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दो हफ्ते में 4000 से ज्यादा गिर चुका है सेंसेक्स, क्या स्टॉक मार्केट्स में 1920 के दशक जैसे बन रहे हालात?

इंडियन इनवेस्टर्स के लिए यह जानना जरूरी है कि ग्लोबल और इंडियन मार्केट्स के बीच करीबी संबंध है। पिछले 10 से 15 साल में इंडियन और अमेरिकन मार्केट्स का व्यवहार एक जैसा रहा है

MoneyControl Newsअपडेटेड Mar 09, 2022 पर 10:37 AM
दो हफ्ते में 4000 से ज्यादा गिर चुका है सेंसेक्स, क्या स्टॉक मार्केट्स में 1920 के दशक जैसे बन रहे हालात?
इंट्रेस्ट रेट्स में बदलाव का अमेरिकी इक्विटी मार्केट पर सीधा असर पड़ता है। फिर, इसका असर इमर्जिंग मार्केट्स, बॉन्ड मार्केट्स और यहां तक कि कमोडिटी मार्केट्स पर देखने को मिलता है।

रूस-यूक्रेन क्राइसिस (Russia-Ukraine Crisis) ने शेयर बाजार की हवा निकाल दी है। 2020 में कोरोना के चलते बड़ी गिरावट के बाद स्टॉक मार्केट्स ने शानदार रिकवरी दिखाई थी। अब, मार्केट पिछले करीब डेढ़ साल में हासिल बढ़त गंवाता दिख रहा है। दो हफ्ते में सेंसेक्स 15 फीसदी से ज्यादा गिर चुका है। अमेरिकी स्टॉक मार्केट्स (US Stock Markets) का भी यही हाल है। ऐसा लग रहा है कि इंडियन मार्केट्स अमेरिकी मार्केट्स के साथ कदमताल कर रहे हैं। इनवेस्टर्स को भविष्य की फिक्र सता रही है। सवाल है कि आगे क्या होने वाला है? अंग्रेजी बिजनेस न्यूज वेबसाइट इकोनॉमिक टाइम्स के एक आर्टिकल में इस सवाल का जवाब है। आइए जानते हैं यह आर्टिकल क्या बताता है।

मौजूदा स्थितियों और 1920 की मॉनेटरी पॉलिसी के बीच समानता दिख रही है। पहले मार्केट में खूब तेजी आई, फिर वह धराशाई हो गया। 1930 से 1932 के बीच डाओ जोंस 89 फीसदी क्रैश कर गया। इसका मतलब है कि स्थिति को सही तरह से समझने और समय पर फैसले लेने में केंद्रीय बैंक की चूक के गंभीर नतीजे हो सकते हैं। क्राइसिस के वक्त केंद्रीय बैंक की भूमिका बहुत अहम हो जाती है।

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केंद्रीय बैंक कई बार स्थिति को ठीक तरह से समझने में भूल करते हैं। उन्हें लगता है कि हालात को काबू में करने के लिए उनके एक या दो छोटे-बड़े उपाय पर्याप्त होंगे। लेकिन, ऐसा होता नहीं है। प्रॉब्लम बनी रहती है और कई बार तो वह पहले से ज्यादा विकराल रूप धारण कर लेती है। केंद्रीय बैंक फिर उसे काबू में करने की कोशिश करते हैं। यह सिलसिला चलता रहता है। मुख्य इंट्रेस्ट रेट्स में बदलाव केंद्रीय बैंकों के लिए बड़े हथियार का काम करता है।

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