RBI MPC June 2026: इस कारण Repo Rate में नहीं होगी कटौती, मार्केट की इन बातों पर नजर

RBI MPC June 2025: इस हफ्ते आरबीआई अपने अगले मौद्रिक नीतियों का ऐलान करने वाला है। आरबीआई रेपो रेट (Repo Rate) को लेकर क्या फैसला कर सकता है और रेपो रेट के अलावा मार्केट की किन चीजों पर नजर रहेगी, जानिए इसे लेकर इकनॉमिस्ट्स का क्या अनुमान है

अपडेटेड Jun 01, 2026 पर 11:53 AM
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RBI के मुताबिक आंकड़ों से सामने आया है कि दरों में पिछली कटौतियों से मॉनीटरी ट्रांसमिशन में कुछ मदद मिली है लेकिन बहुत जल्द दिशा बदलना आगे दिक्कत कर सकता है।

RBI MPC June 2026: भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) हर दो महीने पर होने वाली इस वित्त वर्ष के दूसरी रिव्यू के लिए 3 जून से बैठक करेगी। इसके बाद आरबीआई गवर्नर सजय मल्होत्रा 5 जून को नीतिगत फैसलों का ऐलान करेंगे। वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के बीच इस बार ग्रोथ और महंगाई दर के अनुमानों में बदलाव हो सकता है। अधिकतर अर्थशास्त्रियों का मानना है कि एमपीसी रेपो रेट को 5.25% पर बनाए रखेगी और अपनी नीति का नजरिया न्यूट्रल बनाए रखेगी। उनका मानना है कि मौजूदा माहौल में अगर आरबीआई ने नरम रुख अपनाया यानी ब्याज दरों में कटौती की तो यह रिस्की हो सकता है। इसकी वजह ये है कि महंगाई को काबू में रखने के लिए काफी प्रयास किए गए हैं और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के दबाव में आकर आरबीआई इस उपलब्धि को जोखिम में नहीं डाल सकता।

फिर तेज हो सकती है महंगाई बढ़ने की रफ्तार?

अप्रैल महीने में सीपीआई (कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स) इंफ्लेशन मार्च में 3.4% की तुलना में बढ़कर 3.48% पर पहुंच गया। यह लगातार छठा महीना रहा, जब महंगाई की रफ्तार तेज हुई। फूड इनफ्लेशन भी बढ़कर 4.2% पर पहुंच गई। मई के आंकड़े जल्द आने वाले हैं और मानसून की अनिश्चितता के साथ-साथ सप्लाई से जुड़ी दिक्कतों के चलते सब्जियों और खाने-पीने की अन्य चीजों की कीमतों में और बढ़ोतरी हो सकती है।


वैश्विक हालात भी बढ़ा रहे चिंता

आरबीआई के सामने एक और बड़ी चुनौती वैश्विक अनिश्चितता है। ईरान और अमेरिका के बीच चल रही जंग और सुलह को लेकर अनिश्चितता के चलते कच्चा तेल पिछले तीन महीने से उबल रहा है। इसके अलावा भारतीय रुपया भी दबाव में है। फ्यूल और खाने के तेल के आयात पर खर्च में उछाल से घरेलू महंगाई तेजी से बढ़ सकती है। इकनॉमिस्ट्स के मुताबिक अगर आरबीआई नरमी दिखाता है तो विदेशी निवेशकों का भरोसा कमजोर हो सकता है और रुपये पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। इस साल 2026 में डॉलर के मुकाबले रुपया पहले ही करीब 7% कमजोर हो चुका है।

तो बाजार की किस बात पर रहेगी नजर?

ग्रोथ के मोर्चे पर भारतीय अर्थव्यवस्था फिलहाल मजबूत बनी हुई है लेकिन निजी निवेश और कैपिटल एक्सपेंडिचर को सपोर्ट की जरूरत है, बार-बार नीतियों में बदलाव की नहीं। आरबीआई के मुताबिक आंकड़ों से सामने आया है कि दरों में पिछली कटौतियों से मॉनीटरी ट्रांसमिशन में कुछ मदद मिली है लेकिन बहुत जल्द दिशा बदलना आगे दिक्कत कर सकता है। ऐसे में मार्केट को सिर्फ रेपो रेट के फैसले पर ही नहीं बल्कि नीतिगत ऐलान के वक्त आरबीआई गवर्नर क्या-क्या बोलते हैं, इस पर भी बाजार की नजर रहेगी।

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