EXPLAINER: गलवान के 6 साल बाद फिर खुलेगा नाथू ला दर्रा, भारत-चीन की कूटनीति में क्यों बेहद खास है 'सिल्क रूट' की यह खिड़की?

Why Nathu La Matters India China Relations: 1962 के युद्ध ने इस सदियों पुरानी व्यापारिक डोर को एक झटके में काट दिया और नाथू ला अगले 44 सालों के लिए पूरी तरह सील हो गया। वैसे युद्ध के बाद भले ही व्यापार और बंदूकें खामोश हो गईं, पर कूटनीतिक धागा नहीं टूटा। हर गुरुवार की सुबह 14,000 फीट की बर्फीली हवाओं के बीच एक भारतीय डाकिया कटीले तारों तक जाता और चीनी डाकिये से डाक का थैला बदलता

अपडेटेड Jul 28, 2026 पर 1:44 PM
20वीं सदी की शुरुआत में भारत-चीन के कुल जमीनी व्यापार का करीब 80 फीसदी हिस्सा इसी दर्रे के जरिए गुजरता था

India China Nathu La Trade Explainer: भारत और चीन के रिश्तों का मिजाज समझना हो, तो हिमालय की 14,000 फीट की ऊंचाई पर जमे बर्फ से ढके नाथू ला दर्रे की ओर रुख करना काफी होगा। गलवान घाटी के खूनी संघर्ष और कोविड-19 की मार के चलते पिछले 6 वर्षों से ठप पड़ा सीमा व्यापार 1 अगस्त 2026 से एक बार फिर पटरी पर लौटने जा रहा है।

अगस्त 2025 में दोनों देशों के बीच सिक्किम के नाथू ला, हिमाचल के शिपकी ला और उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे से व्यापार बहाली पर सहमति बनी थी। उसी कड़ी में अब नाथू ला के कपाट भी फिर से खोले जा रहे हैं।

सालाना कई अरब डॉलर के भारत-चीन व्यापार के समुद्री कारोबार के आगे नाथू ला से होने वाली खरीद-फरोख्त भले ही ऊंट के मुंह में जीरा लगे, लेकिन भू-राजनीतिक बिसात पर इसका रणनीतिक और कूटनीतिक वजन कहीं ज्यादा है। आइए आपको बताते हैं कि आखिर क्यों नाथू ला सिर्फ एक ट्रेड रूट नहीं, बल्कि दोनों देशों के रिश्तों का असली थर्मामीटर है?


जब डाक के थैलों से बची रही रिश्तों की सांस

ऐतिहासिक सिल्क रूट की एक अहम कड़ी रहा नाथू ला प्राचीन काल से ही तिब्बत की चुम्बी घाटी को सिक्किम के गंगटोक, कालिम्पोंग और कोलकाता के बंदरगाहों से जोड़ता आया है। 20वीं सदी की शुरुआत में भारत-चीन के कुल जमीनी व्यापार का करीब 80 फीसदी हिस्सा इसी दर्रे के जरिए गुजरता था। 1962 के युद्ध ने इस सदियों पुरानी व्यापारिक डोर को एक झटके में काट दिया और नाथू ला अगले 44 सालों के लिए पूरी तरह सील हो गया।

वैसे युद्ध के बाद भले ही व्यापार और बंदूकें खामोश हो गईं, पर कूटनीतिक धागा नहीं टूटा। हर गुरुवार की सुबह 14,000 फीट की बर्फीली हवाओं के बीच एक भारतीय डाकिया कटीले तारों तक जाता और चीनी डाकिये से डाक का थैला बदलता। बिना एक-दूसरे की बोली समझे, महज 3 मिनट में अंजाम दी जाने वाली यह मूक रस्म दशकों तक दोनों देशों के बीच संपर्क का अकेला जीवित जरिया बनी रही।

2006 का री-ओपनिंग मॉडल: नई सदी में पुराने जमाने का सौदा

साल 2003 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की ऐतिहासिक बीजिंग यात्रा के बाद बनी सहमति के आधार पर 6 जुलाई 2006 को नाथू ला को व्यापार के लिए दोबारा खोला गया। उसकी तस्वीरें भले ही भव्य थीं, लेकिन जिस व्यापार की इजाजत दी गई, वह गुजरे जमाने की याद दिलाता था:

चीन की ओर से भारत आने वाली चीजें (15 प्रोडक्ट्स): याक की पूंछ, बकरी-भेड़ की खाल, कच्चा रेशम, ऊन, बोरेक्स, नमक और घोड़े।

भारत से जाने वाला सामान (29 प्रोडक्ट्स): चावल, आटा, चाय, तंबाकू, कंबल और तांबे के बर्तन।

दौर बदल चुका था, लेकिन सामान की लिस्ट 19वीं सदी वाली ही रही। नतीजतन, नाथू ला कभी कोई बड़ा आर्थिक कॉरिडोर नहीं बन सका और सीमित दायरे में ही सिमटकर रह गया।

अरबों डॉलर के कारोबार के आगे कितना बड़ा है नाथू ला?

अगर आप आंकड़ों के चश्मे से देखेंगे, तो नाथू ला का व्यापार दोनों देशों की अर्थव्यवस्था के लिए शून्य नजर आएगा:

2016 (पीक टाइम): कुल व्यापार रिकॉर्ड ₹82.68 करोड़ तक पहुंचा।

2017 (डोकलाम विवाद): तनातनी का असर सीधा दिखा और व्यापार सिमटकर महज ₹8.86 करोड़ रह गया।

2019 (आखिरी सीजन): महामारी से ठीक पहले यहां ₹43.51 करोड़ की आवाजाही दर्ज हुई।

व्यापारिक घाटे की कड़वी हकीकत

वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का चीन के साथ कुल माल व्यापार $151.1 अरब रहा, जिसमें भारत का व्यापार घाटा $100 अरब के पार चला गया। ऐसे में नाथू ला के कुछ करोड़ का कारोबार इस विशाल खाई को नहीं पाट सकता। हां, सिक्किम के उन 600 से अधिक स्थानीय लाइसेंसधारी व्यापारियों और ट्रांसपोर्टरों के लिए यह रोजी-रोटी का मुख्य जरिया जरूर है, जिनका सामान 2020 में अचानक सीमा बंद होने से वहीं फंसा रह गया था।

बॉडर ट्रेड से परे क्यों यह 'डिप्लोमैटिक इंडिकेटर' है?

कूटनीतिक विश्लेषकों की मानें तो नाथू ला में माल का आना-जाना उतना मायने नहीं रखता, जितना कि गेट का खुलना और बंद होना। नाथू ला का हालिया इतिहास बताता है कि जब-जब दिल्ली और बीजिंग की दूरी घटी है, यह गेट खुला है और जब भी सरहद पर गोलियों या डंडों की गूंज हुई, ताला सबसे पहले इसी दरवाजे पर लगा।

2020 के गलवान हादसे के बाद रिश्ते सबसे गहरे अविश्वास के दौर में पहुंच गए थे। अब सीधी उड़ानों, वीजा, मानसरोवर यात्रा और नाथू ला व्यापार की एक साथ बहाली इस बात का साफ इशारा है कि दोनों मुल्क अब तनाव को नियंत्रण में रखकर रिश्तों को 'न्यू नॉर्मल' की तरफ ले जाना चाहते हैं।

1 अगस्त से नाथू ला का खुल जाना न तो रातों-रात सीमा विवाद सुलझाएगा और न ही चीनी सामान की निर्भरता को खत्म करेगा। लेकिन, वैश्विक भू-राजनीति के इस दौर में यह बहाली दर्शाती है कि दोनों परमाणु संपन्न पड़ोसी संवाद और सह अस्तित्व की टेबल पर बने रहने के इच्छुक हैं। इस बर्फीले दर्रे पर व्यापार की आहट, कूटनीति के मोर्चे पर एक पॉजिटिव संकेत है।

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