जब सरकार का कुल खर्च कुल आमदनी से ज्यादा होता है तो उसे बजट घाटा (Budget deficit) कहते हैं। यह किसी देश की वित्तीय स्थिति को दर्शाता है। Budget deficit में सरकार की उस वित्त वर्ष में कुल आमदनी उसके कुल खर्च से कम होता है। इस बजट घाटा को कम करने के लिए सरकार अपने खर्च में कटौती करती है और राजस्व (Revenue) बढ़ाने के उपायों पर जोर देती है। बजट डेफिसिट का सबसे बड़ा नुकसान महंगाई यानी मुद्रास्फीति का बढ़ना है, जिससे देश में आर्थिक मंदी आ सकती है। जानते हैं कितने तरह के डेफिसिट होते हैं, जिन्हें हम अक्सर बजट भाषण में सुनते हैं...
राजस्व घाटा (Revenue deficit)
जब सरकार का कुल रेवेन्यू एक्सपेंडिचर (Revenue Expenditure) उसके कुल रेवेन्यू रिसिप्ट (Revenue Receopts) से अधिक हो जाता है तो उसे राजस्व घाटा (Revenue deficit) कहते हैं। यानी जब सरकार के मंत्रालयों और विभागों, कर्मचारियों की सैलरी आदि पर दिनचर्या में होने वाला खर्च कुल राजस्व प्राप्तियों से अधिक हो जाता है तो उसे Revenue deficit कहते हैं। यह किसी भी देश के लिए सबसे खतरनाक स्थिति होता है। Revenue deficit को भी GDP के अनुपात में ही व्यक्त किया जाता है। रेवेन्यू डेफिसिट या राजस्व घाटा दिखाता है कि सरकार के पास सरकारी विभागों को सामान्य तरीके से चलाने के लिए पर्याप्त राजस्व नहीं है।
प्रभावी राजस्व घाटा (Effective revenue Deficit)
राजस्व व्यय के रूप में सरकार कुछ धनराशि पूंजीगत परिसंपत्तियां (Capital Assets) सृजित करने के लिए अनुदान के रूप में खर्च करती है। जब इस राशि को राजस्व घाटे से घटा दिया जाता है तो उसे प्रभावी राजस्व घाटा कहते हैं। राजस्व घाटे में वृद्धि का आंकड़ा सरकार के लिए चेतावनी होता है। सरकार अपना खर्च कम करे या फिर आय को बढ़ाए। घाटे को कम करने के लिए सरकार बांड और ट्रेजरी बिल्स जारी करके बाजार से पैसे उधार लेती है। केंद्र सरकार उधार लेने के लिए बांड (डेटेड सेक्योरिटीज) और टी बिल दोनों जारी करती है, जबकि राज्य सरकारें सिर्फ बांड जारी करती हैं जिन्हें स्टेट डेवलपमेंट लोन भी कहते हैं।
राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit)
यह सरकार के कुल खर्च और उधारी को छोड़ कुल कमाई के बीच का अंतर होता है। सरकार की कुल सालाना आमदनी के मुकाबले जब खर्च अधिक होता है तो उसे राजकोषीय घाटा कहते हैं। लेकिन इसमें कर्ज शामिल नहीं होता है। यानी सरकार की आमदनी में सरकार द्वारा लिया गया उधार शामिल नहीं किया जाता है। राजकोषीय GDP के प्रतिशत के रूप में व्यक्त किया जाता है। राजकोषीय घाटा जितना अधिक होता है, सरकार पर कर्ज और ब्याज अदायगी का बोझ उतना ही बढ़ जाता है। यही वजह है कि सरकारें राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए सब्सिडी और बाकी खर्च में कटौती करती हैं। वित्त मंत्रालय हर साल बजट में राजकोषीय घाटे का लक्ष्य तय करता है।
प्राथमिक घाटा (Primary Deficit)
राजकोषीय घाटे में से ब्याज की देनदारी को निकालने के बाद प्राप्त राशि को प्राथमिक घाटा कहते हैं। सरकार हर साल बजट में एक निश्चित राशि का प्रावधान पूर्व में लिए गए ऋणों पर ब्याज चुकाने के लिए करती है। ब्याज चुकता करने पर खर्च की गई राशि को जब राजकोषीय घाटे से घटा दिया जाता है तो उसे प्राथमिक घाटा कहते हैं। प्राथमिक घाटा अगर शून्य हो तो इसका मतलब यह है कि सरकार ने चालू वित्त वर्ष में तो अपनी आय से अपना खर्च चला लिया है लेकिन उसे पुराने कर्ज पर ब्याज चुकाने के लिए ही राजकोषीय घाटे के रूप में उधार लेना पड़ रहा है। प्राइमरी डेफिसिट में ब्याज के भुगतान को शामिल नहीं किया जाता है। इसका मतलब यह हुआ कि सरकार को ब्याज के भुगतान को हटाकर खर्चों को पूरा करने के लिए कितने उधार की जरूरत है।
मुद्रीकृत राजकोषीय घाटा (Monetized Fiscal Deficit)
राजकोषीय घाटे को पूरा करने के लिए सरकार रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) से जो कर्ज लेती है, मुद्रीकृत राजकोषीय घाटा (Monetized Fiscal Deficit) कहते हैं। यानी सरकार बजट को फाइनेंस करने के लिए जब RBI से कर्ज या उधार लेती है तो उसे मुद्रीकृत राजकोषीय घाटा कहते हैं। भारत में 1997 के बाद से कभी ऐसी नौबत नहीं आई है कि सरकार को राजकोषीय घाटे को पूरा करने के लिए RBI से उधार लेना पड़े।
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