Maharani Kamsundari Devi: दरभंगा राजघराने की अंतिम महारानी, भारत-चीन जंग के दौरान दान कर दिया था 600 Kg सोना; दुनिया को कह गई अलविदा

Maharani Kamsundari Devi: राजघराने से होने के बावजूद महारानी कामसुंदरी देवी ने अपने जीवन में सादगी और संयम कभी नहीं छोड़ा। उन्हें उनके त्याग, दान, जिम्मेदारी, नेतृत्व और मौन राष्ट्रभक्ति के लिए भी जाना जाता है। वह दरभंगा के अंतिम शासक महाराज कामेश्वर सिंह की तीसरी पत्नी थीं

अपडेटेड Jan 15, 2026 पर 11:33 AM
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कामसुंदरी देवी पिछले 6 महीनों से अस्वस्थ थीं और दरभंगा स्थित कल्याणी निवास में उन्होंने अंतिम सांस ली।

महारानी कामसुंदरी देवी... एक ऐसी शख्सियत, जिन्हें सत्ता के प्रदर्शन से नहीं, बल्कि कर्तव्य की मौन शक्ति के लिए जाना जाता है। वह महिला जो बिहार के दरभंगा राजघराने की अंतिम महारानी थी और अब इस दुनिया से विदा ले चुकी है। 12 जनवरी 2026 को 96 वर्ष की आयु में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके जाने के साथ ही मिथिला की शाही परंपरा का अंतिम जीवंत अध्याय भी इतिहास बन गया। कामसुंदरी देवी पिछले 6 महीनों से अस्वस्थ थीं और दरभंगा स्थित कल्याणी निवास में उन्होंने अंतिम सांस ली।

महारानी कामसुंदरी देवी का जन्म बिहार के मधुबनी जिले के मंगरौनी में 22 अक्टूबर 1932 को हुआ था। वह दरभंगा के अंतिम शासक महाराज कामेश्वर सिंह की तीसरी पत्नी थीं। महाराज कामेश्वर सिंह की शादी 1940 में हुई थी। उनकी कोई संतान नहीं थी। महाराज की पहली दो महारानियां- राजलक्ष्मी देवी और कामेश्वरी प्रिया देवी भी इस संसार से जा चुकी हैं।

8 की उम्र में शादी, 64 साल तक विधवा


महारानी कामसुंदरी देवी की शादी 8 साल की उम्र में ही हो गई थी। उनके मायके का नाम कल्याणी था। कामसुंदरी नाम उन्हें दरभंगा राजपरिवार ने दिया था। महाराज कामेश्वर सिंह का निधन 1962 में हुआ। महारानी कामेश्वरी प्रिया देवी का 1940 में और महारानी राजलक्ष्मी देवी का निधन 1976 में हुआ था। महारानी कामसुंदरी देवी ने 64 साल विधवा जीवन बिताया।

भारत-चीन जंग के दौरान दान किया 600 किलो सोना

महारानी कामसुंदरी देवी का व्यक्तित्व केवल एक महारानी तक ही सीमित नहीं था। उन्हें उनके त्याग, दान, जिम्मेदारी, नेतृत्व और मौन राष्ट्रभक्ति के लिए भी जाना जाता है। उन्होंने मिथिला की शिक्षा, दान और लोककल्याण को राजधर्म मानने वाली गौरवशाली संस्कृति को आगे बढ़ाया। 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान दरभंगा राजघराने ने जो किया, वह भारत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। उस वक्त जब देश में संसाधनों की भारी कमी थी, राष्ट्रीय संकट आन खड़ा हुआ था, उस वक्त दरभंगा राज की ओर से भारत सरकार को 600 किलोग्राम सोना दान किया। यह देश के लिए केवल आर्थिक मदद नहीं थी, बल्कि नैतिक संबल भी था। इतना ही नहीं राजघराने ने अपने 3 प्राइवेट प्लेन और 90 एकड़ में फैला प्राइवेट एयरपोर्ट भी राष्ट्र को सौंप दिए थे। इसी जमीन पर आज दरभंगा एयरपोर्ट है।

अपने महाराज की याद में शुरू की कल्याणी फाउंडेशन

महाराज के निधन के बाद कामसुंदरी देवी ने उनकी स्मृति में ‘कल्याणी फाउंडेशन’ की शुरुआत की थी। इस फाउंडेशन के माध्यम से उन्होंने महाराज के नाम पर एक लाइब्रेरी भी शुरू कराई, जिसमें 15,000 से अधिक किताबें हैं। राजघराने से होने के बावजूद महारानी कामसुंदरी देवी ने अपने जीवन में सादगी और संयम कभी नहीं छोड़ा। महाराजा कामेश्वर सिंह की मृत्यु के बाद उन्होंने संपत्ति और ट्रस्ट से जुड़े कई कानूनी विवादों का सामना किया।

महारानी कामसुंदरी देवी का व्यक्तित्व वैभव और ऐश्वर्य के बीच रहते हुए भी अत्यंत सरल, संयमी और संवेदनशील रहा। उनका सारा जीवन मौन, साधना, त्याग, अनुशासन और मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा के लिए समर्पित रहा। इतिहासकारों का कहना है कि दरभंगा राज सिर्फ एक सामंती जागीर से कहीं ज्यादा था। यह एक प्रमुख संस्था के रूप में काम करता था, जिसने पीढ़ियों तक बिहार के शैक्षणिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक जीवन को प्रभावित किया। ललित नारायण मिथिला यूनिवर्सिटी रॉयल कॉम्प्लेक्स के अंदर है।

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इसके अलावा दरभंगा राजघराने ने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी, कलकत्ता यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और पटना यूनिवर्सिटी जैसे संस्थानों को भी वित्तीय मदद दी। दरभंगा मेडिकल कॉलेज भी इसकी खास विरासतों में से एक है। इस घराने ने सकरी, लोहाट, रायम और हसनपुर में चीनी मिलों, पंडौल में एक स्पिनिंग मिल, हयाघाट में अशोक पेपर मिल और समस्तीपुर में रामेश्वर जूट मिल की स्थापना में मदद की। राजघराने ने नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक डॉ. सीवी रमन को उनकी रिसर्च के लिए एक बहुमूल्य हीरा भी दिया था।

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