यूनियन बजट ऐसे वक्त पेश होने जा रहा है, जब इकोनॉमी की ग्रोथ स्ट्रॉन्ग है, विदेशी मुद्रा भंडार अच्छी स्थिति में है और कंपनियों-बैंकों की बैलेंसशीट मजबूत है। लेकिन, फूड इनफ्लेशन कम होने का नाम नहीं ले रहा है। कंजम्प्शन डिमांड कमजोर है। प्राइवेट इनवेस्टमेंट कम है। इन तीनों के लिए कदम उठाने की जरूरत है। यह भी ध्यान में रखने की जरूरत है कि इस वित्त वर्ष की एक तिमाही बीत चुकी है। ऐसे में बजट में उठाए जाने वाले कदमों का असर इस वित्त वर्ष की दूसरी छमाही पर पड़ेगा। इस समय चार प्राथमिकताएं दिख रही हैं:
सरकार को कई चुनौतियों के बावजूद फिस्कल कंसॉलिडेशन के मामले में कोई समझौता नहीं करना चाहिए, जो इसकी एक अच्छी बात रही है। अच्छी बात यह है कि RBI से उम्मीद से ज्यादा 2.1 लाख करोड़ रुपये के डिविडेंड से सरकार के पास अतिरिक्त खर्च करने की गुंजाइश है। यह डिविडेंड सरकार को फिस्कल कंसॉलिडेशन पर अपना फोकस बनाए रखने में भी मदद करेगा। इससे सरकार को अपने बॉरोइंग को कंट्रोल में रखने में आसानी होगी। इससे उसका डेट रेशियो भी मॉनेटरी पॉलिसी के मुताबिक बना रहेगा।
प्राइवेट कंजम्प्शन की डिमांड ग्रोथ 2023-24 में घटकर 4 फीसदी पर आ गई है, जो दो दशक (कोविड के साल को छोड़कर) में सबसे कम है। अगर कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन अच्छा रहता है और फूड इनफ्लेशन घटता है तो ग्रामीण इलाकों में कंजम्प्शन डिमांड बढ़ सकती है। मानसून की अच्छी बारिश की उम्मीद को देखते हुए इसके आसार दिख रहे हैं। शहरी क्षेत्रों में मांग में सुस्ती दिख सकती है। इसकी वजह यह है कि इंटरेस्ट रेट हाई है और पेंट-अप डिमांड बढ़ने से सर्विसेज में सुस्ती है। RBI के कंज्यूमर कॉन्फिडेंस सर्वे से भी कंज्यूमर सेंटिमेंट कमजोर रहने के संकेत मिले हैं। बजट में मिडिल क्लास के लिए अतिरिक्त राहत के उपाय हो सकते हैं।
पिछले वित्त वर्ष से ही फूड इनफ्लेशन हाई बना हुआ है। FY24 में एक समय यह 7.5 फीसदी तक पहुंच गया था। इस फाइनेंशियल की पहली तिमाही में यह फिर से बढ़कर 9 फीसदी पर पहुंच गया था। तब सब्जियों का इनफ्लेशन 28 फीसदी पहुंच गया था। जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम प्रतिकूल हुआ है, जिसका असर फूड इनफ्लेशन पर पड़ा है। बजट में जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए उपाय करने की जरूरत है। इसके अलावा कृषि के लिए स्टोरेज और ट्रांसपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने की जरूरत है।
प्राइवेट कॉर्पोरेट इनवेस्टमेंट बढ़ाने के उपाय
निवेश बढ़ाने के लिए प्राइवेट सेक्टर की भूमिका बढ़ाने की जरूरत है। अभी ज्यादा निवेश इंफ्रास्ट्रक्चर पर सरकार के खर्च और हाउसहोल्ड इनवेस्टमेंट से आ रहा है। अच्छी बैलेंसशीट की बदौलत प्राइवेट सेक्टर के लिए इनवेस्टमेंट बढ़ाने की गुंजाइश है। सरकार को श्रम की ज्यादा खपत वाले टेकसटाइल्स, जेम्स एंड ज्वेलरी जैसे सेक्टर को सपोर्ट करने की जरूरत है, जिनका प्रदर्शन पिछले कुछ सालों में अच्छा रहा है। आखिर में सरकार को रिफॉर्म्स पर फोकस बढ़ाना होगा।
(लेखक क्रिसिल के चीफ इकोनॉमिस्ट हैं। यहां व्यक्त विचार उनके व्यक्तिगत विचार है। इन्हें इस पब्लिकेशन का विचार नहीं माना जाना चाहिए।)