बच्चों को अच्छी पढ़ाई और संस्कार देना जरूरी है, लेकिन इसके साथ उन्हें जिंदगी के उतार-चढ़ाव के लिए तैयार करना भी उतना ही जरूरी है। हर बच्चे को कभी न कभी हार, डर, गुस्सा, रिजेक्शन का सामना करना पड़ता है। यदि वह ऐसे समय में अपने इमोशन को समझकर खुद पर भरोसा रखना सीख जाए, तो छोटी-बड़ी परेशानियां उसे आसानी से हरा नहीं पाएंगी।
बच्चों को यह सोच सिखाने में भगवद गीता की कई सीखें माता-पिता के लिए इंस्पिरेशन बन सकती हैं। गीता भले ही पेरेंटिंग की किताब न हो, लेकिन इसमें धैर्य, कर्म, कॉन्फिडेंस और मुश्किल समय में खुद को संभालने से जुड़ी कई बातें हैं। इन्हें रोज की परवरिश में अपनाकर माता-पिता बच्चों को मुश्किलों से भागने के बजाय उनका सामना करना सिखा सकते हैं।
1. गलतियों से सीखना सिखाएं
बच्चों से गलती होना या किसी काम में हार जाना बिल्कुल सामान्य है। एग्जाम में कम नंबर आना, कोई गेम हारना या मनचाहा मौका न मिलना उन्हें बहुत बड़ा झटका लग सकता है। ऐसे समय में उन्हें डांटने या तुरंत परेशानी ठीक करने के बजाय पहले उनकी बात समझें और पूछें कि इस एक्सपीरियंस से वे क्या सीख सकते हैं।
2. इमोशन पर काबू करना सिखाएं
इमोशनली मजबूत होने का मतलब यह नहीं है कि बच्चा कभी रोए नहीं, उसे डर न लगे या वह गुस्सा न करे। बच्चों को अपनी फीलिंग खुलकर महसूस करने दें, लेकिन साथ ही यह भी सिखाएं कि गुस्से या दुख में बिना सोचे कोई गलत कदम नहीं उठाना है। जैसे बच्चा किसी बात से नाराज है, तो वह अपनी बात बता सकता है, लेकिन किसी को चोट पहुंचाना सही नहीं है।
3. गुस्से को संभालना सिखाएं
कई बार बच्चे को गुस्सा, डर, शर्म या उदासी इतनी ज्यादा महसूस होती है कि उसे लगता है कि यह परेशानी हमेशा रहेगी। ऐसे समय में माता-पिता उसे प्यार से समझा सकते हैं कि कोई भी भावना हमेशा एक जैसी नहीं रहती। जैसे कहें, तुम्हें अभी गुस्सा आ रहा है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि तुम हमेशा गुस्सैल हो। इससे बच्चा धीरे-धीरे इमोशन को संभालना सीख सकेगा।
बच्चों को हर चीज का नतीजा अपने हिसाब से नहीं मिल सकता। वे मेहनत कर सकते हैं, लेकिन फिर भी एग्जाम में मनचाहे नंबर न आएं या कॉम्पिटिशन में हार हो सकती है। ऐसे में सिर्फ यह पूछने के बजाय कि तुम जीते या नहीं, उनसे पूछें, क्या तुमने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की। इससे बच्चे का ध्यान जीत-हार के बजाय मेहनत, तैयारी और अपनी कमियों को सुधारने पर जाएगा।
बच्चों को अपनी जिम्मेदारियां पूरी करना और सही काम करना सिखाना भी जरूरी है। जैसे अपनी गलती मानना, किसी की चीज वापस करना, दोस्त की मदद करना या अपना काम समय पर पूरा करना। कई बार बच्चा डर या झिझक की वजह से सही काम करने से पीछे हट सकता है। ऐसे समय में उसे समझाएं कि डर लगने के बावजूद सही फैसला लेना असली हिम्मत है।
6. खुद से बेहतर बनने की सोच दें
आज बच्चों पर पढ़ाई, खेल, लुक्स, दोस्तों और सोशल मीडिया को लेकर तुलना का काफी प्रेशर रहता है। बार-बार यह कहना कि देखो, दूसरा बच्चा तुमसे कितना अच्छा है, उनके कॉन्फिडेंस को कम कर सकता है। इसके बजाय उन्हें अपनी पुरानी कोशिश से तुलना करना सिखाएं। उनसे पूछें, तुम अपने अंदर क्या सुधार करना चाहते हो। इससे बच्चा अपनी कमियों को समझकर खुद को बेहतर बनाने पर ध्यान देगा।
7. मदद मांगने की हिम्मत दें
बच्चों को यह समझाना भी जरूरी है कि हर परेशानी अकेले संभालना जरूरी नहीं है। भगवद गीता में भी अर्जुन मुश्किल और उलझन की स्थिति में कृष्ण से मार्गदर्शन मांगते हैं। इसी तरह बच्चे भी जब किसी बात को लेकर डरें, परेशान हों या उन्हें समझ न आए कि क्या करना है, तो माता-पिता से खुलकर बात कर सकें। उन्हें बताएं कि सही समय पर मदद मांगना भी इमोशनली मजबूती की निशानी है।
बच्चों को मजबूत बनाने का मतलब यह नहीं है कि उन्हें कभी दुख, डर या असफलता महसूस ही न हो। असली मजबूती तब आती है, जब बच्चा अपनी परेशानी खुलकर बता सके, जरूरत पड़ने पर मदद मांग सके और मुश्किल समय में खुद को संभालना सीख सके। माता-पिता हर परेशानी से बच्चों को बचा नहीं सकते और न ही हर बार उनकी परेशानी खुद हल कर सकते हैं। वे बस उन्हें भरोसा और हिम्मत दें।