रिश्ते में प्यार के नाम पर खुद को तो नहीं खो रहे? अंकुर वारिकू की 'फोन-चार्जर' वाली बात समझें
अंकुर वारिकू ने रिश्तों को समझाने के लिए फोन चार्जर की एक दिलचस्प मिसाल दी है। उनका कहना है कि जिस तरह हम किसी दूसरे का फोन चार्ज करने के चक्कर में अपनी बैटरी खत्म कर सकते हैं, वैसे ही रिश्तों में भी दूसरों को खुश रखने के लिए खुद को नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन क्या यह सही है?
वारिकू की इस पूरी बात का संदेश काफी सीधा है, दूसरों की मदद करना अच्छी बात है
कभी-कभी रिश्तों की सबसे बड़ी सच्चाई किसी भारी-भरकम सलाह में नहीं, बल्कि रोजमर्रा की एक छोटी-सी चीज में छिपी होती है। मोटिवेशनल स्पीकर अंकुर वारिकू ने फोन चार्जर की एक बेहद आसान मिसाल के जरिए ऐसी ही बात समझाने की कोशिश की है। सोचिए, कोई अपना फोन चार्ज करने के लिए आपसे बार-बार चार्जर मांगता है और आप हर बार उसकी मदद करते रहते हैं। धीरे-धीरे उसका फोन 100 प्रतिशत हो जाता है, लेकिन इसी दौरान आपकी अपनी बैटरी खत्म होने लगती है।
यही स्थिति कई बार रिश्तों में भी बन जाती है, जहां हम सामने वाले की जरूरतों, भावनाओं और परेशानियों को लगातार प्राथमिकता देते रहते हैं, जबकि खुद को समय देना भूल जाते हैं। वारिकू की यह मिसाल सवाल उठाती है कि क्या दूसरों का ख्याल रखते-रखते हम अपनी जरूरतों और खुशियों को नजरअंदाज तो नहीं कर रहे?
किसी ने मांगा चार्जर, आपने तुरंत दे दिया
कल्पना कीजिए कि आपका कोई करीबी आपके पास आता है और कहता है कि उसके फोन की बैटरी खत्म होने वाली है। वह आपसे चार्जर मांगता है। आप बिना ज्यादा सोचे अपना चार्जर उसे दे देते हैं। उसका फोन चार्ज होना शुरू हो जाता है और आपको लगता है कि आपने उसकी मदद कर दी। यहां तक सबकुछ बिल्कुल सामान्य है। लेकिन इसी बीच आपकी अपनी ‘बैटरी’ खत्म हो रही है
अब कहानी का असली हिस्सा शुरू होता है।
जिस व्यक्ति को आपने चार्जर दिया है, उसका फोन धीरे-धीरे चार्ज हो रहा है। दूसरी तरफ आपका अपना फोन बैटरी खोता जा रहा है। आपको पता है कि आपकी भी जरूरत है, लेकिन फिर भी आप अपना चार्जर वापस नहीं लेते। आप सामने वाले की जरूरत को अपनी जरूरत से ऊपर रखते रहते हैं।
सामने वाले का फोन 100%, आपका लगभग बंद कुछ देर बाद उस व्यक्ति का फोन पूरी तरह चार्ज हो जाता है। वह आपका चार्जर वापस करता है और चला जाता है। लेकिन तब तक आपकी बैटरी लगभग खत्म हो चुकी होती है। वारिकू की इस मिसाल का इशारा उन रिश्तों की तरफ है, जहां हम किसी दूसरे व्यक्ति को लगातार अपना समय, ध्यान और भावनात्मक ऊर्जा देते रहते हैं, लेकिन खुद को ‘रीचार्ज’ करने के लिए वक्त नहीं निकालते।
जरूरत पड़ते ही फिर याद आता है आपका चार्जर
अब मान लीजिए वही व्यक्ति कुछ समय बाद फिर आपके पास आता है। इस बार उसके फोन में सिर्फ 2 प्रतिशत बैटरी बची है और उसे दोबारा आपके चार्जर की जरूरत है। आप फिर अपना चार्जर उसके हाथ में दे देते हैं। सुनने में यह स्थिति अजीब लगती है। लेकिन वारिकू का सवाल यही है कि फोन के मामले में जो व्यवहार हमें गलत लगता है, वही हम कई बार अपने रिश्तों में बिना महसूस किए दोहराते रहते हैं।
क्या आप भी हमेशा दूसरों को खुद से पहले रखते हैं?
कई लोग अपने पार्टनर, परिवार या दोस्तों की जरूरतों को पूरा करने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि अपनी जरूरतों को लगातार टालते रहते हैं। किसी को आपकी मदद चाहिए, आप मौजूद हैं। किसी को बात करनी है, आप अपना समय निकाल लेते हैं। किसी को भावनात्मक सहारे की जरूरत है, आप फिर सामने खड़े होते हैं। लेकिन जब आपको खुद आराम, अकेलेपन या मानसिक सुकून की जरूरत होती है, तब शायद आप अपने लिए वही जगह नहीं बना पाते।
खुद को ‘फॉर ग्रांटेड’ लेना बंद करना जरूरी
वारिकू की इस पूरी बात का संदेश काफी सीधा है, दूसरों की मदद करना अच्छी बात है, लेकिन इसकी कीमत खुद को खत्म करके नहीं चुकानी चाहिए। हर रिश्ते में देना और साथ निभाना जरूरी है, लेकिन अगर हमेशा सिर्फ एक ही व्यक्ति देता रहे और दूसरा केवल लेता रहे, तो रिश्ता धीरे-धीरे थकाने वाला बन सकता है।
अपनी बैटरी भी चार्ज करते रहिए
हम दूसरों के फोन की बैटरी बचाने में इतने व्यस्त न हो जाएं कि अपना फोन ही बंद हो जाए। खुद के लिए समय निकालना, आराम करना, अपनी पसंद की चीजें करना और अपनी भावनाओं को समझना स्वार्थ नहीं है। यह जरूरी है। क्योंकि जब आपकी अपनी ‘बैटरी’ पूरी तरह खत्म हो जाएगी, तब आप किसी और के लिए भी वैसे मौजूद नहीं रह पाएंगे जैसे रहना चाहते हैं। दूसरों के लिए उपलब्ध रहिए, लेकिन खुद से अनुपलब्ध मत हो जाइए।