Budget@10: IBC ने बैंकिंग इंडस्ट्री में लाया बड़ा सुधार, लेकिन निजीकरण का काम अभी भी प्रगति पर
Union Budget 2024: पिछले 10 सालों के दौरान बैकिंग इंडस्ट्री में कई बड़े कदम उठाए गए हैं। इनमें सरकारी स्वामित्व वाले बैंकों का मेगा मर्जर, जनधन योजना के तहत एक बड़ी आबादी का बैंक खाता खुलवाना और सबसे अहम इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) को लागू करना शामिल हैं। हालांकि, सरकारी बैंकों का निजीकरण का कार्य प्रगति पर है और यह अभी भी एक अधूरा वादा बना हुआ है
पब्लिक सेक्टर बैंकों (PSB) में पिछले 10 केंद्रीय बजट में तीन बार पूंजी निवेश देखा गया है
Union Budget 2024: पिछले 10 सालों के दौरान बैकिंग इंडस्ट्री में कई बड़े कदम उठाए गए हैं। इनमें सरकारी स्वामित्व वाले बैंकों का मेगा मर्जर, जनधन योजना के तहत एक बड़ी आबादी का बैंक खाता खुलवाना और सबसे अहम इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) को लागू करना शामिल हैं। हालांकि, सरकारी बैंकों का निजीकरण का कार्य प्रगति पर है और यह अभी भी एक अधूरा वादा बना हुआ है। निजीकरण एक प्रमुख बैंकिंग रिफॉर्म है, जिसका वादा विभिन्न सरकारों ने किया था।पिछले 10 सालों के दौरान बैंकिंग सेक्टर में किए सभी सुधारों पर आइए एक नजर डालते हैं-
IBC का गठन
तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 25 फरवरी 2015 को केंद्रीय बजट पेश करते हुए ग्लोबल मानकों वाले एक व्यापक बैंकरप्सी कोड के गठन का ऐलान किया था। इसके अलावा जेटली ने लोकसभा में "इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC), 2015" को भी पेश किया। इस कोड को विस्तृत समीक्षा के लिए एक संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा गया, जिसने 28 अप्रैल, 2016 को विधेयक का एक नया ड्राफ्ट पेश किया। बाद में 2016 में संसद ने इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) को पारित किया। देश में दिवालिया प्रक्रिया को बेहतर बनाने के लिए इस सुधार का लंबे समय से इंतजार किया जा रहा था।
IBC का उद्देश्य लेंडर्स और बॉरोअर्स के बीच निष्पक्ष बातचीत की सुविधा के साथ-साथ दिवालियापन की कार्यवाही की प्रक्रिया को तेज और सरल बनाना है। कर्ज में फंसी संपत्तियों का समय पर समाधान और इन संपत्तियों से अधिकतम वसूली सुनिश्चित करना भी इसका मुख्य उद्देश्य है।
सीधे शब्दों में कहें, IBC ने लेंडर्स और बॉरोअर्स के बीच गतिरोध को हल करने के लिए एक सिस्टम को बनाने में मदद की, चूक करने वाली कंपनियों को लोन के बारे में अधिक जागरूक बनाया, और लेंडर्स को अपनी वसूली को अधिकतम करने का एक जरिया दिया। हालांकि अभी भी इस दिशा में लंबा सफर बाकी है।
पब्लिक सेक्टर बैंकों (PSB) में पिछले 10 केंद्रीय बजट में तीन बार पूंजी निवेश देखा गया है। पहले 2014-15 के बजट में बैंकों में इक्विटी के रूप में 2.40 लाख करोड़ रुपये की पूंजी डालने का ऐलान किया गया था। सरकार ने यह पूंजी 2018 तक डाली जाएगी। इसके अलावा 2016-17 के बजट में सरकारी बैंकों में 25,000 करोड़ रुपये की पूंजी डालने की घोषणा की गई थी। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2019-20 के बजट पर अपने भाषण में कहा कि सरकारी बैंकों को 70,000 करोड़ रुपये दिए जाएंगे।
बजट 2021 में भी सीतारमण ने PSB में 20,000 करोड़ रुपये की पूंजी डालने की घोषणा की। उसी साल मार्च में सरकार ने जीरो कूपन बांड के जरिए चार सरकारी बैंकों में 14,500 करोड़ रुपये की पूंजी डालने की घोषणा की थी।
सरकारी बैंकों का निजीकरण
केंद्र सरकार ने केंद्रीय बजट 2020-21 में आईडीबीआई बैंक (IDBI Bank में अपनी हिस्सेदारी बेचने की योजना का ऐलान किया था। सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) ने संयुक्त रूप से IDBI Bank में 60.7 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने का फैसला किया है।
सरकार ने कहा कि वह इसके निजीकरण के लिए दो-स्तरीय प्रक्रिया अपनाएगी। पहले चरण में ड्यू डिलीजेंस की प्रक्रिया शामिल है जहां बोली लगाई जाएगी। इसके बाद, योग्य बिडर्स को एक कठोर प्रक्रिया के जरिए शॉर्टलिस्ट किया जाएगा और बोलियों का वित्तीय मूल्यांकन किया जाएगा। यह दूसरा कदम होगा जो वास्तविक रणनीतिक बिक्री में समाप्त होगा। बोली लगाने वालों की सूची में कोटक महिंद्रा बैंक, प्रेम वत्स समर्थित सीएसबी बैंक और अमीरात एनबीडी शामिल हैं। हालांकि, इसके अलावा, दूसरे सरकारी बैंकों की निजीकरण योजना पर कोई प्रगति नहीं हुई है।
एसेट क्वालिटी रिव्यू
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने साल 2015 के अंत में बैंकों की एसेट क्वालिटी रिव्यू (AQR) की। केंद्रीय बैंक ने यह कदम बैंकों की ओर से अपने नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स (NPA) की जानकारी देने में विसंगतियों का पता चलने के बाद उठाया। बैंकों के आंकड़ों से पता चलता है AQR प्रक्रिया के बाद बैंकों का NPA बढ़कर 7.2 लाख करोड़ रुपये हो गया, जो AQR प्रक्रिया से पहले 3.5 लाख करोड़ रुपये था। सबसे अधिक उछाल इंडियन ओवरसीज बैंक, एक्सिस बैंक, इंडसइंड बैंक, IDBI बैंक, स्टेट बैंक ऑफ मैसूर (SBI के साथ विलय), और स्टेट बैंक ऑफ त्रावणकोर (SBI के साथ विलय) में देखी गई।
हालांकि दूसरी ओर, AQR भारी बैड लोन के साथ फंसे सरकारी बैंकों के लिए एक वरदान भी साबित हुई। PSU बैंकों का ग्रॉस NPA मार्च 2018 के 14.6 प्रतिशत से घटकर दिसंबर 2022 में 5.53 प्रतिशत रह गया। इंडस्ट्री के जानकारों ने इस बात पर जोर दिया कि AQR ने बैंकों को वसूली और राइट-ऑफ को बेहतर ढंग से समझने में मदद की।
2016 में नोटबंदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 नवंबर 2016 को 500 और 1,000 रुपये के पुराने नोटों को चलन से बाहर करने की घोषणा की थी। काले धन के खात्मे के उद्देश्य से की गई इस कार्रवाई से करीब 86 प्रतिशत मुद्रा चलन से बाहर हो गई। आरबीआई के पूर्व डिप्टी गवर्नर आर गांधी ने कहा इसका एक अप्रत्यक्ष उद्देश्य, देश में डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देना था, जो इसके बाद कहीं प्रभावी तरीके से शुरू हुआ। UPI पेमेंट लोगों की दैनिक जीवन में शामिल हो गया। मई 2023 तक देश में होने वाले कुछ रिटेल पेमेंट में 78% योगदान यूपीआई का था।
2019 में सरकारी बैंकों का विलय
वित्त मंभी निर्मला सीतारमण ने 30 अगस्त 2019 को 10 सरकारी बैंकों के मेगा मर्जर का ऐलान किया था। इसके तहत पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी), केनरा बैंक, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, इंडियन बैंक, यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया, इलाहाबाद बैंक, सिंडिकेट बैंक, कॉर्पोरेशन बैंक, ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स और आंध्रा बैंक को मिलाकर 4 बड़े बैंक बनाए गए।
मेगा-मर्जर के बाद अब सरकारी बैंकों के पास अच्छी पूंजी है और वे रिकॉर्ड लाभ और ग्रोथ दर्ज कर रहे हैं। सरकारी बैंकों को ट्रैक करने वाले निफ्टी पीएसयू बैंक (Nifty PSU Bank) इंडेक्स में पिछले एक साल में 52 प्रतिशत की जोरदार उछाल आई है। यूको बैंक और पंजाब एंड सिंध बैंक जैसे सरकारी बैंकों के शेयरों ने क्रमशः 223.20 प्रतिशत और 178.70 प्रतिशत से अधिक का मल्टीबैगर रिटर्न दिया है। बैंक ऑफ महाराष्ट्र और सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में भी क्रमश: 140.04 प्रतिशत और 122.70 प्रतिशत की तेजी रही।
केंद्रीय बजट 2024-25 में बैंकिंग के लिए क्या उम्मीद की जाए?
इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि अगले साल होने वाले आम चुनाव से पहले यह सरकार का अंतिम बजट पेश होगा। ऐसे में इसमें बैंकिंग इंडस्ट्री के लिए कोई महत्वपूर्ण सुधार देखने को नहीं मिलेगा। पंजाब एंड सिंध बैंक के नॉन-एग्जिक्यूटिव चेयरमैन, चरण सिंह ने कहा कि अंतरिम बजट में आमतौर पर लंबी अवधि को ध्यान में रखकर कोई नीति नहीं बनाई जाती है। उन्होंने कहा, "अंतरिम बजट में आमतौर पर छोटी अवधि को ध्यान में रखरक की जाने वाली घोषणाएं शामिल होती हैं। इसलिए किसी को भी इस बजट से अधिक उम्मीद नहीं रखना चाहिए।"