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Mahakumbh Mela 2025: अखाड़ों की अपनी एक अलग है दुनिया, कोतवाल संभालते हैं सुरक्षा की जिम्मेदारी, मिलती है कड़ी सजा

Prayagraj Mahakumbh 2025: नए साल 2025 की शुरुआत के साथ-साथ महाकुंभ मेला शुरू होने वाला है। प्रयागराज के संगम तट पर संतों को तंबू लग चुका है। इस भव्य आयोजन में देश-विदेश से करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। यहां बड़े अखाड़े अपना शिविर लगाए हैं। इन अखाड़ों की अपनी एक दुनिया है। यहां अनुशासन पहली प्राथमिकता है। किसी भी गलती पर कड़ी सजा मिलती है

Jitendra Singhअपडेटेड Jan 09, 2025 पर 12:44 PM
Mahakumbh Mela 2025: अखाड़ों की अपनी एक अलग है दुनिया, कोतवाल संभालते हैं सुरक्षा की जिम्मेदारी, मिलती है कड़ी सजा
Prayagraj Mahakumbh 2025: कुंभ और महाकुंभ के दौरान अखाड़ों में अनुशासन बनाए रखने की जिम्मेदारी कोतवालों की होती है।

अखाड़ों के भीतर अपनी एक अलग दुनिया है। अनूठी परंपराएं, नियम-कायदे हैं। यहां की सुरक्षा व्यवस्था बेहद तगड़ी होती है। इस सुरक्षा की जिम्मेदारी भी साधु संत निभाते हैं। पुलिस की तरह यहां कोतवाल की पोस्ट होती है। जिसके पास सुरक्षा की अहम जिम्मेदारी होती है। मामूली गलती पर उसे सजा देने का भी अधिकार रहता है। हर एक अखाड़ा अपने नियम कानून से बंधे होते हैं। कुंभ और महाकुंभ में अखाड़ों का शिविर लगते ही कोतवाली बनाकर कोतवाल नियुक्ति किए जाते हैं। अखाड़े के भीतर आने-जाने वाले संतों और हर व्यक्ति पर कोतवाल की पैनी नजर रहती है। इनकी अनुमति के बिना कोई अखाड़े के शिविर में दाखिल नहीं हो सकता है।

कोतवाली अखाड़े के गुरु कुटिया के पास बनाई जाती है। जिसके आस-पास कोतवाल मौजूद रहते हैं। वहीं से पूरी छावनी की निगरानी की जाती है। कोतवाल अखाड़े की हर एक गतिविधियों पर नजर रखते हैं। कोतवाल के हाथ में चांदी की मुठिया लगी हुआ एक छड़ी (लाठी) होती है। ऐसे में कोतवाल को छड़ीदार भी कहा जाता है।

जानिए किसे कहते हैं अखाड़ा

अखाड़ा साधुओं का वो दल होता है, जो शस्त्र विद्या में निपुण होता है। वैसे आम भाषा में कुश्ती आदि के लिए ग्राउंड के लिए अखाड़ा शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। इससे साधुओं का अखाड़ा का संबंध भी इसी से है। कहा जाता है कि अलख शब्द से ही अखाड़ा शब्द निकला है। पहले अखाड़े शब्द का इस्तेमाल नहीं किया जाता था और इन्हें साधुओं का बेड़ा ही कहा जाता था। बताया जाता है कि मुगल काल में अखाड़ा शब्द का इस्तेमाल किया जाने लगा। जबकि धर्म के कुछ जानकारों का कहना ह कि साधुओं के अक्खड़ स्वभाव के चलते इसे अखाड़ा का नाम दिया गया है।

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