Parenting Tips: इस्लाम में बच्चों की पैरेंटिंग के लिए 7-7-7 का रूल अपनाते हैं, क्या इस थ्योरी के बारे में जानते हैं आप?

The 7-7-7 Rule of Parenting बच्चों की परवरिश का एक आसान और प्रभावी तरीका माना जाता है, जिसे कई लोग काफी उपयोगी समझते हैं। इस पेरेंटिंग मॉडल में बच्चों के विकास को अलग-अलग चरणों में बांटा जाता है, जिससे उन्हें सही दिशा, बेहतर समझ और मजबूत व्यक्तित्व बनाने में मदद मिलती है

अपडेटेड May 18, 2026 पर 1:56 PM
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The 7-7-7 Rule of Parenting: हर बच्चा अलग होता है और हर उम्र की जरूरतें भी अलग होती हैं।

बच्चों की परवरिश हर परिवार के लिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी मानी जाती है, क्योंकि बच्चा ही आगे चलकर समाज और परिवार का भविष्य बनता है। सही दिशा, अच्छे संस्कार और प्यार भरी देखभाल ही उसे एक अच्छा इंसान बनाती है। इसी को ध्यान में रखते हुए इस्लामी शिक्षाओं में हजरत अली  से जुड़ी 7-7-7 पैरेंटिंग थ्योरी को एक सरल और प्रभावी तरीका माना जाता है। यह तरीका बच्चों की पूरी परवरिश को तीन अलग-अलग 7-7 साल के चरणों में बांटकर समझाता है कि किस उम्र में माता-पिता की भूमिका कैसी होनी चाहिए।

पहले 7 साल

0 से 7 साल की उम्र बच्चों के दिमागी और भावनात्मक विकास के लिए सबसे खास मानी जाती है। इस दौरान बच्चे किताबों से कम और खेल, कहानियों व आसपास के माहौल से ज्यादा सीखते हैं।


इस उम्र में माता-पिता को बच्चों के साथ ज्यादा समय बिताना चाहिए। उनके साथ खेलना, बातें करना और नई चीजें सिखाना बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ाता है। जब बच्चा प्यार और सुरक्षा महसूस करता है, तो उसकी सीखने की क्षमता भी मजबूत होती है।

7 से 14 साल

इस उम्र में बच्चे धीरे-धीरे समझदार बनने लगते हैं। यही समय होता है जब उन्हें लाइफ स्किल्स, अनुशासन और अच्छे व्यवहार की सीख दी जा सकती है।

माता-पिता इस दौर में बच्चों को जिम्मेदारी, दोस्ती और समाज में रहने के तरीके सिखा सकते हैं। स्कूल एक्टिविटीज और बच्चों की रुचियों को समझना भी इस समय बेहद जरूरी माना जाता है। इससे बच्चों का कॉन्फिडेंस बढ़ता है और वे बेहतर तरीके से खुद को पहचानने लगते हैं।

14 से 21 साल

टीनएज और यंग एडल्ट उम्र में बच्चे अपने फैसले खुद लेना शुरू कर देते हैं। ऐसे में पैरेंट्स को सख्त कंट्रोलर नहीं, बल्कि एक अच्छे गाइड की भूमिका निभानी चाहिए।

इस दौरान बच्चों की बातें सुनना, उन्हें समझना और सही सलाह देना जरूरी होता है। उन्हें थोड़ी आजादी देने से उनमें आत्मविश्वास और जिम्मेदारी की भावना विकसित होती है। यही वे समय है जब माता-पिता और बच्चों के बीच भरोसा सबसे ज्यादा मायने रखता है।

क्यों खास माना जाता है यह रूल?

7-7-7 रूल पैरेंट्स को यह समझने में मदद करता है कि किस उम्र में बच्चों को किस तरह के सपोर्ट की जरूरत होती है। इससे बच्चों का मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक विकास बेहतर तरीके से हो पाता है।

ये तरीका पैरेंटिंग को कम तनावभरा बनाता है और बच्चों को धीरे-धीरे आत्मनिर्भर बनने में मदद करता है।

बदलती उम्र के साथ बदलनी चाहिए पैरेंटिंग

हर बच्चा अलग होता है और हर उम्र की जरूरतें भी अलग होती हैं। यही वजह है कि एक ही तरीका हर समय काम नहीं करता। 7-7-7 रूल यही सिखाता है कि जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, वैसे-वैसे पैरेंटिंग का तरीका भी बदलना चाहिए।

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