सुप्रीम कोर्ट में प्रशांत किशोर ने बिहार चुनाव को किया था चैलेंज, CJI सूर्यकांत ने पटना लौटाया

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को जन सुराज पार्टी की याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। प्रशांत किशोर की जनसुराज की दलीले सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को पटना हाईकोर्ट जाने को कहा। याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने पार्टी की हार पर कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि जनता ने पार्टी को नकार दिया है और अब पब्लिसिटी पाने के लिए इस अदालत का इस्तेमाल किया जा रहा है

अपडेटेड Feb 06, 2026 पर 6:31 PM
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प्रशांत किशोर की पार्टी की याचिका पर CJI की सख्त टिप्पणि

प्रशांत किशोर की जनसुराज को सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी फटकार लगाई है. प्रशांत किशोर की पार्टी जनसुराज कथित फ्रीबीज को लेकर बिहार चुनावों को रद्द करने की मांग के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी. सुप्रीम कोर्ट में आज यानी शुक्रवार को जन सूरज पार्टी की याचिका सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को जन सुराज की याचिका खारिज कर दी। इस याचिका में पिछले साल नवंबर में हुए बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों को चुनौती दी गई थी।

जानें क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने 

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को जन सुराज पार्टी की याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। प्रशांत किशोर की जनसुराज की दलीले सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को पटना हाईकोर्ट जाने को कहा। याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने पार्टी की हार पर कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि जनता ने पार्टी को नकार दिया है और अब पब्लिसिटी पाने के लिए इस अदालत का इस्तेमाल किया जा रहा है। वहीं जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने भी याचिका पर सवाल उठाए। उन्होंने जन सुराज के वकील से पूछा कि इस तरह के दावे सीधे सुप्रीम कोर्ट में कैसे किए जा सकते हैं। कोर्ट ने संविधान के आर्टिकल 32 के तहत मामले की सुनवाई करने से मना कर दिया और याचिकाकर्ता को सलाह दी कि वह इसके लिए बिहार हाई कोर्ट का रुख करे।


जन सुराज ने की थी ये बड़ी मांग

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ता की रिट पीटीशन में पूरे चुनाव को चुनौती देते हुए इसे रद्द करने के लिए व्यापक आदेश देने की मांग की गई है। कोर्ट ने कहा कि याचिका में हर कैंडिडेट के खिलाफ चुनाव प्रक्रिया में भ्रष्टाचार से संबंधित उचित आरोप होने चाहिए और इसका सही तरीका ये है कि हर निर्वाचन क्षेत्र को लेकर याचिकाएं दाखिल की जाएं। सीजेआई ने याचिकाकर्ता को फटकार लगाई और पूछा, 'आपकी पार्टी को कितने वोट मिले थे? अगर लोगों ने आपको रिजेक्ट कर दिया, तो आप पॉप्युलेरिटी बटौरने के लिए कोर्ट आ गए।' सीजेआई ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता को मुफ्त योजनाओं को चुनौती देनी चाहिए थी। इस पर याचिकाकर्ता ने कहा कि याचिका में मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना का मुद्दा उठाया गया है, उस पर विचार किया जा सकता है।

जन सुराज ने चुनाव नतीजों को रद्द करने की मांग की थी। पार्टी का आरोप था कि सत्ता में मौजूद जनता दल (यूनाइटेड) और भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन ने चुनाव आचार संहिता का बड़े पैमाने पर उल्लंघन किया। जन सुराज का कहना था कि चुनाव के दौरान राज्य सरकार ने हर परिवार की एक महिला को 10,000 रुपये देने का फैसला लिया, जिससे चुनाव की निष्पक्षता पर असर पड़ा। पार्टी के मुताबिक, जब आचार संहिता लागू थी, उसी दौरान यह फैसला किया गया। याचिका में दावा किया गया कि इस योजना का फायदा करीब 25 से 35 लाख महिला मतदाताओं को दिया गया। जन सुराज ने इसे सत्ताधारी गठबंधन का “भ्रष्ट आचरण” बताया।

ऐसा था बिहार चुनाव का नतीजा

इससे पहले प्रशांत किशोर ने भी आरोप लगाया था कि जेडीयू ने हर विधानसभा क्षेत्र में करोड़ों रुपये बांटे। उन्होंने कहा था कि अगर हालात सामान्य होते, तो पार्टी 25 से ज्यादा सीटें नहीं जीत पाती। बता दें कि साल 2025 में हुए बिहार चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) ने राज्य में सत्ता बरकरार रखी और कुल 243 सीट में से 202 सीट जीतीं जबकि विपक्षी गठबंधन ‘इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस’ (‘इंडिया’) को केवल 35 सीट मिलीं जिसमें कांग्रेस को मिली छह सीट शामिल हैं। विधानसभा चुनाव में जन सुराज पार्टी अपना खाता भी नहीं खोल पाई और उसके अधिकतर उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई।

प्रशांत किशोर ने किया था बड़ा दावा 

2025 के बिहार चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई। जेडीयू ने कुल 85 सीटें जीतीं, जो प्रशांत किशोर की भविष्यवाणी—दोनों से कहीं ज़्यादा थीं। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि चुनावों में मुफ्त योजनाओं का मामला पहले से ही एक अलग केस में उसके सामने है। कोर्ट ने पहले की सुनवाइयों में चेतावनी दी थी कि लगातार आर्थिक फायदे देने के वादे राज्यों को वित्तीय मुश्किलों में डाल सकते हैं। इसी वजह से इस मुद्दे को तीन जजों की बेंच को सौंप दिया गया है। शुक्रवार को कोर्ट ने साफ किया कि वह इस मामले की गंभीरता से जांच करेगा, लेकिन उन राजनीतिक दलों की याचिकाओं के बजाय ऐसे “जनहितैषी” लोगों की अर्ज़ियों को प्राथमिकता देगा, जिन्हें चुनाव में हार नहीं झेलनी पड़ी हो।

सुप्रीम कोर्ट ने दी चेतावनी 

पहले की सुनवाइयों में सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी थी कि चुनाव के दौरान पैसों से जुड़े फायदे देने के लगातार और आपसी मुकाबले वाले वादे राज्यों की आर्थिक स्थिति को खराब कर सकते हैं। इसी वजह से कोर्ट ने इस मुद्दे को तीन जजों की बेंच को सौंप दिया है। शुक्रवार को कोर्ट ने कहा कि वह इस मामले को गंभीरता से देखेगा, लेकिन उन राजनीतिक पार्टियों की याचिकाओं को प्राथमिकता नहीं देगा जिन्हें चुनाव में हार मिली है। इसके बजाय कोर्ट ऐसे “जनहितैषी” लोगों की याचिकाओं पर ज्यादा ध्यान देगा, जो सार्वजनिक हित के लिए यह मुद्दा उठा रहे हैं।

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