BJP के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय विधानसभा चुनावों के उम्मीदवारों की लिस्ट में अपना नाम देखकर हैरान रह गए। उन्होंने मीडिया से बातचीत में कहा था कि उन्हें इससे आश्चर्य हुआ है, लेकिन वह गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। विजयवर्गीय को उनकी ऊंची महत्वाकांक्षा के लिए जाना जाता है। उनकी चाहत मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने की रही है। शायद यही वजह है कि उन्हें लगता है कि उनका राजनीतिक कद इतना बड़ा है कि विधायक का चुनाव लड़ना उनके लिए छोटी बात होगी। अमित शाह के भाजपा अध्यक्ष बनने पर विजयवर्गीय को पार्टी का महासचिव बना दिया गया। अब जब उनके कई साथी राज्यसभा के सांसद बन चुके हैं तब विजयवर्गीय अपना मौका आने का इंतजार कर रहे हैं। भाजपा ने कई चरणों में मध्य प्रदेश, राजस्थान, मिजोरम और छत्तीसगढ़ चुनावों के लिए उम्मीदवारों के नामों की सूची जारी की है। तेलंगाना की सूची जारी करने में देर हुई है। उम्मीदवारों की लिस्ट में कई ऐसे नाम हैं, जिन्हें देखकर लोगों को हैरानी हुई है।
उम्मीदवारों के चयन में अप्रत्याशित कदम उठाने का है रिकॉर्ड
BJP ने त्रिपुरा में विधानसभा चुनावों से करीब 9 महीने पहले बिपलब देब की जगह माणिक शाह को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया था। जब त्रिपुरा चुनाव को लेकर ज्यादा खबरे नहीं आ रही थी, तब केंद्रीय मंत्री प्रतिमा भौमिक को भाजपा ने चुनावी समर में उतारने का फैसला किया था। भाजपा ने उत्तरपूर्वी राज्यों में गुटबाजी को बहुत अच्छी तरह से हैंडल किया है। दरअसल पार्टी नहीं चाहती थी कि जिस राज्य को उसने वामदलों को सत्ता से बेदखल कर हासिल किया है, उसे आसानी से गंवा दिया जाए। पार्टी इस मकसद को हासिल करने में सफल रही।
पार्टी कार्यकर्ताओं का खास ध्यान हर चुनाव में रखने पर फोकस
राजनीति के जानकारों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद पार्टी के संगठन से जुड़े मसलों में शामिल रहते हैं। इसकी झलक कई बार मिली है। पिछले 9 साल में पार्टी ने अपने कार्यकर्ताओं की उम्मीदें पूरी करने की हर मुमकिन कोशिश की है। बीजेपी के प्रेसिडेंट के रूप में अमित शाह ने पार्टी के कार्यकर्ताओं को जीत को आदत बना लेने की नसीहत दी थी। उन्होंने पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक के चुनावों में पार्टी को शानदार जीत दिलाई थी। पार्टी के पूर्व उपाध्यक्ष विनय सहस्त्रबुद्धे का कहना है कि कार्यकर्ताओं की उम्मीदें बढ़ रही हैं। पार्षद विधायक का चुनाव लड़ना चाहते हैं। विधायक लोकसभा का चुनाव लड़ना चाहते हैं।
भाजपा ने विजय रुपाणी को मुख्यमंत्री पद से हटाने के बाद गुजरात में पूरी कैबिनेट को बदल दी थी। पार्टी इससे यह संदेश देना चाहती थी कि उसके लिए कार्यकर्ता सबसे पहले हैं। पार्टी ने शिवराज सिंह चौहान की उम्मीदवारों की चौथी लिस्ट को हरी झंडी दिखाने में देर की। राजस्थान में भी उसने इसी तरह की रणनीति अपनाई। इसका मकसद कार्यकर्ताओं को यह संदेश देना था कि पार्टी कुछ लोगों को अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए मौके का इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं देगी।
उम्मीदवारों के चयन में पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल नहीं
छत्तीसगढ़ में भाजपा की दूसरी लिस्ट देखकर राजनीतिक पंडित हैरान रह गए। वजह यह है कि पार्टी ने सज्जा विधानसभा सीट से राजनीति का कम अनुभव रखने वाले ईश्वर साहू को टिकट दिया है। उनके बेटे की कथित हत्या भीड़ ने पीट-पीट कर दी थी। छत्तीसगढ़ में कैंप करने वाले उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह का मानना है कि साहू को टिकट देकर तुष्टीकरण की राजनीति के खिलाफ अपनी मंशा साफ कर देना चाहती है। साहू के राजनीति में कम अनुभव को टिकट देने में किसी तरह का बाधा नहीं माना गया। दरअसल, भाजपा यह बताना चाहती है कि अगर चुनाव में जीत की उम्मीद दिख रही हो तो वह राजनीति से बाहर के व्यक्ति को भी टिकट देने का प्रयोग कर सकती है।
नए चेहरों को टिकट देकर बड़े रिस्क लेती रही है पार्टी
पार्टी ने छत्तीसगढ़ में जिन 86 उम्मीदवारों के नामों का ऐलान किया है, उनमें 44 ऐसे लोग हैं जो पहली बार चुनाव लड़ेंगे। बीजेपी ने कर्नाटक विधानसभा चुनावों में भी प्रयोग किया। उसने कई नए चेहरों को चुनाव लड़ने का मौका दिया। हालांकि, चुनावी नतीजों से यह साफ हो गया है कि प्रयोग करने में पार्टी कुछ कदम आगे निकल गई थी। इसके बावजूद पार्टी की रणनीति पर कोई असर नहीं पड़ा है। वह नए चेहरों पर दांव लगाने के लिए तैयार है। पब्लिक पॉलिसी रिसर्च सेंटर के डायरेक्टर सुमीत भसीन का कहना है कि 2018 से 2023 के बीच वोटर लिस्ट में नाम दर्ज कराने वाले वोटर्स को पार्टी के पुराने नेताओं के ट्रैक रिकॉर्ड के बारे में ज्यादा पता नहीं है। इसलिए पार्टी नए चेहरों पर दांव लगाना चाहती है।
राजस्थान में कई सासंदों को चुनावी समर में उतरने का आदेश
राजस्थान में अलवर के लोकसभा सांसद बाबा बालकनाथ को पार्टी ने विधासभा चुनाव के मैदान में उतारा है। कई दूसरे सासंदों को भी चुनावी समर में उतरने को कहा गया है। हालांकि, पार्टी के अंदर इस कदम को लेकर थोड़ा असंतोष रहा है। लेकिन, पार्टी का संदेश साफ है कि जिन लोगों की जनता के बीच अपील है और जो पार्टी को चुनाव जीतने में मदद कर सकते हैं उन्हें मैदान में उतरना होगा। हालांकि, पारंपरिक राजनीति से अलग चलने की भाजपा की इस कोशिश के अपने रिस्क भी हैं।