Tamil Nadu News: तमिलनाडु में सरकारी बोर्ड से पुजारियों की नियुक्ति से जुड़े विवाद पर केंद्र सरकार DMK सरकार पर निशाना साधा है। केंद्र ने बुधवार (8 फरवरी) को तमिलनाडु के उस कानून पर परोक्ष रूस से हमला किया, जो मंदिरों में 'अर्चकों' की नियुक्ति का कंट्रोल छीन लेगा। केंद्र ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले 'अर्चकों' की नियुक्ति को गलत तरीके से "सेक्युलर काम" बताया था, जबकि यह पूरी तरह से धार्मिक फैसला था।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पिछले कुछ दशकों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाए गए न्यायशास्त्र की समीक्षा की जोरदार वकालत की। SG ने कहा कि इसमें धर्म, आस्था और विश्वास से जुड़े मुद्दों की जटिलता पर विचार नहीं किया गया था। उन्होंने कहा कि पश्चिमी न्यायशास्त्र से बेवजह प्रभावित होने पर जोर दिया गया, जहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता सामाजिक विवेक और नैतिकता से ऊपर थी।
उनकी यह बात, आस्था से जुड़े मुद्दों में न्यायपालिका के दखल के दायरे पर केंद्र सरकार के रुख से मेल खाती है। लेकिन समय के कारण एक अलग पहलू भी ले लेती है। मेहता ने कहा कि तमिलनाडु कानून को बनाए रखकर, जिसने 'अर्चकों' की नियुक्ति का कंट्रोल छीन लिया और इसे सरकारी बोर्डों को दे दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य को किसी संप्रदाय या पंथ के धार्मिक मामलों में दखल देने की इजाजत दे दी, जो अपने मंदिरों में अपनी धार्मिक परंपराओं को बनाए रखते हैं। उन्होंने कहा, "अगर ऐसे कानून को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी मिल जाती है, तो शंकराचार्य को भी हटाया जा सकता है।" चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली नौ जजों की बेंच ने कहा, "इसका मतलब यह नहीं है कि 'अर्चक' कानून से ऊपर होंगे। उन्हें उनके गलत कामों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जाएगा।"
मेहता ने जवाब दिया कि जब तक कम्युनिटी मंदिर द्वारा 'अर्चकों' की नियुक्ति जाति-आधारित भेदभाव को रोकने वाले संवैधानिक नियमों का उल्लंघन नहीं है, तब तक कम्युनिटी को ही लोगों को ‘अर्चक’ नियुक्त करने का अधिकार होना चाहिए। अगर वे आगमों और रीति-रिवाजों के ज्ञान की योग्यता को पूरा करते हैं। उन्होंने आगे कहा, "सेक्युलरिज्म का असली मतलब है अलग-अलग पंथों के धार्मिक मामलों में सरकार का दखल न देना। हटाने या नियुक्ति के लिए सदियों से विकसित हुई योग्यता और अनुभव का पालन करना चाहिए।"
मेहता ने कहा कि सामाजिक और धार्मिक सुधार लेजिस्लेचर पर छोड़ देने चाहिए। बेंच ने पहली नजर में सहमति जताई कि शीर्ष अदालत को सामाजिक सुधारों या धर्म में सुधारों का अग्रदूत नहीं बनना चाहिए जो भक्तों की मूल आस्था और विश्वास को कमजोर करते हैं। बेंच ने कहा, "सुधारों के नाम पर धर्म को नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता।"
इस पर मेहता ने जोर देकर कहा कि कानून के जानकार जजों को धार्मिक मामलों में क्या महारत हासिल है कि वे यह तय करें कि कौन सा पंथ कौन सा है? ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती और निजामुद्दीन औलिया और शिरडी साईंबाबा की दरगाहों पर सभी पंथों, पंथों और धर्मों के भक्त आते हैं। क्या कोर्ट यह तय कर सकता है कि कौन सी दरगाह किस धर्म की है?
SG ने पूछा कि अगर अरबिंदो के मानने वाले खुद को एक अलग धार्मिक ग्रुप मानते हैं, तो क्या सुप्रीम कोर्ट कह सकता है कि वे नहीं हैं? जब जस्टिस बी वी नागरत्ना और जॉयमाल्या बागची ने उनके इस विचार पर सवाल उठाया, तो मेहता ने कहा कि अगर मानने वाले अरबिंदो को भगवान मानते हैं, तो क्या कोई दूसरा व्यक्ति इस पर बहस कर सकता है।
जब जस्टिस बागची ने कहा कि अरबिंदो की मूर्ति की पूजा नहीं होती, तो मेहता ने कहा कि आर्य समाज और ब्रह्म समाज में भी मूर्ति पूजा नहीं होती, फिर भी उन्हें अलग-अलग धार्मिक पंथ माना जाता है। जस्टिस बागची ने कहा कि दिलचस्प बात यह है कि SC ने ऑरोविले को धार्मिक संप्रदाय नहीं माना है।लेकिन आनंद मार्गियों को धार्मिक संप्रदाय माना है।