Union Budget 2023: बैंकिंग सेक्टर (Banking Sector) के लिए खराब वक्त खत्म हो चुका है। कई बड़े राइट-ऑफ के बाद बैंकों की बुक्स साथ-सुथरी दिख रही हैं। पिछले कुछ सालों में नई पूंजी मिलने से बैंकों के कैपिटल एडेक्वेसी रेशियो (CAR) में सुधार आया है। अब बैंकिंग सेक्टर को ग्रोथ के लिए नए पॉजिटिव संकेतों का इंतजार है। हालांकि, ग्लोबल और डोमेस्टिक इकोनॉमी के लिए अब भी कई चुनौतियां दिख रही हैं। इंटरेस्ट रेट बढ़ रहे हैं। ग्लोबल इकोनॉमी पर मंदी का खतरा मंडरा रहा है। बढ़ती बेरोजगारी का असर बैंकों की एसेट क्वालिटी पर पड़ने की आशंका है। दुनियाभर के केंद्रीय बैंकों के राहत पैकेज वापस लेने से लिक्विडिटी में भी कमी आई है। अगर इंडियन इकोनॉमी की ग्रोथ उम्मीद के मुताबिक नहीं रहती है तो क्वालिटी एसेट पर फिर से दबाव बन सकता है। छोटे ग्राहकों और कंपनियों को दिए लोन के रिपेमेंट में दिक्कत आ सकती है।
इन दो बड़े मसलों पर फोकस जरूरी
उपर्युक्त स्थिति को देखते हुए उम्मीद है कि 1 फरवरी, 2023 को पेश होने वाले बजट में फाइनेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमण बैंकिंग सेक्टर की ग्रोथ का रोडमैप पेश कर सकती हैं। ऐसे दो मुख्य क्षेत्र हैं, जिनके लिए बैंकिंग सेक्टर को बजट में ऐलान होने की उम्मीद है। पहला है सरकारी बैंकों को नई पूंजी का आवंटन। दूसरा है सरकारी बैंकों के निजीकरण के उपाय। लेकिन, ऐसा लगता है कि सीतारमण अगले बजट में इन दोनों मसलों को छूने से बच सकती हैं। वह बैंकों की बेहतर वित्तीय सेहत को देखते हुए नई पूंजी देने का ऐलान नहीं करेंगी। सरकार फाइनेंशियल ईयर 2015-16 से 2020-21 के बीच सरकारी बैंकों को 3.3 लाख करोड़ रुपये की पूंजी उपलब्ध करा चुकी है। इस साल 1 फरवरी को पेश बजट में भी फाइनेंस मिनिस्टर ने सरकारी बैंकों को नई पूंजी देने का ऐलान नहीं किया था।
बेहतर हो रही है बैंकों की वित्तीय सेहत
बैंकों का नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (NPAs) 31 मार्च, 2022 को घटकर 7.6 फीसदी पर आ गया था। यह पिछले 6 साल में सबसे कम एनपीए है। बैंकों के कैपिटल-टू-रिस्क वेटेड एसेट रेशियो (CRAR) में भी सुधार देखने को मिला है। यह मार्च 2022 में 14.6 फीसदी था। इससे सरकार बैंकों को नई पूंजी देने में किसी तरह की जल्दबाजी नहीं करेगी। सरकारी बैंकों के निजीकरण के लिए भी फिलहाल सरकार की तरफ से बड़े कदम उठाए जाने की उम्मीद नहीं है। इसकी वजह यह है कि यह मसला राजनीति के लिहाज से संवेदनशील है।
छोटे बैंकों के विलय से बड़ा बैंक बनाने की जरूरत
सरकारी बैंकों में एंप्लॉयीज ट्रेड यूनियंस मजबूत हैं। ऐसे में सरकार को रिफॉर्म्स के बड़े कदम उठाने से पहले काफी सोचना पड़ता है। सच्चाई यह है कि अब भी बैंकों के बुक्स में काफी खराब एसेट्स शामिल हैं। ऐसे में इन बैंकों में पैसे लगाने से पहले इनवेस्टर्स कई बार सोचेंगे। पिछले कुछ सालों में बैंकों के निजीकरण के कदमों को देखें तो 2020 में 10 सरकारी बैंकों का विलय 4 बैंकों में किया गया था। इसके अलावा 2019 में LIC को IDBI Bank को खरीदने पर मजबूर होना पड़ा था। इधर, सरकार कुछ बड़े सरकारी बैंकों का विलय कर एक बड़ा बैंक बनाना चाहती है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़े बैंकों का मुकाबला करने में सक्षम हो। चीन और जापान के बड़े बैंकों के मुकाबले इंडियन बैंकों का आकार छोटा है। सरकार को आज नहीं तो कल इसके लिए गंभीर कोशिश करनी पड़ेगी।