Mizoram Election 2023: मिजोरम में 7 नवंबर को होने वाले विधानसभा चुनावों (Assembly Elections 2023) के लिए सभी दलों ने अपनी कमर कस ली है। चुनाव आयोग ने पिछले हफ्ते घोषणा की थी कि पूर्वोत्तर राज्य की सभी 40 सीटों पर एक ही चरण में मतदान होगा। जबकि वोटों की गिनती राजस्थान (Rajasthan), छत्तीसगढ़ (CG), मध्य प्रदेश (MP) और तेलंगाना (Telangana) के साथ 3 दिसंबर को होगी।
मिजोरम में इस बार त्रिकोणीय मुकाबला होता दिखाई दे रहा है। कांग्रेस पार्टी अपने नए प्रदेश अध्यक्ष पर अपनी उम्मीदें लगा रही है। हालांकि, इसे मौजूदा मिज़ो नेशनल फ्रंट (MNF) और राज्य की राजनीति में ज़ोरम पीपुल्स मूवमेंट (ZPM) के बढ़ते प्रभाव से कड़ी टक्कर का सामना करना पड़ रहा है।
इसी बीच एक नरज डालते हैं, उत्तर पूर्व के इस राज्य के उन कुछ प्रमुख मुद्दों पर, जो आगामी विधानसभा चुनावों में काफी निर्णायक साबित हो सकते हैं।
कानूनी जीत के बावजूद, पूर्व मुख्यमंत्री लाल थनहावला और वर्तमान मुख्यमंत्री ज़ोरमथांगा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों ने जनता को संशय में डाल दिया है, जिससे ZPM को अपनी पहचान बनाने का संभावित अवसर मिला है।
The Economic Times की एक रिपोर्ट के अनुसार, विश्लेषकों का कहना है कि कई अहम मुद्दों को प्रभावी ठंग से मैनेज करने के कारण MNF को फायदा हो सकता है। इसमें सामाजिक-आर्थिक विकास नीति (SEDP) के तहत वित्तीय मदद देने, शरणार्थियों से निपटना और ज़ो उप-राष्ट्रवाद की बढ़ती भावना को संबोधित करने जैसे मुद्दे शामिल हैं।
असम के साथ चल रहे सीमा विवाद और नशीली दवाओं की बढ़ती आमद चिंता का विषय बनी हुई है। असम-मिजोरम सीमा पर पिछली झड़पों का असर इस क्षेत्र पर बना हुआ है।
रिपोर्टों के अनुसार, मणिपुर में जातीय संघर्ष के कारण मिजोरम में एक बड़ा शरणार्थी संकट पैदा हो गया है, लगभग 72,000 शरणार्थी राज्य में शरण मांग रहे हैं। इस संकट से निपटना एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बन गया है। विपक्ष इस पर राज्य सरकार की प्रतिक्रिया की आलोचना कर रहा है।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, मिजोरम के उपमुख्यमंत्री तावंलुइया ने ज़ो एकीकरण के मुद्दे को उठाया है। इसका मकसद पूर्वोत्तर राज्यों में मिज़ो-ज़ो समुदाय को एक साथ लाना है। 1986 के शांति समझौते के बाद से निष्क्रिय ये ऐतिहासिक मुद्दा, मणिपुर में चल रहे संकट के बीच फिर से उभर आया है। इससे अब MNF को एक बार फिर अपना रुख उजागर करने का मौका मिला है।
केंद्र सरकार ने म्यांमार के शरणार्थियों के बायोमेट्रिक डेटा इकट्ठा करने का निर्देश दिया था। केंद्र की इस आदेश की अवहेलना करने के MNF सरकार के हालिया फैसले ने सवाल खड़े कर दिए हैं। ये चुनाव से पहले पार्टी की रणनीतिक चाल का संकेत दे रहा है।
सत्ता-विरोधी भावनाएं भी खूब जोरों पर हैं। ऐसा लगता है कि लालदुहावमा के नेतृत्व वाले ज़ोरम पीपुल्स मूवमेंट (ZPM) ने खासतौर से शहरी इलाकों में लोकप्रियता हासिल कर ली है।
राज्य के सियासी गलियारे में विकास, कथित भ्रष्टाचार और पहचान की राजनीति जैसी चिंताएं साफ दिखती हैं। चर्च के समर्थित मिजोरम शराब (निषेध) अधिनियम, 2019 एक महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है। इसके अलावा, अंतर-जातीय तनाव ने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है। खासतौर से त्रिपुरा में बसे ब्रू लोगों को वोटर लिस्ट में शामिल करने को लेकर।