Budget 2023: RBI ने नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों (NBFC) के लिए नियम सख्त किए हैं। इससे वे नाशुख हैं। उनका कहना है कि उनके लिए भी बैंकों जैसे नियम बना दिए गए हैं, जिससे एनबीएफसी के रूप में उन्हें जो फायदे मिलते थे, वे खत्म हो गए हैं। एनबीएफसी का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था Finance Industry Development Council (FIDC) ने बजट (Union Budget) से पहले अपनी मांग के बारे में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को बताया है। इसमें कहा गया है कि अगर उन पर भी बैंकों जैसे नियम लागू किए जाते हैं तो एनबीएफसी के मॉडल को नुकसान होगा। इससे उन इलाकों और लोगों तक कर्ज की सुविधाएं पहुंचाने में दिक्कत आएगी, जिनकी पहुंच बड़े बैंकों तक नहीं है। एनबीएफसी समाज के उस वर्ग को कर्ज लेने की सुविधा देती हैं, जिनके लिए बड़े बैंकों से कर्ज लेना मुश्किल होता है।
NBFC के घोटालों के बाद RBI ने बदला रुख
एनबीएफसी को लेकर आरबीआई का रुख लंबे समय से नरम रहा है। पिछले कुछ सालों से आरबीआई के रुख में बदलाव आया है। खासकर IL&FS सहित कुछ एनबीएफसी से जुड़े घोटाले सामने आने के बाद केंद्रीय बैंक ने नियमों को सख्त बनाना शुरू किया है। RBI ने पिछले साल अक्टूबर में एनबीएफसी के लिए स्केल-आधारित रेगुलेटरी फ्रेमवर्क पेश किया था। यह इस साल 1 अक्टूबर से लागू हो गया है।
सख्त हुए एनबीएफसी से जुड़े नियम
इस फ्रेमवर्क में एनबीएफसी के लिए कई तरह के रेगुलेशन शामिल हैं, जो कैपिटल की जरूरत, गवर्नेंस स्टैडर्ड्स और प्रूडेंशियल रेगुलेशन से जुड़े हैं। इस फ्रेमवर्क में एनबीएफसी को उनके साइज, एक्टिविटी और रिस्क के आधार पर चार वर्ग में बांटा गया है। इनमें सबसे सख्त रेगुलेशन एसेट क्लासिफिकेशन से जुड़ा है। एनबीएफसी के लिए एसेट के मानक वही हैं, जो बैंकों के लिए हैं।
लोन को एनपीए कैटेगरी में डालने के नियम बदले
RBI के 12 नवंबर के सर्कुलर में कहा गया है कि अगर लोन की किस्त 90वें दिन तक नहीं चुकाई जाती है तो उस लोन को नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (NPA) मान लिया जाएगा। बैंकों के लिए भी यही नियम है। इस नियम से एनबीएफसी खुश नहीं हैं। FIDC का कहना है कि इस नियम की वजह से छोटे कर्ज लेने वाले ग्राहक अगर 90वें दिन तक लोन की किस्त नहीं चुकाते है तो उनका लोन एनपीए कैटेगरी में आ जाएगा। फिर, जब तक कुल लोन नहीं चुका दिया जाता, उनका लोन एनपीए कैटेगरी में बना रहेगा। छोटे ग्राहक कई बार ऐसी वजहों से समय पर लोन चुकान में नाकाम रहते हैं, जो उनके कंट्रोल से बाहर होती हैं।
बैंकों ने एनबीएफसी को काफी लोन दिया है
उधर, आरबीआई का मानना है कि IL&FS और दीवान हाउसिंग फाइनेंस के घोटालों के बाद नियमों को सख्त बनाना जरूरी है। इसकी वजह है कि किसी एक एनबीएफसी के डूबने का असर पूरी इंडस्ट्री पर पड़ता है। खासकर इसका असर बैंकों पर भी पड़ता है। बैंकों के पास पब्लिक का पैसा होता है, जिसे वे एनबीएफसी को कर्ज के रूप में देते हैं। 23 सितंबर, 2022 तक बैंकों की तरफ से एनबीएफसी को दिया गया कर्ज 11.7 लाख करोड़ रुपये था।