तृणमूल कांग्रेस (TMC) का संकट रविवार (14 जून) को उस वक्त और गहरा गया जब बागी सांसदों ने बेहद कम चर्चित नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय की घोषणा कर दी। इतना ही नहीं, लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मिलकर सदन में अलग बैठने की व्यवस्था का अनुरोध किया है। वहीं, तृणमूल कांग्रेस संसदीय दल के नेता अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा स्पीकर से आग्रह किया कि वह इस अलग हुए गुट को कोई मान्यता नहीं दें।
लोकसभा सदस्य सुदीप बंदोपाध्याय ने कहा कि बागी गुट असली तृणमूल कांग्रेस के तौर पर मान्यता पाने के लिए अदालत में भी लड़ाई लड़ेगा और पार्टी के चुनाव चिह्न पर अपना दावा पेश करेगा। लोकसभा स्पीकर से मुलाकात के बाद बागी सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों ने बिरला को सौंपे गए लेटर पर हस्ताक्षर किए हैं।
बागी गुट के अनुसार, लोकसभा स्पीकर ने उन 20 सांसदों के हस्ताक्षर की पुष्टि की जिन्होंने इस प्रस्ताव का समर्थन किया था। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले धड़े के दावों के बारे में पूछे जाने पर बंदोपाध्याय ने कहा कि असली तृणमूल कांग्रेस कौन है, इसका फैसला अदालतें करेंगी।
बागी सांसदों ने लोकसभा स्पीकर से मिलने से पहले केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव से उनके घर पर मुलाकात की। यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है, जब तृणमूल कांग्रेस नेता कीर्ति आजाद और सागरिका घोष ने भी रविवार को ओम बिरला से मुलाकात की।
उन्होंने तृणमूल कांग्रेस लोकसभा संसदीय दल के नेता अभिषेक बनर्जी द्वारा लिखा गया एक पत्र लोकसभा अध्यक्ष को सौंपा, जिसमें उनसे किसी भी कथित अलग गुट को मान्यता न देने का आग्रह किया गया है। इस पत्र में तर्क दिया गया है कि संविधान किसी मौजूदा राजनीतिक दल के भीतर एक अलग समूह बनाने की अनुमति नहीं देता है।
10 जून की तारीख वाले इस पत्र को पहले ईमेल के जरिए भी भेजा गया था, जिसमें कहा गया है कि दलबदल विरोधी कानून इस तरह के विभाजन की इजाजत नहीं देता। पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी ने अपने पत्र में अनुरोध किया है कि ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (एआईटीसी) को एक ही राजनीतिक पार्टी माना जाए जिसका प्रतिनिधित्व सदन में केवल उसके अधिकृत नेता और मुख्य सचेतक द्वारा किया जाए। उन्होंने यह भी आग्रह किया कि बागी सांसदों की ओर से किसी भी तरह के पत्राचार या अनुरोध पर कोई फैसला करने से पहले पार्टी को अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाए।
महाराष्ट्र के राजनीतिक संकट मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए बनर्जी ने तर्क दिया कि 10वीं अनुसूची के तहत अब विभाजन का बचाव उपलब्ध नहीं है। वर्तमान कानूनी ढांचा किसी एक राजनीतिक दल की पहचान को मान्यता देता है न कि उसके भीतर मौजूद विरोधी गुटों को अलग अलग मान्यता देता है।
बनर्जी ने यह भी कहा कि विलय के किसी भी दावे के लिए राजनीतिक पार्टी का विलय और दो-तिहाई विधायकों का समर्थन, दोनों जरूरी हैं और कानून के तहत इनमें से सिर्फ एक शर्त पूरी करना काफी नहीं होगा। लोकसभा स्पीकर से मुलाकात के बाद आजाद ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने यह साफ कर दिया है कि एक राजनीतिक पार्टी में विभाजन मंजूर नहीं है।
नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया यानी NCPI त्रिपुरा की एक कम प्रसिद्ध रजिस्टर्ड, लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त पार्टी है जिसकी कोई खास राजनीतिक मौजूदगी नहीं है। NCPI ने 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में कुछ सीटों पर चुनाव लड़ा था जिसमें इसके उम्मीदवार या तो नोटा से पीछे रहे या उन्हें उससे बस कुछ ही अधिक वोट मिले।
उपलब्ध चुनाव आयोग और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, NCPI को 20 जनवरी 2023 को एक Registered Unrecognised Political Party (RUPP) के रूप में रजिस्टर्ड किया गया था। पार्टी का रजिस्ट्रेशन एड्रेस पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले में बताया जाता है। लेकिन इसने अपनी शुरुआती चुनावी गतिविधियां मुख्य रूप से त्रिपुरा में की थीं। 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में पार्टी ने भाग लिया, लेकिन उसे कोई बड़ी चुनावी सफलता नहीं मिली। जून 2026 में पार्टी अचानक राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आई, जब तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों ने इसमें विलय की घोषणा की। इस घटनाक्रम से NCPI की संसदीय उपस्थिति काफी बढ़ गई।
सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रिपोर्टों में उत्तिया कुंडू (Uttiya Kundu) को पार्टी का अध्यक्ष बताया गया है। जबकि पार्टी की कोषाध्यक्ष (Treasurer) श्यूली कुंडू (Shewly Kundu) हैं। हालांकि विभिन्न मीडिया रिपोर्टों में पार्टी के वर्तमान नेतृत्व का उल्लेख मिलता है। लेकिन संस्थापक के रूप में किसी एक व्यक्ति का स्पष्ट और आधिकारिक उल्लेख सभी स्रोतों में उपलब्ध नहीं है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पार्टी के गठन और संचालन में कुंडू परिवार की प्रमुख भूमिका रही है।
NCPI खुद को राष्ट्रवादी और नागरिक-केंद्रित राजनीति से जोड़ती है। शुरुआती चरण में इसका प्रभाव मुख्य रूप से बंगाली भाषी क्षेत्रों और पूर्वोत्तर भारत के कुछ हिस्सों तक सीमित रहा। लेकिन 2026 में NDA को समर्थन देने की घोषणा के बाद इसकी राजनीतिक पहचान और चर्चा बढ़ी है।