद्दे पर चीन का आधिकारिक रुख यह है कि जम्मू-कश्मीर विवाद लंबे समय से चला आ रहा है। इसे संयुक्त राष्ट्र चार्टर, सुरक्षा परिषद के संबंधित प्रस्तावों और द्विपक्षीय समझौतों के अनुसार उचित एवं शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाया जाना चाहिए। चीन इस रुख को दोहराता रहा है।
वर्ष 1963 में पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) के क्षेत्र को सौंपने का समझौता पाकिस्तान और चीन के लिए महत्वपूर्ण था, क्योंकि इसने उनके लिए एक साझा सीमा प्रदान की। अन्यथा उनकी कोई सीमा नहीं होती।
समझौते में एक खंड यह भी है कि पाकिस्तान और भारत के बीच कश्मीर मुद्दे के निपटारे के बाद संप्रभु प्राधिकरण औपचारिक सीमा संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए चीन सरकार के साथ बातचीत फिर से शुरू करेगा।