पिछले एक दशक में भारत में बिजली की मांग 135 गीगावॉट से बढ़कर 240 गीगावॉट हो गई, जबकि वित्त वर्ष 2014 में एनर्जी की कमी 4.2 पर्सेंट थी और वित्त वर्ष 2024 में यह आंकड़ा घटकर 0.2 पर्सेंट हो गया। हालांकि, देश में बिजली की मांग बढ़कर 335 गीगावॉट तक पहुंच सकती है और ऐसे मे बिजली को किफायती बनाए रखना सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण होगा।
बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए सरकार ने साल 2030 तक कोयला के जरिये तकरीबन 80 गीगावॉट की नई क्षमता जोड़ने का ऐलान किया है। इसके साथ ही भारत की रिन्यूएबल एनर्जी और हाड्रोपावर क्षमताओं में भी बढ़ोतरी होगी। सरकार ने सिर्फ रिन्यूएबल एनर्जी के क्षेत्रों में 500 गीगावॉट का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है।
ऊर्जा मंत्री आर. के. सिंह ने मनीकंट्रोल को बताया, ' देश के पावर सेक्टर ने पिछले एक दशक में लंबा सफर तय किया है और भारत पावर डेफिसिट से पावर सरप्लस देश में बदल गया है।' हालांकि, कुछ सेगमेंट में पावर सेक्टर की ग्रोथ सुस्त भी हुई है। मनीकंट्रोल ने पावर एंड रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर में अहम सफलताओं और नाकामियों की पड़ताल की है।
कंज्यूमर्स के अधिकार: सरकार ने बिजली (कंज्यूमर्स के अधिकार) कानून, 2020 लागू किया है, जिसमें पहली बार बिना शेड्यूल वाली बिजली कटौती पर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों (discoms) को कंज्यूमर्स की भरपाई करने की बात है। नियमों में कंज्यूमर्स को सर्विस देने के लिए डिस्ट्रिब्यूशन कंपनियों के लिए समयसीमा भी तय की गई है।
रिन्यूएबल एनर्जी को बढ़ावा: वित्त वर्ष 2014-15 में न्यू एंड रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर को आवंटन 956 करोड़ रुपये था, जो 2023 में बढ़कर 10,122 करोड़ रुपये हो गया। वित्त वर्ष 2013-14 से अब तक भारत की इंस्टॉल्ड रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता (हाड्रोपावर को छोड़कर) तकरीबन चार गुना बढ़ चुकी है। इसके तहत यह क्षमता 28 गीगावॉट से बढ़कर 132 गीगावॉट हो चुकी है।
नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन (NGHM): चूंकि रिन्यूएबल एनर्जी भारत की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है, लिहाजा केंद्र सरकार ने एनर्जी के नई संसाधनों मसलन ग्रीन हाइड्रोजन के लिए प्रयास शुरू किया है। केंद्रीय कैबिनेट ने 4 जनवरी, 2023 को NGHM के तहत 19,744 करोड़ के खर्च को मजूरी थी, जिसमें 17,490 करोड़ रुपये का इंसेंटिव था। सरकार का इरादा 2030 तक सालाना कम से कम 5 MMT ग्रीन हाइड्रोडन का उत्पादन करना है।
रिसर्च एंड डिवेलपमेंट (R&D) की कमी: सरकार इस क्षेत्र में रिसर्च एंड डिवेलपमेंट पर ज्यादा फोकस नहीं कर पाई है। रिन्यूएनबल एनर्जी सेक्टर, इमर्जिंग एनर्जी स्टोरेज या ग्रीन हाइड्रोजन सेगमेंट में न तो कोई इंसेंटिव स्कीम है और न ही रिसर्च एंड डिवेलपमेंट के लिए कोई फंडिंग है।
पीएम कुसुम ((PM-KUSUM), रूफटॉप सोलर और सोलर पार्क: पिछले दशक में रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर से जुड़ी कई योजनाएं सफल नहीं रहीं। प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाअभियान योजना (PM-KUSUM) फंड और जागरूकता के अभाव में ज्यादा सफल नहीं रही। नतीजतन, सरकार इस स्कीम को वित्त वर्ष 2025 में खत्म करने की तैयारी में है और इसके लिए कोई बजट ग्रांट नहीं दिया जाएगा। सोलर पार्क स्कीम के तहत सरकार ने 40 गीगावॉट क्षमता का लक्ष्य हासिल किया है, लेकिन अह तक 10 गीगवॉट का ही लक्ष्य हासिल किया गया है। रूफटॉप सोलर प्रोग्राम भी सरकार के टारगेट से पीछे चल रही है।
सरकार को क्या करना चाहिए?
ऊर्जा, पर्यावरण और जल परिषद (CEEW) में सीनियर प्रोग्राम लीड दिशा अग्रवाल का कनहा था कि भविष्य के बजट में बेहतर स्किल की ट्रेनिंग के लिए आवंटन में बढ़ोतरी की जानी चाहिए, ताकि इंडस्ट्री की जरूरतों को बेहतर तरीके से पूरा किया जा सके। इंडसलॉ (IndusLaw) में पार्टनर दीपक चौधरी ने बताया कि भारत को रिन्यूएबल एनर्जी से संबंधित उपकरणों के इंपोर्ट पर निर्भरता कम करने की जरूरत है।