Budget 2023: इंडिया के लिए आईटी इंडस्ट्री बहुत अहम है। यह सेक्टर बड़ी संख्या में नौकरियों के मौके पैदा करता है। इस सेक्टर की ग्रोथ से इकोनॉमी की ग्रोथ भी जुड़ी है। NASSCOM ने फाइनेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमण को आईटी और IT enabled Services (ITeS) के तीन सलाह दी है। इससे ईज ऑफ डूइंग बिजनेस बढ़ेगा। अगर फाइनेंस मिनिस्टर बजट में इन सलाहों को मान लेती हैं तो आईटी इंडस्ट्री नई ऊंचाई छुएगी। इनमें एडवान्स प्राइसिंग एग्रीमेंट्स, सेफ हार्बर रूल्स और Per diem allowance की सीमा शामिल हैं। इस अलाउन्स का मतलब उस पेमेंट से है, जो एंप्लॉयी को अपने वर्क लोकेशन से बाहर काम करने पर हर दिन के लिहाज से मिलता है। इसमें वर्क ट्रिप और दूसरे ऑफिस से जुड़े काम शामिल हैं।
अभी इस अलाउन्स को अगर पूरी तरह खर्च किया जाता है तो उस पर टैक्स नहीं लगता है। लेकिन, खर्च नहीं किए गए हिस्से पर टैक्स लगता है। नैस्कॉम ने वित्त मंत्री को अपनी सिफारिश में कहा है कि रोजाना खर्च के लिए per diem allownace की सीमा तय होनी चाहिए। साथ ही एंप्लॉयी के तय सीमा से ज्यादा खर्च करने पर ही डॉक्युमेंट्स सब्मिट करने की जरूरत होनी चाहिए। इसकी वजह यह है कि एप्लॉयी को अक्सर काम के सिलसिले में देश या विदेश में ट्रेवल करना पड़ता है। इस दौरान कंपनियां उन्हें per diem allowance देती हैं।
आईटी इंडस्ट्री का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था ने कहा है कि इस तरह के अलाउन्स से जुड़े टैक्स के मसलों के लिए डॉक्युमेंट सब्मिट करना जरूरी है। इस वजह से कंपनियों को दिक्कत का सामना करना पड़ता है। कई बार ये डॉक्युमेंट्स विदेशी भाषा में होते हैं। इनमें दी गई जानकारियां टैक्स अथॉरिटी के फॉरमैट से अलग हो सकती हैं। उन्हें पढ़ने या समझने में भी दिक्कत आ सकती है। इसके अलावा इस अलाउन्स का कुछ हिस्सा टैक्सेबल होने से एप्लॉयर पर टैक्स कंप्लायंस का बोझ बढ़ जाता है। इससे एडमिनिस्ट्रेटिव ओवरहेड्स भी बढ़ जाते हैं। इसलिए अमेरिका और सिंगापुर जैसे देशों में तय सीमा तक per diem allownace के लिए डॉक्युमेंट सब्मिट करने की जरूरत खत्म की जा सकती है। ऐसा करने से इज ऑफ डूइंग बिजनेस बढ़ेगा। एंप्लॉयी और एंप्लॉयर को जरूरी डॉक्युमेंट्स सब्मिट करने के लिए परेशान नहीं होना पड़ेगा। इससे डिपार्टमेंट और इंडस्ट्री का काफी समय भी बचेगा।
एडवान्स प्राइसिंग एग्रीमेंट्स
एडवान्स प्राइसिंग एग्रीमेंट्स का इस्तेमाल ट्रांजेक्शन से पहले ट्रांसफर प्राइसिंग के मसलों के निपटारे के लिए होता है। नैस्कॉम ने कहा है कि APA पूरा करने के लिए निश्चित समय सीमा तय की जानी चाहिए। अभी एपीए को पूरा करने में कम से कम चार साल का समय लग जाता है। इस दौरान टैक्सपेयर्स को रेगुलर ट्रांसफर प्राइसिंग ऑडिट का सामना करना पड़ता है। इससे एक ही टैक्सपेयर का कई बार ऑडिट होता है। एपीए पूरा करने में देरी से टैक्सपेयर्स के लिए अनिश्चितता की स्थिति भी पैदा होती है। इससे ईज ऑफ डूइंग बिजनेस पर असर पड़ता है।
ट्रांसफर प्राइसिंग का इस्तेमाल तब होता है, जब पेरेंट कंपनी और विदेश स्थिति उसकी सब्सिडियरी के बीच गुड्स और सर्विसेज का एक्सचेंज होता है। ट्रांसफर प्राइसिंग से जुड़े मसलों के निपटारे के लिए सेफ हार्बर रूल्स (SHR) का इस्तेमाल होता है। इसके तहत, सेफ हार्बर तब तक लायबिलिटी घटा देता है, जब तक तय शर्तें पूरी होती हैं। 200 करोड़ रुपये टर्नओवर तक की कंपनियों के लिए सेफ हार्बर मार्जिन को नोटिफाई किया गया है। नैस्कॉम ने कहा है कि अभी कुछ ही कंपनियां इसका इस्तेमाल करती हैं। इसलिए कंपनियों के टर्नओवर की मौजूदा सीमा को 200 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 1,000 करोड़ रुपये कर देना चाहिए। उसने एसएचआर मार्जिन को भी 15 फीसदी से ज्यादा नहीं रखने की मांग की है। अभी यह 17 से 24 फीसदी है।